न दृष्टा न सृष्टा न स्वास्थ्य न व्याधि, समाधि की इच्छा का लोप ही है समाधि || (2016)

प्रश्नकर्ता: सर, ध्यान में एक चीज़ होती है मेरे साथ कि जब लगता है सब छूट गया तब दृष्टा को छोड़ता हूँ तो निद्रा पकड़ती है, बेहोशी छाने लगती है। दृष्टा को रखूँ या दृष्टा को जानें दूँ? या साक्षित्व तो पता नहीं क्या है। कृपया प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: ना बात दृष्टा को रखने की है, ना बात साक्षी को रखने की है; इन सब के पीछे जो तुम बैठे हो, दृष्टा, साक्षी, ये तो तुम्हारे हाथ के खिलौने हैं। खिलौने बदल भी लोगे तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा, खेलने वाले तो तुम ही हुए। आज दृष्टा कह रहे हो, साक्षी कह रहे हो, कल तुम कोई विधि, कोई और यंत्र ले आओगे फिर उसकी बात करोगे, क्या फ़र्क़ पड़ता है। तुम ही लेकर आए हो, तुम ही छोड़ भी सकते हो।
अपने किए की सीमा जानना, बस ये है। अभी जब तुम सवाल कर रहे हो, तुम्हारे सवाल में बड़ी अकड़ है। पूछ तो ज़रूर ये रहे हो कि क्या करूँ, जैसे नहीं पता, लेकिन भावना ये है कि तुम्हारे करे कुछ हो जाएगा। भावना ये है कि ना सोऊँ तो शायद कुछ हो जाए; दृष्टा को पकड़ लूँ तो शायद कुछ हो जाए; साक्षी को पा लूँ तो शायद कुछ हो जाए। भावना लगातार यही है कि, "मेरे करे होगा।"
तुम्हें जो करना है करो। मन के हज़ार रंग, तुम्हें जिस रंग से खेलना है खेलो! पर ये बात छोड़ दो कि कोई भी रंग सत्य का रंग है। तुम्हें जिस दिशा जाना है जाओ। तंत्र, मंत्र, यंत्र – तुम्हें जो इस्तेमाल करना है करो, और नहीं करना तो मत करो। बस ये मान्यता छोड़ दो कि तुम्हारे कुछ करने से, या ना करने से कुछ आना-जाना है। ना तुम्हारे करने से कुछ होना है, ना तुम्हारे ना करने से कुछ होना है।
तुम्हारा दुःख भी बार-बार इसी बात को वैधता देता है कि कुछ होना चाहिए था जो हुआ नहीं। जान लो साफ़-साफ़ कि कुछ नहीं है जिसकी ज़िम्मेदारी है होना; कुछ नहीं है जो विशेषतया प्राप्य है तुम्हारे लिए।

