जीवन में दुख है ही क्यों? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर, जीवन में दुख क्यों है?
आचार्य प्रशांत: कुछ और विस्तार से पूछना चाहते हो या यही है?
प्र: यही है सर।
आचार्य: दुख माने क्या होता है? दुख किसको कहते हैं? कैसे पता आप दुखी हैं?
प्रतिभागी: जो इछाएँ हैं, वो पूरी नहीं होती हैं तो दुख होता है।
आचार्य: वो तो कारण है। आपको पता कैसे होता है कि आप दुखी हो?
प्रतिभागी: सुख का अभाव, अच्छा नहीं महसूस होता।
आचार्य: हाँ, बस! अस्वस्थ होने का एक अनुभव दुख कहलाता है। आप कब कहते हो, ‘मैं दुखी हूँ?’ ‘मैं दुखी हूँ’ ये कब कहते हो? भीतर से एक भाव उठता है जो असंगत होता है, विषम होता है, आउट ऑफ प्लेस (जगह से बाहर) होता है न? जो चीज़ नहीं होनी चाहिए वो मौजूद है। जैसे कोई चीज़ यहाँ (गले की ओर इशारा करते हैं) फँस गई हो, वहाँ होनी नहीं चाहिए; पर है। तो इसको हम क्या बोलते हैं? दुख। किसी ऐसी चीज़ की मौजूदगी जो नहीं होनी चाहिए। ठीक है?



