आचार्य प्रशांत: सब बन्धनों के मूल में क्या है? न जानना। बाक़ी सब बातें हटाइए। सौ कारण इधर-उधर के छोड़िए, कि अरे नहीं! उस दिन क्या हुआ था कि ट्रेन लेट (देर) हो गयी थी, इसलिए गड़बड़ हो गयी। नहीं जानते। लेकिन किसको नहीं जानते, यहाँ पेंच है। यहाँ तो कह दिया, “अनादि-अनन्त, विश्व-सृजेता, अनेक रूपों वाले और विश्व को अपनी सत्ता से आवृत करने वाले को जानकर मुक्ति मिलती है”, तो ऐसा लगता है कि बन्धन मिलता होगा उस ‘अनादि-अनन्त’ को ही न जान करके। नहीं, यहाँ पर थोड़ा सा समझना है।
बन्धन मिलता है माया को न जानकर के। जो अनादि-अनन्त है, वो अज्ञेय भी है, उसको जाना नहीं जा सकता। तो आपका अपराध ये नहीं है कि आपने अनादि-अनन्त को नहीं जाना। अपराध ये है कि आपने उसको नहीं जाना जिसको जाना जा सकता था। अज्ञेय को नहीं जाना, ये कैसे अपराध हो सकता है? जो अज्ञेय है, उसका अगर आपको ज्ञान नहीं तो ये कौनसा अपराध है? ये तो अपराध है ही नहीं।
वो बोलते हैं न ‘अरे! ब्रह्म को नहीं जाना इसीलिए बच्चा तुम तकलीफ़ में हो।’ बच्चा तकलीफ़ में ब्रह्म को न जानने के कारण नहीं है, बच्चा तकलीफ़ में माया को न जानने के कारण है। उसी के विरुद्ध सावधान रहना है, “महा ठगिनी हम जानी।” भीतर है, बाहर है, वही है। समझ में आ रही है बात? उसी को जानना है। जो उसको जान गया, वो मुक्त हो गया।
और मुक्ति हमें थोड़ी सी रसहीन चीज़ लगती है न, कि मुक्ति ऐसा लगता है जैसे कहीं बैठकर के बड़े मज़े कर रहे थे और उसने कहा कि वी आर क्लोज़्ड नाउ (दुकान बन्द है) या वी आर क्लोज़िंग नाउ (अब हम बन्द कर रहे हैं)। मुक्ति? 'नहीं-नहीं! अभी थोड़ी देर और, वन लास्ट ऑर्डर (एक आख़िरी आदेश)'।




