मैं तुम्हें इतना डाँटता क्यों हूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

वक्ता: कोई भी कर्म दो ही वजह से निकल सकता है।कहाँ से?
सभी श्रोतागण: बेहोशी या समझ।
वक्ता: डाँट भी दो ही वजह से निकल सकती है। मैं किसी को इसलिए भी डाँट सकता हूँ क्योंकि मैं बहुत आहत अनुभव कर रहा हूँ। अभी जो मेरी डाँट है यह पूरे तरीके से सेल्फ-सेंट्रिक है। मुझे तुम्हारा भला करने की कोई फ़िक्र नहीं है। मैं तुम्हें डाँट इसलिए रहा हूँ क्योंकि मुझे चोट लग गयी है। यह डाँट तुम्हारे किसी काम नहीं आएगी। दूसरी ओर मैं तुम्हें इसलिए भी डाँट सकता हूँ ताकि तुम्हारा भला हो। बात समझ रहे हो? तो पहली डाँट निकली बेहोशी से और दूसरी डाँट निकली होश से। तो तुम्हें देखना पड़ेगा कि कोई तुम्हें क्यों डाँट रहा है। हो सकता है वो प्रेम के कारण डाँट रहा हो। प्रेम में भी डाँटा जाता है। प्रेम में डाँटा ही नहीं जाता, प्रेम में बड़ी ज़ोर की पिटाई भी हो जाती है। पिटाई भी दो वजह से हो सकती है। इससे नफरत है इसलिए पीटूँगा, और प्रेम है इसलिए पीटूँगा। दोनों ही वजह से पीट सकते हो। तो कुछ तय नहीं कर सकते कि कोई नियम है या नहीं।
तुमने कहा कि कोई तुम्हारे ऊपर अधिकार जमा रहा है। हाँ, इतना पक्का है कि जिसे तुमसे प्रेम होगा वो यह नहीं चाहेगा कि तुम्हें जकड़ ले। अधिकार नहीं चाहेगा। हाँ डाँट तो सकता है क्योंकि प्रेम अधिकार नहीं जताता, प्रेम मुक्ति देता है। जो तुम्हें वास्तविक रूप से प्रेम करता होगा, वो तुम्हारी ज़िन्दगी में गाँठें नहीं लगाएगा। तुम्हारे मनन को दबाएगा नहीं, संकुचित नहीं करेगा। यह पक्का है। ठीक है? हाँ तुम ये देखो कि क्या कोई तुमको सिर्फ इसलिए डाँटता रहता है, तुम पर अपना वर्चस्व जमाता रहता है क्योंकि उसका अपना अहंकार है, तो फिर उस आदमी के पास कभी मत जाओ। बेशक मत जाओ। वो आदमी भी इस लायक नहीं है कि तुम उससे बातचीत करो, क्योंकि अब वो तुम्हारा उपयोग सिर्फ अपने अहंकार को पुष्ट करने के लिए कर रहा है। अब वो तुम्हारे किसी काम का नहीं है। समझ रहे हो बात को?
तो मैंने कहा कि डाँट प्रेम में भी हो सकती है। मैं तुमको अब एक विपरीत बात भी बोलता हूँ। प्रेम का प्रदर्शन बड़ा अहंकार की वस्तु भी हो सकती है। मैंने कहा कोई नियम नहीं है। कोई तुम्हें डाँटे, तो ये मत समझना कि तुमसे घृणा करता है क्योंकि डाँटना प्रेम में भी हो सकता है। और अगर कोई तुमसे मोह दिखाए, मीठी-मीठी बातें करे, तो यह मत समझ लेना कि यह तुम्हारा बड़ा हितैषी है। वो हो सकता है उसके अहंकार की बात हो। ज़्यादातर ऐसा ही होता है। अगर कोई तुमसे बड़ी मीठी-मीठी बातें कर रहा है तो उसको अपना दोस्त ही मतमान लेना। जो तुम्हारा वास्तविक दोस्त होगा वो अक्सर तुम्हें डाँटेगा क्योंकि तुम हो ही डाँटने लायक। अगर कोई वास्तव में तुम्हारा दोस्त होगा तो नब्बे प्रतिशत मौकों पर तुम्हारी पिटाई ही लगाएगा। मेरे आसपास जो लोग हैं, वो हैरान रहते हैं कि पीटने के अलावा मैं कुछ करता ही नहीं। प्रेम है इसलिए पीटता हूँ। जिस कपड़े पर खूब मैल लग गयी हो उसे क्या किया जाता है?



