सच के लिए दिनचर्या नहीं बदल सकते, तो ज़िन्दगी क्या बदलोगे || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी शिविर में आपके सानिध्य का समय रात्रि के समय निर्धारित है जब नींद और थकान हावी होती है, क्या इसके पीछे कोई खास कारण है?
आचार्य प्रशांत: आज देखा है कुछ लोग ग़ायब हैं। अब तो फिर भी चीज़ें बड़ी बँध गयीं, क्योंकि संस्था बड़ी हो गयी। आठ-दस साल पहले, शिविर हम बताते थे तीन दिन का है और चलाते थे सात दिन। तो लोग आते थे, तीन दिन की छुट्टी लेकर आते थे, फिर उनको तीसरे दिन की रात बताया जाता था कि चौथा दिन है और जो स्वेच्छा से रुकना चाहता है वो रुके। चौथा दिन चलता था। तो मान लो तीस जने आये हैं, तो चौथे दिन बीस रुक जाएँ, पच्चीस रुक जाएँ।
टिकट कैंसल करा दिया लोगों ने अपना लौटने का। रुकने में कुछ राशि भी लगी, लोगों ने वो भी जमा करा दी। चौथे दिन की रात बताया जाता था कि एक दिन अभी और है और स्वेच्छा की ही बात है, रुकना हो तो रुको नहीं तो जाओ। तो फिर पता चलता था पन्द्रह रुके। फिर बताया जाता था कि अभी एक दिन और है, फिर बताया जाता था एक दिन और है। और सातवें दिन की आधी रात को जो दो घंटे का सत्र होता था, बस वही एक सत्र था असली। और जो उसमें बैठ लेते थे, उन्होंने बैठ लिया, बाक़ी सब छँट गये।
कोई भी क़ीमती चीज़ मुफ़्त नहीं मिलती, पात्रता दर्शानी पड़ती है। हमारे सारे तीर्थ, देखा है कहाँ-कहाँ बनाये गये — कोई दूर समुद्र किनारे, कोई हिमालय की चोटी पर, कोई देश के एक कोने में, ताकि वहाँ वही पहुँचें जो पहुँचने लायक़ हैं, बाक़ी छँट जाएँ और रास्ते से ही वापस लौट जाएँ।
जो सो सकते हों सत्र में, उनको मैं कहता हूँ, ‘तुम ख़ुद सोओ, इससे पहले मैं ही सुला दूँगा तुमको।’ भला है कि तुम सो ही जाओ, छँटो, हटो! जो मैं दे रहा हूँ, वो सबके लिए है ही नहीं। जो थक सकते हैं, वो थक ही जाएँ। हटो! फिर जो बचेंगे, उनके साथ गुरू का आत्मिक सम्बन्ध स्थापित होता है। बाक़ी तो भीड़ है, उसे छँटना चाहिए। भीड़ के लिए यूट्यूब है।






