किसी पर आश्रित नहीं रहेंगे, आज़ाद जिएँगे

Acharya Prashant

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किसी पर आश्रित नहीं रहेंगे, आज़ाद जिएँगे
जो आत्मस्थ नहीं है जब वो प्रकृति का संसर्ग करेगा तो क्या होगा? उखड़ जाएगा। वो उखड़ जाएगा जैसे कोई नन्हा पौधा। नन्हे पौधे को बचा के रखते हो ना तमाम तरीक़े की ताक़तों से, आवेग से। तो जो लोग आत्मा में स्थापित नहीं होते, पर जगत के अनुभवों का रस लेने निकल पड़ते हैं, जगत उनको उखाड़ मारता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: गाड़ी की सर्विसिंग कराने ले जाते हो और वो आपकी नाक में इंजन ऑयल ठूँसने लगे तो कैसा लगेगा? भाई, इंजन ऑयल एक चीज़ है, वो गाड़ी भी एक चीज़ है, चीज़ का चीज़ से मिलन होने दो दोनों के लिए आपस में कुछ सार्थकता, कुछ उपयोगिता होगी।

आप खड़े हो उसने पीछे से जैक लगा दिया, अब टंगे हुए हैं हवा में और हाय! हाय! कर रहे हैं, और वो उतारू है कह रहा “नहीं, आज तो स्टेपनी बदल के लगा के मानूँगा!” गड़बड़ हो जाएगी न। और ऐसा नहीं कि हमें जैक लगवाना नहीं है लगवाना है, हमें मत लगाओ उसको लगाओ। हमें न तो तुम्हारा पेच पाना चाहिए, न जैक चाहिए, न इंजन ऑयल चाहिए। ये सब काम हमारे लिए नहीं हैं, जिसके लिए हैं उसके लिए रहें।

गाड़ियों के नीचे से धुलाई देखा है कैसे होती है? अरे, कभी सर्विस सेंटर नहीं गए क्या? कैसे होती है, एक जगह होती है जहाँ गाड़ी को खड़ी कर देते हैं और नीचे उसमें खाली स्थान होता है। तो नीचे से पूरा देखभाल भी कर लेते हैं कि कहीं कोई छेद-वेद तो नहीं हो गया आपके साइलेंसर में, एक्झॉस्ट में। सफ़ाई भी कर देते हैं सब कुछ, निरीक्षण भी हो जाता है, सफ़ाई भी हो जाती है नीचे से।

गाड़ी की जगह आपको ऐसे खड़ा कर दे, एक टांग इधर एक टांग उधर और इतना मोटा होज़ पाइप होता है, उससे गाड़ी की सफ़ाई होती है। अभी बहुत हँसी आ रही है, और यही हम कर रहे होते हैं हर समय। ये गाड़ी है, (शरीर की ओर इंगित करते हुए) बहुत सारी चीज़ें इसके लिए महत्त्व रखती हैं क्योंकि ये इसी मिट्टी की पैदाइश है न। ये तो निर्भर है ही है, इसको ज़रा सी देर के लिए कह दो कि “तुझे हवा पर निर्भर नहीं रहना है,” तो हाय! हाय! इसकी शुरू हो जानी है। ज़्यादा नहीं एक मिनट।

इसको ज़रा सी देर के लिए बोल दो कि “ये जो दबाव है हवा का, पूरे वातावरण का ये बदल जाना है।” जैसे बदल जाता है जब आप ऊपर कहीं जाते हो पहाड़ पर, फिर देखो इसकी हाय! हाय! या बोल दो कि “मिट्टी से जो अन्न उगता है उस पर आश्रित नहीं रहना।” फिर देखो, हाय! हाय! या पानी, या और कितनी चीज़ें।

पश्चिमी देशों में अब जाड़े आ रहे हैं वहाँ मनोरोग बढ़ जाते हैं, क्यों? सूरज देखने को नहीं मिलता, उनका सर घूमने लग जाता है, दो महीने, तीन महीने बीत गए रोशनी नहीं देखने को मिलती। फिर वो भागते हैं वहाँ से जाड़ों से कहते हैं, “अफ़्रीका जा रहे हैं घूमने, दो-दो महीने वहाँ पड़े रहेंगे।” भारत आ रहे हैं और जा रहे हैं जहाँ गर्म देश हैं, वहाँ जा रहे हैं बोले, वहाँ रोशनी। तो तन को तो सब कुछ चाहिए तन को तो पूरा सूरज चाहिए, सूरज न मिले तो पगला जाता है।

तन को ये सब चलने दो। सारा खेल है भीतर किसी ऐसे के होने का, या कह सकते हो "ना होने का” जो सब आश्रयताओं से सर्वथा मुक्त हो, लेना ही देना नहीं। उसको ऐसे भी कह सकते हो भीतर कोई है जो पूर्णतः स्वतंत्र है, दूसरे तरह से ऐसे कह सकते हो भीतर वो नहीं है जो परतंत्र होता है। दोनों ही तरीक़े ठीक हैं।

दूसरा तरीक़ा ज़्यादा व्यवहारिक पाया गया है, क्योंकि शुरुआत तो हमारी परतंत्रता से ही होती है न, और रास्ता ‘नेति-नेति’ का है। तो बेहतर है ऐसे कहो कि “हमारे भीतर वो नहीं है जो दूसरों पर आश्रित होता है।” या अगर वो हमारे भीतर है भी क्योंकि शुरुआत तो उसके साथ ही करी थी, तो हम अपने सब अनुभवों का चयन इस हिसाब से करते हैं कि उन्हीं अनुभवों की, इसी दुनिया की, अर्थवत्ता कम होती चली जाए।

आदर्श या अंतिम स्थिति तो ये है कि भाई, मुझे कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं। फ़र्क़ पड़ता है, किसको पड़ता है? व्यवस्था को पड़ता है, मन को पड़ता है, बुद्धि को पड़ता है उनको जो करना है वो करते रहते हैं, वो सब स्थितियों को देखते हैं और स्थितियों के अनुसार कुछ प्रतिसाद करते रहते हैं। वो ठीक है, उनको पड़ता है।

एक तो ये है कि “उसमें मैं आदर्श एकदम अंतिम मुक्त स्थिति में आ गया,” और दूसरा ये है कि “नहीं मुक्त तो नहीं हूँ पर मुक्ति चाहिए।” मुक्ति चाहिए तो मैं अपने सब अनुभवों, अनुभव माने संबंध, मैं अपने सब संबंधों का चयन इस तरह से करता हूँ कि दुनिया मेरे लिए जितनी अर्थपूर्ण थी उस संबंध से पहले, उस संबंध के साथ, और उस संबंध के बाद वो अर्थ ज़रा कम होता चले। किसी ऐसे से नहीं जुड़ूँगा जो अपने आप को मेरे लिए अर्थपूर्ण बना दे। किसी ऐसे से जुड़ूँगा जिससे जुड़ने के बाद जो चीज़ें मुझे अर्थपूर्ण लगती भी थीं, वो लगनी ज़रा कम हो जाएँ। किसी ऐसे से नहीं जुड़ेंगे जिससे जुड़कर के दुनिया से और बंध जाएँ, दुनिया से सौ तरह के नाते और जुड़ जाएँ कि पहले एक खूंटे से बँधे थे और उस खूंटे से बँधे होने के कारण एक और खूंटा पकड़ा, और ये दूसरा खूंटा पकड़ते ही पाँच खूंटे और गड़ गए! ये नहीं करते।

रिश्ता, संबंध, अनुभव, नाता जो भी कहो, वो बनाएँगे तो किसी ऐसे से जो हमारे मूल खूंटे से भी आज़ाद करने में सहायक हो। और

सही संबंध की पहचान यही होती है, सही संबंध आपके भीतर जो आश्रय, गुलामी की वृत्ति होती है उसको कम करता चलता है।

सही संबंध में ये नहीं होता कि रिश्ते में हूँ तो उस पर आश्रित हूँ, सही संबंध का मतलब ही होता है कि रिश्ते में हूँ तो रिश्ता ही मुझे अनाश्रित करे दे रहा है। नहीं तो हम सोचते हैं कि रिश्ता उतना ज़्यादा गहरा है, असली है, प्यारा है, मीठा है जितना रिश्ते में जो दो व्यक्ति हैं या एक व्यक्ति है और एक वस्तु है। ये दोनों जितना परस्पर आश्रित हैं या फिर व्यक्ति और वस्तु जितना ज़्यादा आश्रित हैं, हम कहते हैं ये संबंध उतना प्रगाढ़ है, यही कहते हैं ना।

बात उलटी है।

रिश्ता सार्थक, रिश्ता तमीज़ का है ही तभी जब रिश्ता अर्थहीन होता जाए — अर्थहीन। ये कोई बहुत नई बात नहीं है अर्थहीन शब्द से आप बिल्कुल परिचित हैं, रिश्ता सार्थक है ही वही। देख रहे हो ‘स अर्थ’ तो रिश्ते में वास्तविक अर्थ तभी है, वास्तविक लाभ ‘स-अर्थ’ सार्थकता, वास्तविक लाभ तभी है जब रिश्ते में स्वार्थ न हो। तो 'स अर्थ' और 'स्व अर्थ' एक साथ नहीं चलते।

'स अर्थ' मानें सार्थकता। 'स' और 'अर्थ' जुड़ते हैं तो उसको हम क्या बोलते हैं? सार्थकता (अर्थ के साथ जुड़ना)। और 'स्व अर्थ' माने क्या होता है? स्वार्थ। दोनों में क्या अंतर है? 'स अर्थ' से आशय है वो अर्थ, वो लाभ जो वास्तविक है। अर्थ माने लाभ, हमने कहा था ना वो लाभ जो वास्तविक है। वास्तविक लाभ क्या है? अहम् का मिटना। सार्थक रिश्ता वही है जिसमें अहम् मिटता हो।

और ‘स्व अर्थ’ माने किसका अर्थ? अहम् के लिए अर्थ माने अहम् का लाभ, माने अहम् का बढ़ना। तो ‘स अर्थ’ है अहम् का? घटना। और ‘स्व अर्थ’ है अहम् का?

श्रोता: बढ़ना।

आचार्य प्रशांत: बढ़ना, हाँ। तो सार्थकता सिर्फ़ वहीं है जहाँ स्वार्थ ना हो, सार्थ वहीं है जहाँ स्वार्थ ना हो। जहाँ स्वार्थ है, वहाँ क्या नहीं हो सकता? सार्थ नहीं हो सकता।

अब हमसे पूछोगे कि कौन-सी वस्तु चाहिए? तो वो तो अपनी दृष्टि से देखेगा न, और उसकी दृष्टि हमेशा क्या? ‘स्व अर्थ।’ जो तुम्हें भला लगता हो उसको ही स्वार्थ बोलते हैं, जो तुम्हें लगता हो कि तुम्हारे लाभ का है उसको ही स्वार्थ बोलते हैं।

कुछ पकड़ा?

भ-ला, जो तुम्हें भला लगता हो जिसमें तुम्हें लाभ लगता हो। भला – लाभ, माने स्वार्थ के लिए एक ही चीज़ भली है, क्या? मेरा व्यक्तिगत लाभ। उससे पूछो तुम्हारी भलाई किसमें है? वो कहेगा जिसमें मुझे लाभ दिखाई देता है। तो वो अपनी भलाई जानता ही नहीं उसके लिए भलाई बराबर फायदा, और फायदा भी किसकी दृष्टि से देखा हुआ? अपनी दृष्टि से देखा हुआ।

समझाने वाले कह गए हैं, वास्तविक लाभ है ये जो अपना लाभ खोज रहा है इसकी विदाई, वो वास्तविक लाभ है। और जब उसकी विदाई होने लगती है तो ये जो बेचैनी रहती है न हर चीज़ में, माने छोटी चीज़ में भी ये देखना कि इसमें मुझे क्या मिल रहा, मेरा क्या लाभ है, ये दृष्टि फिर हट जाती है।

व्यक्ति कहता है, "इतने थोड़ी भीतर से खाली बैठे हुए हैं कि हर दो रुपए की चीज़ में पूछें कि इसमें मुझे क्या मिल रहा है?" हम वहाँ पहुँच गए हैं जहाँ ज़्यादातर चीज़ों से हमें कुछ पाने की हमें उम्मीद है ही नहीं। इतने कमजोर, इतने खाली नहीं हैं कि जो कुछ भी दिखे उसी का सहारा माँगे। और जो हमें चाहिए वो दो रुपए की चीज़ में मिलेगा नहीं। अभी भी अहम् बचा हुआ है, अभी भी कुछ बंधन बचे हुए हैं उनको काटना शेष है, कौन-सा अभी हम मुक्त पुरुष हो गए। लेकिन अभी जो बचा हुआ है, अभी जो लाभ चाहिए, अभी जो सार्थकता चाहिए वो ऐसा नहीं है कि वो हर छोटी-छोटी चीज़ में मिल जाएगी, तो उनकी तो हम उपेक्षा करते चलते हैं। अब तो कुछ विशिष्ट ही है जो चाहिए।

ये दो बात हैं, मुक्त हो तो कह दोगे “कुछ नहीं चाहिए,” और मुमुक्षु हो तो कहोगे, “केवल विशिष्ट ही चाहिए।” लेकिन दोनों ही स्थितियों में तुम कहोगे, कि ये सब जो दुनिया भर की 50 चीज़ें इधर-उधर रहती हैं इनसे तो कोई लेना-देना एकदम नहीं है, कुछ नहीं। और जो स्वार्थी है उसको दुनिया की हर चीज़ से लेना-देना है, चाहे दो रुपए की हो, दो करोड़ की हो, कुछ हो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता उसे सब खाना है।

हम कहते हैं ना बार-बार कि अहंकार ऑम्निवोर है, ऑम्निवोर माने सब खाता है, सर्वाहारी। उससे आशय यही है, वो अपने आप को तो जानता नहीं तो उसको ये भी पता नहीं कि उसको चाहिए क्या, तो उसको कुछ भी मिले उसको अंदर ले लेता है। और फँसता ही जाता है क्योंकि एक चीज़ को तुमने ग्रहण किया तो उसके विपरीत से अब तुमको दूरी बनानी पड़ेगी, डर के रहना पड़ेगा। समझ में आ रही है बात?

कुछ बड़े से बड़ा हो, कुछ जगमग से जगमग हो, एक सीमा ऐसी होनी चाहिए जिसके बाद वो आपके लिए कोई अर्थ नहीं रखता।

भीतर कुछ ऐसा होना चाहिए जो आप किसी भी चीज़ के लिए दाँव पर नहीं लगाओगे, बेचोगे नहीं। ऐसा नहीं कि वस्तुओं की अपने आप में कोई महत्ता या उपयोगिता नहीं, उनकी महत्ता भी है, उपयोगिता भी है। लेकिन एक बिंदु है हमारे भीतर जिसको हम कहते हैं — “हमारी हस्ती।” तुम्हारी उपयोगिता जितनी भी है हमारी हस्ती से बड़ी नहीं है, तो अपनी हस्ती को हम दाँव पर नहीं लगाएँगे। कुछ बाहर घटना घटेगी उससे हम दुखी हो सकते हैं निस्संदेह, पर कोई दुख इतना बड़ा नहीं होगा कि हमें हमारे केंद्र तक खा जाए बिल्कुल, ना कोई सुख इतना बड़ा होगा।

हवाएँ आ रही होंगी, इधर वाली भी हवा आई वो हमारे बाल उड़ा गई बड़ा अच्छा लगता है। ख़ासकर उमस का अगर मौसम हो बरसात जैसा तो उमस एक तरह की बेचैनी देती है हर समय पसीना-पसीना रहता है, उस समय हवा चले बड़ा अच्छा लगता है। तो हवा आई, इधर से आई बाल उड़ा गई, सामने से आई पसीना सुखा गई, बड़ा अच्छा लग रहा है। हवा चल रही है इधर से, उधर से, चारों तरफ़ से। कई बार तो ये भी बड़ा अच्छा लगता है कि कपड़े उड़ रहे हैं, कुर्ता पहन रखा है और ढीला-ढाला है और कुर्ते की बाँह के साथ खेल रही है हवा, बड़ा अच्छा लग रहा है। तो बाल उड़ रहे हैं, कपड़े उड़ रहे हैं सब सुंदर, हम नहीं उड़ते जा रहे। समझ में आ रही है बात?

जब तक हवा आपकी ज़ुल्फें उड़ा रही है तब तक रस है, और जब हवा आपको ही उड़ा दे, तब भी रस ही है — विभत्स रस। क्या नहीं गाने लिखे जाते हैं कि "उड़े जब-जब ज़ुल्फें तेरी, कंवारीयों का दिल मचले।" ज़ुल्फें उड़ रही थीं कंवारियाँ मचल गई होंगी, और बंदा ही उड़ गया तो कौन-सी कंवारी मचलेगी। इतना हल्का बंदा हर तरह से हल्का, हवाओं से आशय समझ रहे हो ना? हवाओं माने क्या? प्रकृति के प्रभाव।

प्रकृति के साथ आपका जो कुछ है वो खेले तो इसमें एक मधुरता है, रस है। हवा आपके बालों के साथ खेल रही है आप उसके दृष्टा हैं बहुत अच्छी बात है, आनंद है, साक्षीत्व है। इतनी ज़ोर की है हवा या इतने कमजोर हैं आप कि हवा आपको ही डगमग-डगमग किए दे रही है, तो बड़ी समस्या हो जाएगी ना। हवा चलती है, पेड़ होता है, उस पर पत्ते क्या मस्त नाचते हैं और कमजोर हो पेड़ हवा चली उखड़ ही गया, तो ये तो त्रासदी जैसा हो जाता है।

एक भीतर मज़बूती होनी चाहिए, जड़ें अपनी अस्तित्व की गहरी होनी चाहिए कि सब हवाएँ हमारी हस्ती के साथ खेलें। क्या हम ये कह रहे हैं कि जो कुछ भी घट रहा है आपके चारों ओर उसका आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? प्रभाव तो पड़ेगा। इतने मोटे तने वाला बरगद होता है, हवा चलती है तो क्या उसपर कोई असर नहीं पड़ता? बिल्कुल पड़ता है, पत्तियाँ झूमती हैं, शाखें भी हिल जाती हैं, आवाज भी होती है।

क्या हम ये कह रहे हैं, कि बरगद इतना मजबूत हो गया है कि दुनिया में कुछ भी होता रहे इससे बरगद को कोई असर नहीं पड़ता? असर तो पड़ता ही है, लेकिन वो असर एक बिंदु पर जाकर के रुक जाता है। उस बिंदु का क्या नाम है?

श्रोता: जड़।

आचार्य प्रशांत: हाँ जड़। बहुत तेज हवा चलेगी तो शाखाएँ कंपित हो जाएँगी और ज़्यादा ही तेज कोई भयानक आँधी तूफ़ान आ जाए तो ये भी हो सकता है कि तना भी ज़रा सा डोल जाए, एकदम ज़रा सा। कोई बहुत सूक्ष्म उपकरण हो तो वही नाप पाए कि इतना सा माइक्रॉन में डोल गया, लेकिन कुछ भी हो जाए जड़ नहीं डोलेगी। कुछ ऐसा हो जो एकदम ही हिलता डुलता न हो बाहरी प्रभावों से, तो वो तो मृत ही हो गया बिल्कुल, एकदम मृत। और कुछ ऐसा हो जिसकी जड़ ही उखड़ जाती हो, पाँव ही उखड़ जाते हों, तो वो मृत तो नहीं है पर दुखी बहुत है। उसके पास चेतना है पर वो एक दुखी चेतना है।

तो आनंद में कौन है?

आनंद में वो है, जिसका जो बाहरी खोल है, जिसके अस्तित्व के जो बाहरी कोश हैं, वो जगत के संसर्ग में हर तरह की क्रिया प्रतिक्रिया करते हैं और बड़ी संवेदनशीलता के साथ। इतनी सी हवा चले तो पत्ता तुरंत सूचना दे देता है। क्या संवेदनशीलता है! इतना भारी बरगद, ये मोटा तना है लेकिन उसमें संवेदनशीलता हवा के एक हल्के से हल्के झोंके के प्रति भी है। थोड़ी भी हवा चले तो बरगद का पत्ता क्या करता है, सूचना दे देता है तुरंत। हम यहाँ बैडमिंटन खेल रहे होते हैं, हमें देखना होता है हवा चल रही है नहीं चल रही। तो हम क्या करते हैं? हम कुछ नहीं करते, ऐसे देख लेते हैं पीछे बड़ा सा पेड़ और उसके पत्ते इतल्ला कर देते हैं कि हवा चल रही है कि नहीं चल रही। हमारी खाल भी नहीं बता पाती जितना वो पत्ते बता देते हैं।

तो उस बरगद में ग़ज़ब की संवेदनशीलता है एक हवा के दुर्बल झोंके के प्रति भी, और ग़ज़ब का स्थायित्व भी है। हवा का हल्के से हल्का झोंका भी एक स्पंदन कर जाता है उस वृक्ष में, और बड़े से बड़ा अंधड़ भी उसको हिला नहीं पाता है। ये एक मुक्त जीवन की पहचान होती है।

इसीलिए फिर लोग थोड़ा अचरज में पड़ जाते हैं, वो कहते हैं, “अगर ये सचमुच मुक्त है तो फिर दुनिया की छोटी-छोटी बातों से कंपित क्यों हो जाते हैं? इन्हें फ़र्क़ क्यों पड़ता है?” उन्हें वैसे ही फ़र्क़ पड़ता है जैसे बरगद के पेड़ को ज़रा सी बहती हवा से पड़ता है। कभी देखा है एक छोटी सी चींटी भी चले पत्ते पर तो चींटी के चलने के साथ पत्ता कैसे धीरे-धीरे डोलता है, देखा है? इतनी संवेदनशीलता, इतनी कोमलता, जगत के साथ इतना एकत्व कि इतनी सी चींटी भी है और पत्ते पर चल रही तो पत्ता थोड़ा-थोड़ा डोलता है।

कभी देखिएगा, ओस की बूँद हो एक और वो बनते-बनते ढलते हुए अगर पत्ती ऐसे झुकी हुई है, तो पत्ती की नोक की तरफ़ आ रही है और जिस क्षण वो बूँद उस नोक से नीचे गिरती है, वो पत्ती ऐसे हल्का सा काँपती है, ज़रा सा जैसे कोई बिछुड़ गया हो और किसी को पता भी न लगने देती काँपी हो। जैसे कह रही हो, “हमारे और उसके बीच की बात है किसी को पता न लगे,” इतनी संवेदनशीलता। जो समझदार नहीं है, वो देख के धोखा खा जाए। उनको लगे कि इस वृक्ष के पास तो कोई स्थायित्व है ही नहीं, ये तो बहुत बिखरी हुई सी चीज़ है कोई। दुनिया में कुछ भी होता है और इस पर असर आ जाता है, इसके पास क्या है कुछ नहीं।

भाई, यही तो बात है न, तुमने उसके पत्ते देखे हैं तुमने उसका तना नहीं देखा। अब वही तना जब मिट्टी से नीचे होता है तो जड़ कहलाता है, अभी तुमने वो नहीं देखा। और ये जो इतनी पत्तियाँ हैं न — कोमल, नाज़ुक, खरी जो कभी ओस के साथ नाचती हैं, कभी हवा के साथ, कभी चींटी के साथ, कभी चिड़िया के साथ, ये इतने पत्ते हैं ही इसीलिए और उनमें इतना हरापन और इतनी कोमलता है ही इसीलिए, क्योंकि जड़ें गहरी हैं। जड़ें न गहरी हों तो पत्ते कहाँ से कोमल होंगे, कहाँ से हरे होंगे और कहाँ से इतने सारे होंगे?

ये एक सुंदर व्यक्तित्व, सुंदर कह लो, मुक्त कह लो जो सब एक ही बात है इसकी पहचान होती है, उसमें एक ग़ज़ब विरोधाभास दिखाई देता है, कम से कम अनाड़ी आँखों को। और अनाड़ी आँखें उस विरोधाभास को कभी समझ नहीं पातीं, या तो वो बस भौंचक्की रह जाती हैं या फिर पाखंड का आरोप लगा देती हैं। कहती हैं, “ये तो समझदार हैं, ज्ञानी हैं या मुक्त हैं, जो भी हैं इनको तो जगत के प्रति नितांत निष्प्रह होना चाहिए ना। इन्होंने तो विवेक और वैराग्य धारण करा है।”

और हमने अभी देखा, एक ज़रा सी चींटी और ये काँप गए थे। उस कंपन के लिए बड़ी कोमलता चाहिए और उस कोमलता के लिए जड़ों की गहराई चाहिए। और जिस गहराई से वो कोमलता आती है, उसी गहराई से वो वज्र जैसा फिर तना भी आता है कि मारो उस पर तुम अपनी कुल्हाड़ी तो कुल्हाड़ी टूट जाए। समझ में आ रही बात है?

ये मुक्त पुरुष की पहचान होती है जिसको हमने पहले ऐसे कहा था, “बाहर से प्रकृतिस्थ और भीतर से आत्मस्थ।” बाहर उसके पास कोई कारण ही नहीं है प्रकृति की किसी भी प्रकार की उपेक्षा करने का, निंदा करने का, या विरोध करने का। क्यों करना है? क्या डर है? क्या पाना है? ना कुछ डर है, ना कुछ पाना है।

तो ऐसा मन, ऐसा व्यक्ति, ऐसा जीवन फिर खुलकर जीता है। और अब एक विचित्र बात समझिएगा सारी नींद उड़ जाएगी — जो बैरागी होता है सिर्फ़ वही जीवन के सब अनुभवों से बेखौफ़ गुज़र पाता है, बाक़ियों की तो, जिसे कहते हैं आम भाषा में, हालत टाइट रहती है हवा ख़राब रहती है। कहते हैं, फलाने अनुभव में घुसेंगे कहीं कुछ बिगड़ न जाए। आम आदमी क्या जीवन को सचमुच खुलकर जी पाता है? नहीं। सौ तरह के खटके लगे रहते हैं बात-बात में अंदेशा होता है, कहीं ऐसा हुआ तो ऐसा न हो जाए।

जो बैरागी होता है, वो कहता है कि “कैसा भी हो जाए, ऐसा हो जाए चाहे वैसा, जड़ तो हिलनी नहीं है।” जड़ जब हिलनी नहीं है, तो हमारे पत्तों में और हमारी शाखाओं में सबका स्वागत है – हवा का भी, धूल का भी, आँधी का भी, तूफ़ान का भी, धूप का भी, दिन का भी, रात का भी, छोटी चिड़िया का भी और बड़े चील का भी। आओ जिसको बैठना है, यहाँ कौआ भी कान सुजाता है और कोयल भी गाती है। और कभी देखा कि वृक्ष किसी को मना करता हो? वो बाहर से प्रकृतिस्थ है उसके पास अविरोध आ गया है अब, अविरोध। जीवन के प्रति, अविरोध।

इसको दो तरह से कह सकते हैं, ये अविरोध आदर्श स्तिथि में कह लीजिए कि इसलिए है क्योंकि उसे अब दुनिया से कुछ चाहिए नहीं। और थोड़ा व्यवहारिक तरीक़े से कह लीजिए ये अविरोध इसलिए है क्योंकि दुनिया से उसे बस एक विशिष्ट चीज़ ही चाहिए और वो उसको मिल रही है। तो इसीलिए बाक़ी चीज़ों को लेकर के उसको न तो ये है कि मिल गई तो बड़ी बात, या नहीं मिली तो छोटी बात।

इस बड़े पेड़ को दुनिया से अब क्या चाहिए? दो ही तीन चीज़ें वो बहुत विशिष्ट हैं वो उसको मिल गई हैं। जड़ों को चाहिए मिट्टी और थोड़ा पानी, और पत्तियों को चाहिए थोड़ी धूप और बाक़ी से उसे कोई लेना-देना नहीं। वो कहता है, यही दो-तीन चीज़ें हैं, ये मेरी ज़िंदगी में मौजूद हैं। अब कुछ आए, कुछ जाए, कुछ मिला, कुछ गँवाया, कुछ बढ़ गया, कुछ घट गया फ़र्क़ किसको पड़ता है।

बहुत शास्त्रीय तरीक़े से कहेंगे तो ये हो जाएगा कि जिनको कुछ न चाहिए, वो शाहन के शाह। और थोड़ा और ज़मीनी तरीक़े से कहेंगे हमारी ज़िंदगियों के सन्दर्भ में कहेंगे जहाँ हम कहते हैं कुछ तो चाहिए होता है, तो वहाँ पर जैसे वो वृक्ष मिट्टी से और सूरज से कह रहा है कि “तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है, अंधेरों में भी मिल रही रोशनी है।” तुम दोनों मेरे साथ रहना। कौन? मिट्टी। हम मान रहे हैं कि मिट्टी माने नम मिट्टी तो पानी उसी में है। एक मिट्टी और एक सूरज, एक धरती और एक आकाश।

वो कह रहा है, “एक धरती मेरे पास रहे, एक आकाश मेरे पास रहे उसके बाद कुछ आ गया तो स्वागत है, हम किसी को नहीं मना करते।” कभी देखा है कि वो मना कर रहा हो, “ए बदबूदार है तू चिड़िया भाग यहाँ से, काली!” ऐसा तो उसने कभी करा नहीं। “ये कुत्ता कैसे नीचे सो रहा है और मेरे तने की खोह में ये साँप घुस के बैठ गया — भग! ज़हरीला!” साँप घुसे तो साँप घुसे, चींटी तो चींटी। पेड़ों के तनों में देखा है कैसे-कैसे चींटे, वो लाल वाले चींटे होते हैं ऐसे भयानक काटते हैं, वो किसी को नहीं मना करता।

बच्चे हैं छोटे वो आकर के खेल रहे हैं, कहीं रस्सा डाल दिया है, लटक रहे हैं, इस प्रक्रिया में कुछ थोड़ा-थोड़ा तोड़ा-ताड़ी भी कर देते हैं कुछ पत्ते तोड़ दिए, कुछ डाली तोड़ दी। कह रहा, “ठीक है दस पत्ते और दो डाल टूट गई तो हमारा कुछ नहीं जाता, हमें जो चाहिए वो हमें मिला हुआ है, नीचे धरती, ऊपर आकाश। तू दस पत्ते ले जा, तू एक डाल ले जा मेरा क्या जाता है, जा।”

ये मुक्त जीवन की निशानी होती है।

ऐसे कह सकते हो कि उसे कुछ नहीं चाहिए, या ऐसे कह सकते हो उसे कुछ बहुत ख़ास चाहिए उसके अलावा उसे कुछ नहीं चाहिए। दोनों तरीक़ों से आप कह सकते हैं, आपके लिए ज़्यादा व्यवहारिक है ये कहना कि उसे कुछ ख़ास चाहिए, उस ख़ास के अलावा वो बाक़ी जो हो रहा है, पूरी तरह प्रकृतिस्थ, अविरोध, नॉन रेज़िस्टेंस। न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा है, ये थोड़ी कि काला चींटा अच्छा है, लाल चींटा बुरा है। ठीक है, सब ठीक है। ये थोड़ी कि जाड़े के दिन अच्छे हैं और गर्मी के दिन बुरे हैं, कहे कि धूप लग गई, गर्मी लग गई। उल्टा है, “तुम्हें धूप लग रही क्या बेटा? आओ हमारे छाँव ले लो।” वो ये नहीं कह रहा है कि उसे धूप लग गई। वो कह रहा है, तुम्हें लग रही हो तो मेरे नीचे आ जाओ।

हमें धूप लग रही है कि नहीं लग रही इसकी परवाह कब की छोड़ दी, हम तो अब दूसरों को धूप में शरण देते हैं। आपको धूप से वही बचा सकता है, सोचिएगा जिसे ख़ुद अब धूप का कोई ख़ौफ़ न रह गया हो, वरना आपको धूप से बचाने का कोई तरीक़ा ही नहीं है। धूप तो हर तरफ़ है। आपको छाया सिर्फ़ तभी मिल सकती है जब आपके हिस्से की धूप कोई और रोक कर खड़ा हो। छाया किसी और तरीक़े से लाकर दिखाओ कोई और तरीक़ा ही नहीं छाया का। तो इसीलिए फिर संतों ने क्या बोला, “न होते जो साधुजन, तो जल मरता संसार।”

आप धूप से जल मरते, और वो धूप इसीलिए रोक पाते हैं, वो आपको छाया इसीलिए दे पाते हैं क्योंकि उन्हें अब धूप जला नहीं सकती। तो कहते हैं, “लाओ, कितनी धूप है, हमें दे दो। हमें जब धूप दे दी, तो उधर छाया हो गई। आओ, तुम लोग बच्चों यहाँ बैठ जाओ।” कभी नहीं देखा होगा कि इस साल धूप बहुत पड़ी तो जो बड़े वृक्ष होते हैं, बरगद और पीपल सरीखे या मौलश्री, “अरे, ये सूख गए।” ये कभी नहीं देखा होगा।

क्यों नहीं सूखते कभी?

अरे, इतनी गहरी जड़ें हैं वो कुएँ से पानी निकाल लाएँ। कुएँ सूख जाएँ, उनकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि वहाँ से भी पानी निकाल लाएँ। बड़े वृक्ष नहीं सूखते, अकाल पड़े, कुछ पड़े, धूप पड़े, नहीं सूखते। छोटे वाले सूख जाते हैं, छोटे वालों को तो सींचना पड़ता है, जितना छोटा होता है उतनी सिंचाई दो। फिर जब बड़ा होता जाता है तो आप कहते हो अब सिंचाई की नहीं ज़रूरत।

सबसे पहले घास सूखती है बेचारी। हमारे भी जो लॉन में घास है, जहाँ गर्मी आए तहाँ मोटा पाइप लगाकर सींचो, नहीं तो नहीं चलेगी। कितनी गहरी होती है उसकी जड़? कुछ नहीं। जहाँ धूप पड़ी, मिट्टी सूखी, घास गई। यहाँ जामुन का पेड़ लगा है हम उसको थोड़ी सींचने जाते हैं। उधर आम है वो बड़ा हो रहा है, उसको सींचने की ज़रूरत थोड़ी पड़ेगी। उन्होंने अब वो नाता जोड़ लिया जो उन्हें जोड़ना चाहिए था, अब पानी पड़े कि सूखा आए, आतप आए कि अंधड़ कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

समझ में आ रही है ना बात ये?

कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, सब विपरीतताएँ, अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ एक सी हो गई हैं, ना सिर्फ़ हमारे लिए एक सी हो गई हैं बल्कि उनको छाया दे देते हैं, शरण दे देते हैं, जिनके लिए अभी एक सी नहीं हुई। समझ में आ रही है बात?

जब वो मिल जाता है या मिलने लगता है जो सचमुच चाहिए, तो बाक़ी जो इधर-उधर की चीज़ें होती हैं, हल्की-फुल्की, विविध, मिसलेनियस, उनके होने से या ना होने से फ़र्क़ पड़ना कम होने लगता है। है, तो भी ठीक हम फेंकने नहीं जाएँगे मिल गई है चीज़ तो। बढ़िया बारिश हो रही है, कोई वृक्ष को आपत्ति हो जाती है? अच्छी बात है, बारिश हो रही है। वृक्ष कहता है, “नहला दो भाई, नहला दो, बढ़िया बहुत बढ़िया क्या बारिश हुई।” लेकिन वो बारिश के पानी पर आश्रित नहीं है अपने जीवन के लिए, बारिश होगी तो नहा लेगा, झूम लेगा, मौज मना लेगा। कह देगा, “अच्छा हुआ, पत्तों पर धूल पड़ गई थी बहुत, धूल साफ़ हो गई चमक गए बढ़िया पत्ते।”

वृक्ष देखा कैसे चमकते हैं बारिश के बाद। लेकिन उसको भी पता है कि वृक्ष पत्तों के ऊपर की धूल भर बारिश का पानी साफ़ कर सकता है। पत्तों के भीतर का जीवन तो धरती का पानी ही देता है, और धरती के पानी की उसे कभी कमी नहीं हुई थी क्योंकि धरती में वो गहराई से प्रवेश कर चुका है।

पत्तों को दो चीज़ें चाहिए, धरती से पानी और आकाश से रोशनी, पत्ते को इसके अलावा कुछ नहीं चाहिए। बारिश अब मिल गई है तो बोनस है, बढ़िया है, आज कुछ अतिरिक्त मिल गया। अतिरिक्त मिल गया, नहीं भी मिला होता तो हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। जीवन ऐसा हो जाता है अब जो कुछ भी मिलता है, वो क्या होता है? बोनस, बढ़िया। समझ में आ रही है बात?

ये जो सही नाता रखना चाहिए वो रख लो, उसके बाद जो कुछ भी हो रहा है वो आनंद का ही विषय हो जाता है। क्या है जो महा वट को परेशान कर सकता है? बताओ। मैं छोटे वाले झाड़ों की नहीं बात कर रहा नोएडा के, वृक्ष देखे हैं ये वाले (मोटे तने)।

श्रोता: गोवा में।

आचार्य प्रशांत: हाँ, गोवा में, उत्तर प्रदेश में ही मिल जाएँगे, बस थोड़ा पूर्व की ओर जाना पड़ेगा जहाँ मिट्टी बेहतर है। पहाड़ों पर मिलते हैं, पहाड़ों पर चले जाओ या उधर लखनऊ से फिर पूर्व की ओर चलो, वहाँ मिलते हैं। बिहार में मिलेंगे, बंगाल में मिलेंगे, उड़ीसा में मिलेंगे, उत्तर-पूर्व चले जाओ, वहाँ तो मिलेंगे ही मिलेंगे। इधर ही नहीं मिलते बस, विशेष जगह है ये — पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली। यहाँ वृक्ष के नाम पर लगता है किसी ने आके एक टहनी गाड़ दी है और उस पर इल्ज़ाम लगा दिया है कि तुम पेड़ हो। और टहनी अपनी पूरी ताक़त से, जो भी उसमें जान है, चिल्ला के कह रही है, “ये आरोप मिथ्या है, मुझे देखो इन चरमराए पत्तों को देखो, मैं किस कोण से वृक्ष लगती हूँ?”

समझ में आ रही है बात ये?

ये बहुत बड़ी आज़ादी होती है, सब बढ़िया है, अब आप सिर्फ़ आज़ाद नहीं होते अब आप आज़ादी के नोडल पॉइंट बन जाते हो। अब आपसे आज़ादी हर दिशा में विकीर्ण होती है, ये तो छोड़ दो कि अब आपको पानी सींचने वाले किसी की दरकार है। एक छोटा सा पौधा होता है, वो राह देख रहा होता है, “शाम हो गई, पानी सींचने अभी कोई आया नहीं।” पौधे ये सब करते हैं जानते हो ना, पौधे पहचान लेते हैं पानी देने वाले को जब पानी देने वाला आता है। ये सब प्रयोग हो चुके हैं हम जानते हैं, आप किसी पौधे की ओर आरा लेकर जाइए, उसके भीतर एक प्रकार का स्पंदन होता है। और आप उसको अगर रोज़ पानी देते हैं, उसकी ओर जाते हैं तो आप जब उसकी ओर बढ़ते हैं तो उसमें अलग प्रकार का स्पंदन होता है।

तो एक तो ये है कि पानी देने वाला आ रहा है और मैं उसकी बाट जोह रहा हूँ, और दूसरा ये है कि मैं ऐसा महावृक्ष हो गया हूँ कि मेरे होने से बादल आमंत्रित होते हैं और बादलों के आने से अब सबको पानी मिलता है।

एक तो ये है कि पहले मैं ऐसा होता था दूसरों पर आश्रित, कि मैं देखता था कि कब वो आए, पानी की पाइप लेकर के। और अब मैं ऐसा हूँ कि ये तो छोड़ो कि मैं किसी की आस देखूँ, पानी लेकर आ रहा है। मेरे होने से बादल आ जाते हैं और बादल जब आ जाते हैं तो मुझे तो क्या पानी मिलता है, सबको मिलता है। हमें तो बादल की स्वयं कोई बहुत ज़रूरत भी नहीं थी, हमारे लिए तो हमारी धरती ही काफ़ी थी। हमारी धरती और हमारी जड़ें, हमारे लिए तो काफ़ी थीं पर हमारे होने से अब सब छोटे-छोटे पौधों को पानी मिलता है, सब छोटे-छोटे पौधों को। ये बात जानते हो ना, जहाँ वृक्षों का घनत्व जितना ज़्यादा रहता है वहाँ बारिश उतनी ज़्यादा होती है। ये जो बड़े-बड़े वृक्ष हैं, ये बारिश कराते हैं, “आओ,” कितनी अजीब बात है।

जो छोटा है वो आश्रित है वो दूसरों से माँग रहा है, और जो विशाल है वो दूसरों को दे रहा है, ये मुक्त जीवन होता है। हम दुनिया से क्या लेंगे? हम तो उनको भी आज़ादी दे रहे हैं जो अभी दुनिया से लेने के फेर में फँसे हुए हैं। कुछ आ रही है बात समझ में?

कैसा विचित्र विरोधाभास है, ग़ज़ब की संवेदनशीलता और साथ ही साथ पूरे तरीक़े से एक असंपर्कता, अनिर्भरता, अनाश्रयता। एक ओर तो वृक्ष कह रहा है, तुम हमें छू भी दोगे तो हम इस बात का संज्ञान लेंगे, और दूसरी ओर कह रहा है, तुम हमें लात भी मार दो तो हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता। कितनी ग़ज़ब बात है। जिसमें सिर्फ़ इतना हो गया हो कि आप उसको लात मार दें तो उसको फ़र्क़ नहीं पड़ता वो भी मुक्त नहीं है। उसमें इतनी संवेदनशीलता भी होनी चाहिए कि ओस की बूँदें फिर उसके पत्तों से ऐसे गिरें जैसे आँखों से आँसू गिरते हैं, उसे रोना भी आना चाहिए।

एक ओर तो उसको इस बात से भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आसमान से बूँदें गिर रही हैं कि नहीं गिर रही हैं, और दूसरी ओर रात में चुपचाप ओस जम जाती है और उसके पत्तों से सुबह, जब कोई देखने वाला भी नहीं होता वो बूँदें गिर पड़ती हैं। इतना बड़ा वृक्ष, इतनी नन्ही बूँदें और ये सब कुछ कर रहा होता है बिना किसी को बताए, बिना किसी को दिखाए।

जगत को अधिकांशतः बस उसकी विशालता, उसकी अचलता, उसका विराट वैभव ही दिखाई देता है — बाप रे! और जो उसने स्नेह से चिड़ियों को अपनी छाती में छुपा रखा है, ये किसी को दिखाई नहीं देता। पेड़ को देखते हो तो वहाँ चिड़िया दिखाई देती कभी? ऐसा कैसे हो गया ये जो इतनी दिन भर उड़ती रहती हैं ये कहाँ चली जाती हैं रातों को? इतनी सारी? अरे! यहाँ नहीं हैं ये तो हम बंजर रेगिस्तान में रहते हैं पर जहाँ होती हैं, वहाँ देखना कभी कितनी होती हैं, कितनी सारी होती हैं। कहाँ चली जाती हैं?

एक-एक बड़े वृक्ष पर दर्जनों, कभी सैकड़ों छोटे-छोटे पक्षी बैठे होते हैं रात भर, उनका आपको पता नहीं लगेगा अगर आप इंसान हो। पर अगर आप हैवान हो और उस वृक्ष के नीचे जाकर के कुछ बदतमीज़ी कर दो, आग जला दो या ढोल बजा दो, तो आपको पता चलेगा इसमें कितने पक्षी थे। इतने सारे उड़ेंगे उससे इतने सारे उड़ेंगे कि आप हैरान रह जाओगे उनके पंखों की आवाज़ से, आप कहोगे इस पेड़ में इतने पक्षी बैठे! वो घर है उनका, वो रात को वहीं लौटते हैं, वहीं सोते हैं। आपने क्या सोचा वो रात को अदृश्य हो जाते हैं, आसमान में कहीं खो जाते हैं, नहीं वो पेड़ में जाकर छुप जाते हैं। और वो जो पेड़ है वो कभी किसी को पता नहीं लगने देता कि उसकी छाती में कितने पक्षियों का घर है। वो ऐसे रहता है जैसे सब ठीक है, बढ़िया।

कभी हुआ है कि रात में किसी पेड़ को देखा हो और उसके भीतर कितने पक्षी हैं, ये समझ में आ गया हो। एक भी पक्षी दिखाई दिया कभी? होते हैं, और कहाँ होंगे वहीं तो हैं। और पक्षी वहाँ बस होते नहीं है पक्षी वहाँ पलते हैं। हमारे लिए पेड़ है पक्षी के लिए घर है, वहाँ घोसला है उसका, वहाँ से ही आगे उसके बच्चे आते हैं सब कुछ आगे बढ़ता और कहीं नहीं पता लगेगा कि वो वृक्ष में इतना भारी प्रकृति का कार्यक्रम चल रहा है। लगता है?

जो मजबूती कोमलता के साथ न आए, उसको मजबूती नहीं कहते उसको मृत कठोरता कहते हैं।

राम के वृत्त का ध्यान हुआ आता है, कि खड़े हुए हैं अपने से आकार में कई गुना बड़े राक्षसों के सामने। होगी काव्यात्मक अभिव्यक्ति, तथ्यों के तल पर आप बिल्कुल कह सकते हो कि "नहीं साहब, कोई राक्षस मनुष्य से पाँच गुना बड़ा नहीं होता।" तो मैं काव्य की ही बात कर रहा हूँ, ठीक है।

तो खड़े हुए एक विशाल राक्षस के सामने और तैयार हैं कि या तो उनका वध होगा या उस राक्षस का, दोनों साथ नहीं चल सकते। राक्षस सुधर नहीं सकता और राम समर्पण नहीं कर सकते तो युद्ध ही होना है। भयानक, क्रूर, कठोर राक्षस — दुर्दांत — रक्त बहाने को नहीं, वो रक्त पीने को तैयार।

और वही राम, उनकी हथेली पर वो छिन्गी गिलहरी, गिलहरी भी ये नहीं कि थोड़ा कुछ पहलवान सरीखी हो, कुछ दम होता उसमें तो वो काहे रेत का एक कण उठा के ले जाती। गिलहरियों में भी बिल्कुल ऐसी कि हथेली पर आ जाए और पूरी हथेली पर समा जाए, ये कोमलता, और उससे बात कर रहे हैं। जिसे बड़े से बड़े राक्षस से भय नहीं लगता, आत्मा है जो अकंप रहती है बड़े से बड़े डर के सामने भी, वही फिर होता है जो छोटे से छोटे को भी प्राण देता है।

कर्ण का भी स्मरण हो आता है कि कर्ण खड़े हो गए हैं निश्चित मृत्यु के सामने। कृष्ण को भली-भाँति जानते हैं और कृष्ण आकर के उन्हें युद्ध से पहले जो बड़ी से बड़ी चोट हो सकती थी, दे गए हैं — बता गए हैं कि वो अर्जुन भाई है तुम्हारा छोटा। और अर्जुन को नहीं पता है कि कर्ण भाई है, बड़ा। ऐसी स्थिति में जब युद्ध होगा तो क्या होगा बताओ, दो भाई लड़ रहे हों, और उनमें जो बड़ा है, वो जानता है कि मेरे सामने छोटा खड़ा है। और छोटे को कुछ पता नहीं, छोटे को ये पता है कि सामने दुश्मन खड़ा है। किसका बल कम हो जाएगा?

श्रोता: बड़े भाई का।

आचार्य प्रशांत: बहुत कम हो जाएगा। एक तो बड़ा है, दूसरे भाई है। और जो छोटा है, वो तो सामने बस एक दुश्मन, शत्रु देख रहा है और शत्रु देख भर नहीं रहा है वो जो देख रहा है, वो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है। और कर्ण को बता गए, कर्ण को जैसे ही ये पता लगा है, कर्ण का बल कुछ क्षीण हो गया है। वो बता ही नहीं गए और व्यवस्था कर दी गई कि उनकी शक्ति हट जाए, उनका कवच हट जाए, उनका कुण्डल हट जाए।

जितने तरीक़े की उनके पास चीज़ें थीं, गुरु बोल गए थे कि जो तुम्हारे पास सबसे बड़ा बाण है वो ऐन मौके पर चलेगा नहीं। तो जितने तरीक़े की उन पर बाधा लगाई जा सकती थी, सब लगा दी गई हैं। उसके बाद भी वो कैसे खड़े हुए हैं, निश्चित मृत्यु के सामने कैसे खड़े हुए हैं, बोल रहे हैं, "तू आ अर्जुन।"

जिसका बल हर तरीक़े से कम कर दिया गया हो, जो कृष्ण को जानता है, समझता है। कर्ण दुर्योधन नहीं है, दुर्योधन को कभी नहीं समझ में आया। कर्ण को बातें समझ में आती थीं, कर्ण को पता है कि सामने कौन है। वो जो खड़ा है, छोटा भाई अपना वो छोटा भाई ही नहीं है, वो…। उस छोटे भाई से कर्ण पहले भी हार चुके थे तो ऐसा नहीं कि वो किसी कल्पना-लोक में थे जहाँ कह रहे थे कि "अर्जुन को तो आसानी से हरा ही दूँगा।" वो जानते थे, ये जो छोटा भाई है ये टेढ़ी खीर है। अपने सामर्थ्य पर उन्हें भरोसा था, पर अर्जुन को कोई कम नहीं आँकते थे, तो पता है कौन है।

दूसरे भाई होने के नाते कुछ तो स्नेह मन में रहता ही है ना, छोटे भाई की हत्या के लिए बाण कैसे चलाओगे। कर्तव्यवश चलाओगे भी तो बाजुओं में पाओगे कि ताक़त थोड़ी कम हो गई है, उतनी ज़ोर से नहीं चलाना चाहते कि उसकी छाती ही टूट जाए। और कृष्ण तो खड़े ही हैं उनके सामने भी लेकिन खड़े होकर कर्ण क्या बोल रहे —"अर्जुन, आज आख़िरी दिन है।" और क़रीब-क़रीब आख़िरी दिन कर ही दिया था अर्जुन का, अगर हमें जो वृत्तांत बताया गया है उसको मानें सच, अर्जुन की लीला लगभग समाप्त ही कर दी थी। कृष्ण ने बचा लिया दो-तीन दफ़े अर्जुन को।

एक ओर कर्ण का ये रूप, और दूसरी ओर वही कर्ण हैं कि गुरु सो गए। कोई वही वृक्ष था, उसके नीचे कर्ण बैठे हुए हैं, गुरु वृद्ध थे कुछ सिखा रहे होंगे कर्ण को, थक गए बोले, "सोना है" और कर्ण की जाँघ पर सिर रख के सो गए। अब कर्ण को पता रहा होगा कि थके हुए हैं या सोए नहीं हैं। तो कर्ण ने कहा, "अब ये सो गए हैं तो इन्हें जगना नहीं चाहिए।” तो कोई कीड़ा आता है ना जाने कौन, कोई कीड़ा होगा, अब पेड़ के नीचे बैठे वहाँ कीड़े घूमते रहते हैं तो कोई कीड़ा आया और वो कर्ण की जाँघ में, वहीं जिस जाँघ पर सिर रख के सो रहे थे परशुराम, वहीं पर, वो जाँघ को ही खाने लग गया।

अब वो माँस खाता जा रहा है, खाता जा रहा है, ख़ून बहता जा रहा है। और कर्ण ने अपने शरीर को इतना भी कंपित नहीं होने दिया कि इतना-सा भी अगर शरीर काँपा, तो गुरु की नींद टूट जाएगी। “नींद नहीं टूटनी चाहिए किसी भी हालत मे, चाहे आज सारा ख़ून मेरा बह जाए।” और कीड़ा जो कुछ कर सकता था, जितना पेट भर के वो माँस चाट सकता था, पूरा चाट के वो भी संतुष्ट हो गया होगा। बढ़िया मिला आज, वो चला गया।

तो कहते हैं, वो बहता हुआ जो पूरा ख़ून था, धार वो गुरु के शरीर से जाकर उन्हें गीला-गीला, उनकी नींद खुली। "इतना ख़ून बहा हुआ है? ये क्या है?" कर्ण चुप। और इस बात पर कर्ण को शाप और मिल गया, बोले "बेटा, तुम जो अपने आप को बता रहे हो, तुम वो नहीं हो।" परशुराम थे क्षत्रियों से कहते उनका बैर था, तो “केवल ब्राह्मणों को ही देता हूँ शिक्षा।” बोले "ब्राह्मण तुम हो ही नहीं, ब्राह्मण के पास नहीं होता इतना दम, इतना धीरज, तुम कुछ और हो।" बोला, "मैं तो हाँ, सही बोल रहे हैं आप।" तो वो बोले "शाप दे रहा हूँ। जो कुछ सिखाया है, वो ठीक उस वक़्त काम नहीं आएगा जब तुम्हें उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी।" कथा है पर आशय समझो, जिस प्रयोजन से बता रहा हूँ, वो समझो।

ये संवेदनशीलता।

क्या था कुछ नहीं था, गुरु कोई बुरा मान जाते? इतना ही तो कहना था कि "थोड़ा सा जगिएगा, ज़रा-सा जगिएगा, ये कीड़ा यहाँ आ गया घुस गया, इसको हटा देता हूँ फिर सो जाइए। कोई बात नहीं।" और किसी भी बहाने से बोल सकते थे। बोलते, "ये भी हो सकता है कि कीड़ा अभी मुझे खा रहा है, और मुझे खाने के बाद आपको काटने लग जाता, मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आप थोड़ा सा जग जाइए। कीड़ा हटा दें, तो फिर सो जाइए।" या कि "गुरुदेव, आप यहाँ क्यों सो रहे हो? यहाँ तो धूप बहुत बढ़ रही है, चलिए, आपके लिए अंदर भीतर में बिस्तर लगाए देता हूँ। गुरुदेव भी कहते हैं "हाँ, सही बात है, यहाँ बाहर काहे के लिए सो रहा हूँ मैं।"

अब जाँघ पर सिर रख के सोना, कर्ण की जाँघ है पत्थर जैसी जाँघ रही होगी। उस पर सिर रख के सोना कोई बहुत सुविधा की बात तो है नहीं, किसी भी बहाने से जगा सकते थे। एक ज़बरदस्त इंसानियत आ जाती है आप में, यही तो मानवता की निशानी है ना — एक अद्भुत कोमलता।

चीन में इसको यिन-यांग बोलते हैं, ऐसे समझ लीजिए कि बाहर से स्त्री जैसी कोमलता और भीतर से पुरुष जैसी कठोरता। और दोनों एक साथ ही चल सकते हैं कोई एक होगा तो नहीं चलेगा। जो बाहर से कठोर है वो भीतर से खोखला होगा, नारियल। इतना मुक्त इस जगत से कि पूरे हो गए जगत के। विरोधाभासी बात है, सब नहीं समझते।

दुनिया से इतने आज़ाद कि अपने आपको दुनिया को पूरी तरह दे दिया — आत्मस्थ, प्रकृतिस्थ वो हल्के लोग होते हैं, जिन्हें अपनी मुक्ति के लिए दुनिया से किनारा करना पड़ता है, ये तो डरे हुए हैं ये कहाँ से आज़ाद हैं? जो डरा है, वो आज़ाद है क्या? आपसे मुक्त होने के लिए मुझे आपसे दूर भागना पड़े तो मैं मुक्त हूँ? मैं तो डरा हुआ हूँ।

मुक्ति की पहचान परीक्षा ही ये है, कि चल रहा है बाहर सब गुणों का प्रवाह और भीतर आत्मा खड़ी है अस्पर्शित। भीतर सारे प्रवाह के?

श्रोता: मध्य में।

आचार्य प्रशांत: और जो सारे प्रवाह के मध्य में नहीं खड़ी हो सकती, उसका कुछ नहीं है। जो प्रवाह से भागे हुए हैं, जिन्हें डर लगता है उनके लिए कुछ नहीं है, वो फिर नैतिकता के मारे हुए लोग हैं। उनका वही है जिनको साहब ने कहा है ना, "नदी किनारे मैं खड़ी, ज्यों जल मैला होय।" उनका यही हाल रहता है। कौन-सी नदी की बात हो रही है? प्रकृति के प्रवाह की। वो प्रकृति से दूर हटकर खड़े हो जाते हैं, "नदी किनारे मैं खड़ी, ज्यों जल मैला होय।" मैं मैली,

प्रकृति उनको ही मैली लगती है, जो स्वयं मैले होते हैं।

तो खड़ी तो यूँ हो जैसे "अरे, पानी को छू दूँगी तो मैं गंदी हो जाऊँगी, माय गॉड!" फ़िल्थी।

"नदी किनारे मैं खड़ी ज्यों जल मैला होय। मैं मैली पिया उजले, मिलन कहाँ से होए।।"

~ संत कबीर

मैले ख़ुद हो और मैला बता रहे हो संसार को। नदी माने संसार — यही प्रकृति का पूरा प्रवाह, तीनों गुणों की गति। मैले तुम हो और लांछन किस पर डाल रहे हो? प्रकृति पर। मैले तुम हो। और जब तक तुम मैले रहोगे, आत्मस्थ नहीं हो पाओगे। “मैं मैली पिया उजले, मिलन कहाँ से होए।।"

जो आत्मस्थ नहीं है जब वो प्रकृति का संसर्ग करेगा तो क्या होगा? उखड़ जाएगा। वो उखड़ जाएगा जैसे कोई नन्हा पौधा। नन्हे पौधे को बचा के रखते हो ना तमाम तरीक़े की ताक़तों से, आवेग से। तो जो लोग आत्मा में स्थापित नहीं होते, पर जगत के अनुभवों का रस लेने निकल पड़ते हैं, जगत उनको उखाड़ मारता है। एक तो इस स्थिति से बचना है।

और दूसरा अगर आप कह रहे हो कि जगत से आप पर कोई अंतर नहीं पड़ रहा, आपका कोई पत्ता ही नहीं हिलता, आप इतने ज़बरदस्त तरीक़े से स्थापित हो अपनी मिट्टी में, तो उसका मतलब ये होगा कि आप वृक्ष तो हो, लेकिन सूखा हुआ ठूँठ हो, आप में जीवन नहीं है। और ये दोनों तरह की ग़लतियाँ होती हैं, पहली ग़लती संसारी करता है, और दूसरी ग़लती त्यागी करता है।

संसारी का पौधा कैसा होता है? दुबला, और वो क्या करता है दुनिया में कूद पड़ता है। और दुनिया में जो कुछ है, वो उस दुबले पौधे को बर्बाद कर देता है। धूप उसे जला देगी, पानी कम हुआ वो सूख जाएगा, अतिवृष्टि हो गई तो वो बह जाएगा, हवा ज़्यादा चल गई तो उखड़ जाएगा, बकरी आ गई खा जाएगी, कोई बच्चा आ गया खेलता-कूदता, खींच-खाँच देगा, पत्तियाँ नोच देगा। जो कुछ भी है दुनिया में, ऐसे पौधे के लिए जानलेवा होगा जिसकी जड़ें अभी आत्मा में गहरी नहीं उतरी हैं।

लेकिन संसारी यही करता है, वो अभी स्थापित तो हुआ नहीं है, दुनिया में खेलने निकल पड़ता है। कहता है, "अब हम खेलेंगे।" अरे, तुम नहीं खेल रहे हो, अब दुनिया तुमसे खेलेगी। खेलने का हक़ उसको है, जो पहले वट जैसा हो गया हो, वो खेले। भारी बरगद को दुनिया से खेलने का हक़ है, वो नन्हे कमजोर पौधे को नहीं है। और ये जो छोटे वाले होते हैं, इनको ज़्यादा लत उठती है कि "हमें जाना है खेलने।" थोड़ी देर में बकरी डकार मारती है। कहती है, "बढ़िया था।"

और कोई ऐसा मिले जिसको कोई बकरी खाती नहीं, जिस पर बारिश का असर होता नहीं, जिस पर धूप का असर होता नहीं, लेकिन साथ ही साथ हवा के साथ जिसका पत्ता डोलता नहीं — इसका मतलब वो क्या है? वो सूख गया। छोटा पत्ता बन के बकरी के पेट में चले जाना भी आसान है, और कोई बकरी आपको खाने की स्थिति में ही ना रहे, इस उद्देश्य से बिल्कुल सूख जाना वो भी एक विधि है। ना रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी और ना रहेगा पात, न खाएगी बकरी। तो मैं पत्ता ही नहीं छोड़ूँगा। ये भी अध्यात्म में चलन रहा है, अपने कोई पत्ता ही नहीं, कोई हरापन ही मत छोड़ो कोई क्या खाएगा तुमको।

हमें हरा आदमी चाहिए। सूरज से आग बरस रही हो, वो तब भी हरा रहे, न सिर्फ़ ख़ुद हरा रहे पता नहीं कितनों को शरण दे, कितनों को छाया दे। हमें ऐसा आदमी नहीं चाहिए जिस पर किसी का असर नहीं पड़ता, हमें ऐसा आदमी चाहिए जिस पर असर पड़ता है। हवा है, उस पर असर पड़ता है, पक्षी है, कुछ है जो भी है दुनिया में उस पर असर पड़ता है। और उसके केंद्र में कुछ ऐसा है जो सर्वथा बेअसर रहता है, उस पर कोई असर नहीं पड़ता।

समझ में आ गई बात ये?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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