प्रश्न: एक तरफ तो सम्मुख होने को महत्व दिया जाता है, दूसरी तरफ यह भी कहा जाता है कि निकटता जानने में बाधा है। ऐसा क्यों?
वक्ता: दूसरे शब्दों में, सवाल यह है कि एक तरफ तो ये कहा जाता है कि बिना करीब आये जान नहीं पाओगे, दूसरी तरफ ये भी कहा जाता है कि ये निकटता ही जानने से रोकती है। कौन है? किसको करीब आना है? किस तल पर बात की जा रही है? अब अपने आसपास के लोगों को देखिये, उनकी निकटताओं को देखिये, तो समझिये कि आमतौर पर हमारे लिए निकटता का क्या अर्थ होता है। दो लोग जो आपको बहुत आसपास दिखें, जो बड़े करीबी हों एक-दूसरे के, तो वहाँ पर क्या घटना घट रही होती है? या आपको ही किसी वस्तु से नज़दीकी बहुत पसंद है, तो वहाँ पर क्या घटना घट रही होती है? या तो शरीर से शरीर का आकर्षण है, या कोई मानसिक अनुराग है।
ये करीब आना नहीं हुआ, ये करीब आने के विपरीत हुआ। हम जिसे निकटता बोलते हैं वो निकटता है ही नहीं। जब आप कहते हैं कि आप किसी के करीब हैं, तो आपका आशय यही होता है कि आप शारीरिक रूप से बहुत करीब हैं उसके। आप बहुत समय गुज़ारते हैं उसके साथ। और यदि समय नहीं गुज़ार पाते हैं, तो आप उसकी स्मृतियों में रहते हैं। आप ख़्याल खूब करते हैं उसका। या तो दैहिक रूप से निकटता है, आप उसके आसपास रहते हैं, साथ खाते-पीते हैं, उठते-बैठते-चलते हैं, या फिर आप उसके विषय में ख़्याल-विचार करते हैं। यही तो है न निकटता से आपका आशय? जब आप कहते हो कि आप किसी के निकट हो, तो यही आपका निकटता से आशय होता है? ये निकटता है ही नहीं।
संसार के नियम सत्य पर लागू नहीं होते। जब कहा जाता है कि करीब आओ तो ही जान पाओगे, तो इस करीब आने की बात नहीं की जा रही है। अर्थ का अनर्थ मत कर लीजियेगा। करीब वही आ सकता है जिसमें करीब आने का सामर्थ्य है। शरीर में करीब आने का सामर्थ्य है ही नहीं। तुम किसी के शरीर के कितने भी करीब चले जाओ, यह निकटता नहीं है। तुम करीब जाते ही इसीलिए हो ताकि तुम उसके शरीर को भोग सको। भोग तुम तभी सकते हो जब तुम्हारा शरीर भी कायम रहे। अलग रहना ज़रूरी है। तो निकटता कहाँ बनी? तुम्हारी तथाकथित निकटता, दूरी के बिना चल ही नहीं सकती।




