गीता का गणित, और श्लोकों के सही अर्थ की विधि || आचार्य प्रशांत, भगवद्गीता पर (2023)

आचर्य प्रशांत: श्रीमद्भगवतगीता अध्याय २ सांख्य योग।
निष्काम कर्मयोग की एक विशिष्टता अर्जुन को बतायी श्रीकृष्ण ने कि निष्काम कर्मयोगी भीतर की चलायमान कामनाओं से मुक्त हो जाता है। निष्कामता का अर्थ ही यही है न;मतलब भीतर जो उपद्रव मचा रहता है उसके आम आदमी के बेचैनी, लहरें, डावाडोल रहना, यह निष्काम कर्मयोगी में नहीं पायी जाती। इस पूरी बात में जो चीज़ अर्जुन को बहुत आकर्षक लगी वो है आंतरिक चंचलता से, आंतरिक अशांति और अस्थिरता से मुक्ति।
तो निष्काम कर्मयोग के विषय में अर्जुन ने उसी पक्ष को लेकर फिर प्रश्न भी करा। क्योंकि अर्जुन की जो स्थिति है वो भीतर जैसे भूकंप आया हो इतनी अस्थिरता की है। तो वहाँ से फिर आप देखेंगे तो तार्किक लगेगा की अर्जुन पूछते हैं कि ‘स्थितप्रज्ञ’ के लक्षण बता दीजिए। ‘स्थितप्रज्ञ’ होता कौन है? पूरी श्रृंखला के बीच से एक तार है जैसे— माला में फूलों के बीच एक सूत्र होता है। उसकी ख़बर रखनी ज़रूरी है नहीं तो पता नहीं चलेगा कि एक बात से दूसरी बात कैसे उद्भूत हो रही है।
तो अर्जुन ‘स्थितप्रज्ञता’ के विषय में जिज्ञासा करते हैं। इससे अर्जुन के मनोदशा का हमने कहा हमें यह पता चला कि भीतर घोर अस्थिरता है। ख़ैर, ‘स्थितप्रज्ञ’ के लक्षण इत्यादि पूछते हैं क्योंकि अभी गहराई से डर रहे हैं, कृष्ण से डर रहे हैं न, सत्य से डर रहे हैं। और सत्य माने गहराई तो किसी भी बात की गहराई में जाने से डर रहे हैं। तो ‘स्थितप्रज्ञ’ को लेकर भी एकदम जो सतही सवाल हो सकता है, वो पूछते हैं, कहते हैं, “उसका व्यक्तित्व कैसा होता है? आचरण कैसा होता है? दिखता कैसा है? चलता कैसा है? क्या बोलता है? कैसे बैठता है? यह बताइए?”
पर कृष्ण क्यों अर्जुन के सीमित प्रश्न का सीमित ही उत्तर दें? तो वो ‘स्थितप्रज्ञता’ के विषय में पूरी ही बात बताने लगते हैं। और ‘स्थितप्रज्ञ’ को कई कोणों से वर्णित करते हुए बल्कि परिभाषित करते हुए अभी हमने पिछले सत्र में देखा की अंततः कूर्म, माने कछुए का भी उदाहरण देते हैं कि ‘स्थितप्रज्ञ’ वो है, “जिसने अपनी इंद्रियों को बाहर से भीतर खींच लिया है।“ अब आज हम जो सूत्र लेने जा रहे हैं इसमें ‘कूर्मसूत्र’ की सीमा बताएँगे कृष्ण।






