प्रश्न: सर, दूसरों को समझाना बड़ा आसान होता है लेकिन जब खुद पर बात आती है तो इन्सान अमल नहीं का पाता। ऐसा क्यूँ?
वक्ता: मज़ा आता है न। दूसरे को समझाना बड़े मज़े की चीज़ है। हम दूसरे को समझा-समझा के खुद को ये दिलासा दिए रहते हैं कि हम समझदार हैं। दुनिया को देखो, तो कितने लोग हैं जो मदद करने के लिए उत्सुक हैं? कुछ दे दें दूसरे को, समझा दें, अक्ल दे दें, नसीहत दे दें। अहंकार इससे खूब बढ़ता है। मन कहता है, ‘’वाह! तू खूब बड़ा, तूने किसी को कुछ दे दिया’’ और इस दूसरे को समझ देने में, दिशा देने में, ज्ञान देने में मन को एक सहूलियत हो जाती है। क्या सहूलियत हो जाती है? कि उसे अपनी ओर नहीं देखना पड़ता। पर हम मन से कभो ये नहीं पूछते कि, ‘’क्या तुझे अपने अच्छे-बुरे का पता है? क्या तुझे पता कि है तेरे लिए क्या उचित है? और जब तुझे अपने अच्छे-बुरे का नहीं पता, जब तू ये नहीं जानता कि तेरे लिए क्या उचित है तो तू दूसरे को नसीहत कैसे दे सकता है? जब तू आज तक अपनी ही मदद नहीं कर पाया तो तू दूसरे की मदद कैसे कर सकता है?’’
पर तुम दुनिया को देखो, हर कोई दूसरे की मदद करने को तैयार बैठा है। दुनिया भरी हुई है ऐसे लोगों से जो सिर्फ़ मदद और मदद ही करते रहते हैं। उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम है: मदद करना। अपने जीवन को देखने में, वो या हम, कोई उत्सुकता नहीं दिखाते क्यूँकी अपने जीवन को देखेंगे तो कुछ वास्तविक करना पड़ेगा। वहाँ अहंकार, टूटेगा, वहाँ सत्य के संपर्क में आना पड़ेगा, वहाँ चोट लगेगी। वहाँ हमारे ढांचों को टूटना पड़ेगा, हमारी कल्पनाओं को टूटना पड़ेगा। तो वो कौन करे? अपनी मदद कौन करे?
गौरवान्वित कर दो इस बात को कि दूसरों की मदद करनी चाहिए और हमें लगातार सिखाया भी यही गया है कि दूसरों के काम आओ! ये तो हमसे कभी कहा ही नहीं गया कि पहले अपने तो काम आओ और हमने कभी ये बुला कर पूछा भी नहीं कि, ‘’यदि मैं अपने काम नहीं आ सकता तो दूसरों के काम कैसे आऊंगा?’’ जो खुद सड़क नहीं पार कर सकता वो दूसरों को कैसे पार कराएगा? जो खुद अँधा है वो दूसरों को कैसे राह दिखाएगा? संत कबीर ने कहा है, ‘अँधा –अंधे ठेलिया’। कबीर ने दुनिया को ऐसे ही देखा कि अँधा अंधे को रास्ता दिखा रहा है। वही हमारा हाल है।




