(आचार्य जी और कुछ स्वयंसेवी एक रेस्तराँ में बैठे हुए हैं, तभी एक स्वयंसेवी रेस्तराँ के छत के ढाॅंचे को लेकर बातचीत करते हैं।)
प्रश्नकर्ता: मैंने जो देखा यहाँ पर कि ये जो स्ट्रक्चर (ढाँचा) है जो इसको डेकोरेट (सजाना) किया गया है, तो इसको बनाने में जो मेहनत लगी होगी और जो इसको यहाँ पर एक ब्यूटी (सुन्दरता) भी दे रहा है, तो ऐसे ही लाइफ़ (जीवन) में अगर कुछ ऊँचा या कुछ ऊँची क्वालिटी (गुणवत्ता) लाइफ़ में लानी हो, तो उसमें भी उतनी ही मेहनत लगती है, तभी उतनी फिर ब्यूटी भी देती है।
जैसे अगर कोई इंस्ट्रूमेंट (यन्त्र) ही सीखना हो, म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट (संगीत यन्त्र) या कोई स्पोर्ट्स (खेल) हो, किसी भी फ़ील्ड में।
आचार्य प्रशांत: देखो, दो तरह की ब्यूटीज़ (सुन्दरताएँ) होती हैं।
बहुत अच्छे से समझना, ठीक है?
दो तरह की ब्यूटीज़ होती हैं। एक होती है, प्राकृतिक सुन्दरता। प्रकृति में सुन्दरता है, बतख में, पहाड़ में, नदी में, कंकड़ में भी है, शेर में, खरगोश में, तभी हमको अच्छे भी लगते हैं। दूसरी तरह की सुन्दरता होती है जो आदमी ने बनायी है, माने कि चेतना ने बनायी है। आदमी द्वारा बनाना माने चेतना द्वारा बनाना न? प्रकृति में जो सुन्दरता होती है उसके पीछे कोई चेतना वगैरह नहीं है। खरगोश, खरगोश जैसा पैदा होता है उसको खरगोश बनना नहीं पड़ता कि मैं ऐसे ही पैदा हुआ हूँ, सामान्य,




