ज्ञानी-जो निर्विशेष है || आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर (2014)

*क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।*क्व तद् विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा।।
-अष्टावक्र गीता(२०.४)
वक्ता: एक तो वो आदमी होता है जो दुनिया में इस कदर खोया होता है कि उसको समझने की कोई कोशिश ही नहीं करता है। वो कहता है, “इसमें समझना क्या है? यह तो ऐसा है ही। ऐसा होता ही है। यह तो एक अनिवार्य सत्य है।”
उससे ऊपर एक दूसरा आदमी होता है जो सोचता है कि दुनिया को इस तरह समझ लिया कि संसार को सिद्धांतों में बांध लिया। तो संसार में अगर कोई घटना घटेगी, तो जो पहले किस्म का आदमी है, उससे पूछो, “क्यों घटी?,” तो कहेगा, “मुझे पता नहीं, घटनी थी तो घट गई, मैं नहीं जानता।” वो यह भी कह सकता है, “कोई कारण होता भी है क्या? कोई वजह होती है क्या, कोई सिद्धांत होता भी है क्या?”
जो दूसरे किस्म का आदमी है, जिसने दुनिया को समझने की थोड़ी तो कोशिश की है, जिसने दुनिया को सिद्धांतों में बाँट लिया है, वो कहेगा, “यह घटना इसलिए घटी क्योंकि प्रारब्ध था।” वह कहेगा, “तुम्हारे साथ जो भी हुआ वह इस कारण हुआ क्योंकि तुम्हारा कर्मफल था।” उसने जीवन को समझने की कोशिश में जीवन को सिद्धांतों में बाँध लिया है।
मैं दोहरा रहा हूँ, पहला आदमी है, जो ज़िन्दगी पर नज़र ही नहीं डाल रहा। उसको कहीं कोई सूत्र, कहीं कोई धार, कहीं कोई तारतम्य दिखाई ही नहीं दे रहा है। उसको कहीं दो कड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई दिखाई ही नहीं पड़ती हैं। वह इतना स्थूल जीवन जी रहा है कि घटनाएँ आपस में जुड़ी भी हो सकती हैं, कि एक ताल के नीचे दूसरा तल भी हो सकता है, इसकी उसको भनक भी नहीं लगती है। तो यह तो पहले किस्म का आदमी है।






