आचार्य प्रशांत: एकाध-दो लाइनें बताओ सब लोग। बताओ, बता सकते हो तो अपनी-अपनी। इतना गाया है। (भजन कराने वाले स्वयंसेवक से प्रश्न करते हुए) सब तुम्हीं ने गाया है या औरों ने भी गाया है?
स्वयंसेवक: सभी ने गाया है।
आचार्य: एक-एक दो-दो लाइनें बताओ जो एकदम झनझना गई हों। कुछ मेरा भी एनरिचमेंट (समृद्धि) हो।
पीले प्याला हो मतवाला, प्याला नाम अमीरस का रे। बालापन सब खेल गँवाया, ज्वान भयो नारी बस का रे॥
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, 'बालपन सब खेल गँवायो', तो वो तो सभी खेलते ही हैं बालपन में तो फिर गँवाना क्या हुआ उसके अंदर?
आचार्य: इस सेंस (अर्थ) में कि तुम अपनी टोटल ऐज (आयु) गिनते हो साठ-सत्तर, जिसमें से बीस तो बाय डिफ़ॉल्ट माइनस है। कबीर साहब ये नहीं बोलते तुमसे अगर तुमने साठ की उम्र में अपनी उम्र बताई होती चालीस। पर तुमने एकाउंटिंग एरर (लेखा त्रुटि) कर रखा है न! नहीं समझे? एक ओर तो तुम अभी आर्ग्युमेंट







