घर जला देने को क्यों कह रहे हैं? || आचार्य प्रशांत, कबीर साहब पर (2019)

कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ। जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।। ~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कबीर दास जी घर को जला कर कहाँ चलने को कह रहे हैं? वो जगह हमारे इस घर से कैसे भिन्न है? हम तो जहाँ जाते हैं, वहीं अपना घर बना लेते हैं। कृपया, समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: इस पर ख़ूब बोला है। इस पर कुछ नहीं तो आधा दर्जन वीडियो होंगे मेरे, पर दोहराए देता हूँ।
संतजन जो कुछ भी बोलते हैं, भले ही वो स्थूल तल पर बोला गया है, पर वो एक इशारा होता है, एक प्रतीक होता है जो आपको किसी सूक्ष्म चीज़ की याद दिलाने के लिए बोला होता है।
हम जब कहते हैं 'घर', तो जैसी हम स्थूल ज़िंदगी जीते हैं, वैसे ही स्थूल आशय होते हैं हमारे 'घर' से। तो हम जब कहते हैं 'घर', तो हमारा मतलब होता है ये ईंट-पत्थर इत्यादि-इत्यादि, ये सब मोटी बातें।
जब संत कहें 'घर', तो उनका मतलब है वो जगह जहाँ तुम रह रहे हो। और उनके लिए इस ‘तुम’ शब्द का अर्थ थोड़ा अलग होता है। वो तुम्हारी वास्तविक पहचान की बात कर रहे हैं। तुम कहाँ रहते हो, तुम्हारे मन की बात कर रहे हैं। उनसे पूछोगे तो वो कहेंगे कि तुम ये ईंट-पत्थर में थोड़े ही रहते हो, तुम अपने मन में रहते हो।
अगर ईंट-पत्थर में ही तुम रहते होते तो जितने लोग ईंट-पत्थर के भीतर थे, उन सब का घर एक होना चाहिए था, उन सबको एक-ही जगह मौजूद होना चाहिए था। पर अगर एक ही कमरे में दस लोग हैं, तो ईमानदारी की बात ये है कि उन सबकी मौजूदगी अलग-अलग जगह होती है। होती है कि नहीं? एक ही कमरे में दस लोग मौजूद हों भले शारीरिक रूप से, लेकिन वो सब होते अलग-अलग जगह हैं।






