जो आत्मस्थ नहीं है जब वो प्रकृति का संसर्ग करेगा तो क्या होगा? उखड़ जाएगा। वो उखड़ जाएगा जैसे कोई नन्हा पौधा। नन्हे पौधे को बचा के रखते हो ना तमाम तरीक़े की ताक़तों से, आवेग से। तो जो लोग आत्मा में स्थापित नहीं होते, पर जगत के अनुभवों का रस लेने निकल पड़ते हैं, जगत उनको उखाड़ मारता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: गाड़ी की सर्विसिंग कराने ले जाते हो और वो आपकी नाक में इंजन ऑयल ठूँसने लगे तो कैसा लगेगा? भाई, इंजन ऑयल एक चीज़ है, वो गाड़ी भी एक चीज़ है, चीज़ का चीज़ से मिलन होने दो दोनों के लिए आपस में कुछ सार्थकता, कुछ उपयोगिता होगी।
आप खड़े हो उसने पीछे से जैक लगा दिया, अब टंगे हुए हैं हवा में और हाय! हाय! कर रहे हैं, और वो उतारू है कह रहा “नहीं, आज तो स्टेपनी बदल के लगा के मानूँगा!” गड़बड़ हो जाएगी न। और ऐसा नहीं कि हमें जैक लगवाना नहीं है लगवाना है, हमें मत लगाओ उसको लगाओ। हमें न तो तुम्हारा पेच पाना चाहिए, न जैक चाहिए, न इंजन ऑयल चाहिए। ये सब काम हमारे लिए नहीं हैं, जिसके लिए हैं उसके लिए रहें।
गाड़ियों के नीचे से धुलाई देखा है कैसे होती है? अरे, कभी सर्विस सेंटर नहीं गए क्या? कैसे होती है, एक जगह होती है जहाँ गाड़ी को खड़ी कर देते हैं और नीचे उसमें खाली स्थान होता है। तो नीचे से पूरा देखभाल भी कर लेते हैं कि कहीं कोई छेद-वेद तो नहीं हो गया आपके साइलेंसर में, एक्झॉस्ट में। सफ़ाई भी कर देते हैं सब कुछ, निरीक्षण भी हो जाता है, सफ़ाई भी हो जाती है नीचे से।




