स्नेह, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति समझाने के तरीके हैं। मन का मतलब होता है गति। या तो वो किसी दिशा में बढ़ता है, क्योंकि जो उसके सामने है वो उसे आकर्षक लग रहा है, या वो किसी दिशा से भागता है, क्योंकि जो उसके सामने है उससे उसे भय या विकर्षण हो रहा है। गति के यही दो कारण होते हैं — या तो राग या द्वेष, या तो आकर्षण या विकर्षण। तो विषय के आधार पर समझाने के लिए भेद किया जा सकता है, उसी प्रकार का एक भेद आपके द्वारा पढ़े गए साहित्य में उल्लिखित है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, ओशो ने बताया है कि जो प्रीति तीन तलों पर करते हैं — एक तो अपने छोटे से, जिसको स्नेह कहते हैं, एक अपने समतल पर प्रेम, और अपने से बड़े गुरु के साथ श्रद्धा और भक्ति को उन्होंने उससे भी ऊपर बताया हुआ है। तो प्रश्न ये है कि ये तीनों तल करने होते हैं, साइमल्टेनियस (सह-घटनात्मक), एक के बाद एक होता है? और एक जगह पर वो कहते हैं कि भक्ति छलाँग है, तो फिर इन तीनों को पार किया जा सकता है। ये क्या है, इसे समझना है?
आचार्य प्रशांत: स्नेह, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति समझाने के तरीके हैं। मन का मतलब होता है गति। या तो वो किसी दिशा में बढ़ता है, क्योंकि जो उसके सामने है वो उसे आकर्षक लग रहा है, या वो किसी दिशा से भागता है, क्योंकि जो उसके सामने है उससे उसे भय या विकर्षण हो रहा है। गति के यही दो कारण होते हैं — या तो राग या द्वेष, या तो आकर्षण या विकर्षण। तो विषय के आधार पर समझाने के लिए भेद किया जा सकता है, उसी प्रकार का एक भेद आपके द्वारा पढ़े गए साहित्य में उल्लिखित है।
आपने कहा, ‘जिसके प्रति तुम्हें आकर्षण है, यदि वह तुमसे आयु में छोटा है, तो कह दो ‘स्नेह’; जिसके प्रति तुम्हें आकर्षण है, यदि वह आयु में समतुल्य है, तो कह दो ‘प्रेम’; और यदि तुम्हें लगे कि तुमसे ऊँचा इत्यादि कोई वृद्ध, बुज़ुर्ग अथवा गुरु है, तो कह दो ‘श्रद्धा’। और फिर वही आकर्षण अगर भगवत्ता के प्रति हो जाए, तो कह दो ‘भक्ति'। ये कोई मौलिक विभाजन नहीं है, समझाने की बात है, इसमें कुछ नहीं।




