आप एक में ही अगर ध्यान से डूबो, तो आपको घाट-घाट पर नहीं जाना पड़ेगा। पर उसके लिए फिर बहुत श्रद्धा चाहिए और उतनी श्रद्धा हम में है नहीं। उसके लिए एक ऐसा मन चाहिए जिसमें सन्देह कभी उठता ही न हो। जिसमें शक जैसी कोई चीज़ ही न हो। जो समर्पित हो तो ऐसा हो कि और फिर वो समर्पण सिर्फ़ एक किताब के प्रति नहीं हो पाएगा, उसको जीवन के प्रति समर्पित होना पड़ेगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: सर, आपने कहा कि कॉज़ एंड इफेक्ट (कारण और प्रभाव) अगर न हो तो टाइम नहीं कहलाता है। कोई चीज़ हम पढ़ रहे हैं और हम वो चीज़ फिर भूल जाते हैं कि आगे हमें बहुत चीजें पूरी करनी हैं। लोग इंटरोडक्टिव पार्ट (परिचयात्मक भाग) जल्दी पढ़ लेते हैं। मैं उसमें थोड़ा टाइम देती थी और फिर ऐसा होता था कि मैं फर्स्ट पेज पर ही रहती थी और मुझे पता नहीं चलता था कि काफ़ी टाइम कैसे चला गया। तो सर इज़ इट लाइक यू सेड इमरशन इज़ गुड? (जैसे कि आपने कहा कि विलय होना शुभ है तो क्या ये वही है?)
आचार्य प्रशांत: देखो दोनों चीजें हो सकती हैं। एक तो ये है कि मन ऐसा भागा हुआ है इधर-उधर, बिलकुल छिटका हुआ कि आगे बढ़ा ही नहीं जा रहा और ज़्यादातर लोग जिनकी रीडिंग स्पीड (पढ़ने की क्षमता) लो (धीमी) होती है वो बहुत छिटके हुए मन के होते हैं, उनका मन ध्यानस्थ हो नहीं पाता। इसीलिए एक पन्ने से आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। अधिकांश मामलों में यही होगा।
यही कारण है कि जब विवेकानन्द के व्यक्तित्व की बात होती है तो अक्सर ये कहा जाता है कि इतनी किताबें और इतनी उनकी रीडिंग स्पीड (पढ़ने की गति) थी, वो फटाफट पढ़ जाते थे। ओशो को ज़ब याद किया जाता है तो जितना उनको एक गुरु के रूप में याद किया जाता है उतना उनको एक रीडर




