मैं तो सो रही थी, बाँह पकड़ मुझे जगाया क्यों? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर साहब पर (2023)

तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा सोबत ही मैं अपने मंदिर में सबद बान मार जगाये रे फ़कीरवा डूबत ही मैं भव के सागर में बहियाँ पकर समुझाये रे फ़कीरवा एकै बचन बचन नहीं दूजा तुम मोसे बंध छुड़ाये रे फ़कीरवा कहै कबीर सुनो भाई साधो प्राणन प्राण लगाये रे फ़कीरवा।
~ संत कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: बढ़िया। तो वही तीन हैं पुराने और सारी बात उन्हीं के बारे में है। अहम् — जिसको सबकुछ संबोधित किया जाता है, जिसको ही सब सुख है, सब दुख है, पीड़ा है सारी और वही अकेला है जिसको मुक्ति की चाह भी है, उसे कहते हैं अहम्। अहम् वो जिसके लिए सबकुछ है। आत्मा भी अहम् के लिए ही है, प्रकृति भी अहम् के लिए ही है और मुक्ति की सारी बात भी अहम् के लिए ही है। अहम् रहता लगातार प्रकृति के क्षेत्र में है।
प्रकृति माने क्या? वो सबकुछ जिससे अहम् संबंधित है उसको प्रकृति कहते हैं। वो सबकुछ जिसका मन विचार कर सकता है, जिसका अनुभव या कल्पना कर सकता है उसको प्रकृति कहते हैं, ये प्रकृति की परिभाषा है। अहम् हेतु जो कुछ अस्तित्वमान है उसका नाम प्रकृति है।
अब अहम् की छटपटाहट भले ही मुक्ति की हो, लेकिन उसकी हस्ती तो प्रकृति में ही है। चाहता होगा वो आकाश में खुला उड़ जाना, लेकिन ज़िंदगी उसकी प्रकृति में ही है।





