फालतू आत्म-विश्वास, पालतू डर || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: जय हिंद आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि जैसे आपके एक विषय पर कई-कई वीडियोज हैं। तो कभी-कभी ऐसा होता है कि दो बातों में, एक ही विषय है, लेकिन विरोधाभास सा प्रतीत होता है। जैसे कि भय पर आपने बोला है तो भय पर कहते हैं कि हर उस आवाज़ को नकार दो जो तुम्हें भयभीत करती हो, वह आवाज़ तुम्हारी हितैषी नहीं हो सकती। लेकिन फिर एक दूसरे वीडियो में ये भी कहते हैं कि इंसान को कभी निर्भय होना नहीं चाहिए क्योंकि अगर वो निर्भय होता है तो ये झूठी निर्भयता है, ऐसा आत्मविश्वास आपको ही ले डूबेगा।
तो इसको हम अगर ऐसे देख सकते हैं कि सत्य इतना बड़ा है कि द्वैत के दोनों सिरे उसमें समाहित हैं या फिर हम इसको ऐसे देखें कि सत्य का जो मार्ग है वो स्थिति सापेक्ष है, उसमें कोई एक सिद्धान्त हमेशा के लिए लागू नहीं हो सकता।
आचार्य प्रशांत: दूसरी बात।
प्र: दूसरी बात?
आचार्य: तुम जो कुछ भी हो, वही तुम्हारा बन्धन है न। तुम छोटे हो तो तुमसे कहा जाएगा, छोटे मत रहो। तुम बहुत बड़े बने बैठे हो, तुमसे कहा जाएगा कि इतने बड़े मत बनो। तुम जो कुछ भी बने बैठे हो, वही समस्या है। जो भय वाली बात तुमने कही, ठीक है, पहली बात ये कि भयभीत मत हो जाना। और जो दूसरी बात कही कि भयभीत तो तुम हो ही और उसके ऊपर तुम निर्भयता का स्वाँग ओढ़े हुए हो, ये तुम्हारे भय को और सुरक्षित कर देता है। तुम्हारे भय के ऊपर निर्भयता का कवच चढ़ा हुआ है, झूठा कवच। भीतर भय है और उसने क्या अपने ऊपर डाल रखा है? निर्भयता का स्वाँग। मैं इस झूठी निर्भयता के ख़िलाफ़ बोलता हूँ।
क्यों भय के ख़िलाफ़ इतना बोलना पड़ता है, समझना। जितने लोग भयभीत हैं, अगर उनके आचरण में, उनके चेहरों में, उनकी आवाज़ में, व्यवहार में, साफ़-साफ़ भय झलक ही रहा होता तो मुझे क्यों बोलना पड़ता कि देखो, तुम कितने डरे हुए हो? क्योंकि तब तो स्पष्ट ही होता कि वो डरे हुए हैं न। हम लेकिन बड़े हुनरमन्द लोग हैं, हम हैं डरे हुए और ऊपर-ऊपर से निर्भयता का, आत्मविश्वास का ढोंग करते हैं। ऐसों को मैं बोलता हूँ कि ये निर्भयता किसी और को दिखाना, ये निर्भयता बहुत घातक है।









