वक्ता: ऐसा कैसे हो गया कि हर गोपी को लग रहा है कि कृष्ण मेरे ही पास हैं? ऐसा कैसे हो गया?
हम जिस द्वैत की दुनिया में जीते हैं, यहाँ हमारा हर संबंध किसी दूसरे संबंध की कीमत पर होता है| माँ से संबंध बहुत अच्छे हो गये, तो बीवी से संबंध ख़राब होने का ख़तरा है| बीवी के बहुत निकट आ गये तो माँ का रूठना निश्चित है| दोस्तों के साथ ज़्यादा समय गुज़ार दिया तो परिवार से दूर हो जाओगे, बॉस की बहुत सुन ली तो पिता से अनबन हो जाएगी, और पिता के कहने में आ गये तो बॉस कहेगा की मुझे अपना समय दो| समय तो सीमित है, एक के साथ गुज़रेगा तो दूसरे के साथ नहीं गुज़रेगा|
हमारा हर संबंध दूसरे किसी संबंध की कीमत पर होता है, सभी संबंध जीत-हार वाले संबंध हैं| ‘तुम्हारे करीब आऊँगा तो निश्चित ही किसी से दूर जाना पड़ेगा’- ये हमारे संबंध हैं| और हमारे संबंध इसलिए ऐसे हैं क्योंकि उनमें पूर्णता नहीं है| हमारे संबंध इसलिए ऐसे हैं क्योंकि वो इसी बिनाह पर नापे जाते हैं कि तुम दूसरों से दूर कितने हो, इस बात को समझियेगा| आपके जो क़रीबी हैं, आपको बहुत अच्छा लगता है कि वो आपके क़रीबी हैं क्योंकि वो आपके क़रीब हैं, दूसरों की अपेक्षा| आपका क़रीबी आपके उतने ही करीब रहे, पर कहीं दूसरों के ज़्यादा क़रीब न आ जाये, और अगर आ गया तो आपका क़रीबी, क़रीबी नहीं रह जायेगा| बात समझ रहे हैं?
जिनको आप अपना क़रीबी बोलते हो कि ये हमारे दोस्त हैं, संबंधी हैं, पति या पत्नी हैं, उनका आपसे वही संबंध रहे जो है, और अगर किसी दूसरे से प्रगाढ़ संबंध हो जायेगा, तो आपका उनसे संबंध ख़राब हो जायेगा| समझ में आ रही है बात? हमारे संबंध तुलनात्मक हैं, आप मेरे कितने निकट हैं, दूसरे की निकटता के सापेक्ष| ‘तुम मेरे तभी क़रीब हो जब मेरे तुम्हारे बीच का फ़ासला अगर दो इकाई का है, तो बाक़ी सब से तुम्हारा फ़ासला कम से कम पाँच ईकाई का होना चाहिए| मेरा तुम्हारा फ़ासला तो दो ही इकाई का है, पर तुम किसी और के इतने करीब आ गये कि बस एक इकाई दूर हो, तो मेरा तुम्हारा संबंध टूटा’| ये बात आप समझ रहे हैं? हम ये नहीं कहते कि तुम मेरे क़रीब आओ, हम शर्त ये रखते हैं कि…?




