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हारना बुरा क्यों लगता है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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वक्ता: मृदुल का सवाल है- हम हारने पर दुखी क्यूँ हो जाते हैं? पिछली शताब्दी की कहानी है, कॉलोनाईज़ेशन’ जानते हो न? यूरोपियन देश थे, तो ये एशिया, अफ्रीका हर जगह अपने साम्राज्य को फैला रहे थे, विस्तार कर रहे थे।

तो सौ साल से ज़्यादा पुरानी ये कहानी है- एक ब्रिटिश सेनापति था, जीतता हुआ आगे बढ़ा ही जा रहा था। एक गाँव उसके विस्तार क्षेत्र के बीच में पड़ रहा था, बाधा बन रहा था; छोटा सा गाँव था। सेनापति ने कहा कि, “इसका क्या है, इसको तो पल भर में रौंध दूँगा, आगे बढ़ जाऊँगा।” उसने अपने सैनिक भेजे, सैनिक हैरान रह गए। ज़रा सा गाँव था, पर उसके लोगों ने बहुत डट कर संघर्ष किया और उनकी जो नेत्री थी, वो अभी बहुत कम उम्र की एक लड़की थी। सेनापति की फ़ौज को हारना पड़ गया; बचे-कुचे सैनिक वापस आए, उन्होंने बताया ऐसा हो गया। उन्होंने कहा कि इतना आसान नहीं है जितना हमें लगा था। वो लोग उस जगह को जानते हैं, उससे परिचित हैं, जंगली इलाका है, वो वार करके छुप जाते हैं और सबसे बड़ी बात ये है कि वो संकल्प बद्ध हैं; उन्होंने तय कर रखा है कि गुलामी में नहीं जीएँगे।

सेनापति ने कई बार कोशिश की, और हर बार नतीजा एक ही निकला। बारह-चौदह दफ़े कोशिश करने के बाद, अंततः उसने और बड़ी सेना मँगवाई; सैनिक इतने ज़्यादा कर दिए कि अब कोई तुलना ही नहीं रही। अनुपात एक और सौ का हो गया; हर ग्रामीण पर सौ अंग्रेज सैनिक। तो बारह-चौदह बार हारने के बाद अंततः ब्रिटिश फ़ौज जीती। उस लड़की को, उनकी नेत्री को, पकड़ के लाया गया ब्रिटिश सेनापति के सामने। सेनापति साहसी आदमी था, वो इसी से सिद्ध होता है कि वो पीछे नहीं हटा था। उसने कहा था कि ‘मैं भी लड़ा रहूँगा, पूरा एशिया जीतना है मुझे।’ लड़की उसके सामने लाई गयी; सेनापति गर्व के साथ एक ऊँची जगह पर बैठा, सिंघासन समान। नीचे वो लड़की बेड़ियों में खड़ी हुई है; हारी हुई और घायल। साल दो साल से लगातार लड़े ही जा रही थी; स्वाथ्य गिरा हुआ था, ज़ख्मो से खून रिस रहा था, हाथ-पाँव सब बंधन में थे और सेनापति तन कर के ऊपर अपने सैनिकों से घिरा हुआ बैठा हुआ था। वो सामने आई, सेनापति ने उससे कहा, “आखिरकार, तू हार तो गई ही!”। वो लड़की ज़ोर से खिलखिला के हँसी और कहानी है कि सेनापति ने कहा, ‘हम चौदह बार नहीं हारे लेकिन, इस बार हार गए। वो अपनी सेना लेके वापस मुड़ गया।

कुछ ऐसी ही कहानी सिकंदर और पोरस की है। जब पोरस को सिकंदर के सामने लाया गया, — सिकंदर ने पूछा, “क्या सुलूक किया जाए तुम्हारे साथ?” पोरस ने कहा, “वही जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।” सिकंदर वापस मुड़ गया।

जीना उसका जीना है, जो तब तो जीता ही, जब वो जीता; वो तब भी जीता, जब वो हारा।

बात को समझना! हम सोचते हैं कि जब हम जीते, हम सिर्फ तभी जीते। लेकिन, कुछ ऐसे भी हुए हैं जो हारने में भी जीतते रहे हैं। जिनका जीतना अटल रहा है; उस पर कोई अंतर नहीं पड़ सकता स्थितियों से। परिणामों से, और घटनाओं से उनकी आंतरिक जीत प्रभावित होती ही नहीं है; वो अक्षुण रहती है। सेनापति उससे कह रहा है ‘आखिरकार, तू हार गई’, और वो हँस रही है। वो कह रही है ‘हारा कौन? हम सदा जीते हुए हैं। हम जीतने में भी जीतते है; हम हारने में भी जीतते हैं क्यूँकी युद्ध के परिणाम पर निर्भर ही नहीं है हमारा जीतना; हमारा जीतना हमारे भीतर है।’

जो परिणामो पर निर्भर है, वो तो हार-जीत के बीच में झूलता रहेगा; वो जीत कर भी नहीं जीतेगा, वो सदा हारा ही हुआ है क्योंकि उसकी जीत कभी आखरी नहीं होगी। कभी तुमने किसी को आखरी जीत तक पहुँचते देखा है? जो हारे हैं वो तो हारे ही हैं; जो जीते भी हैं वो और भी बड़े हारे हैं क्यूँकी उनको अभी भी डर लगा हुआ है कि जीत छिन न जाए; क्यूँकी उनको अभी भी अपेक्षा है कि इससे बड़ी कोई जीत संभव है।

तुम कह रहे हो कि हम हारने पर दुखी क्यों हो जाते हैं। हम हारने पर ही दुखी नहीं होते; हम ऐसे दुखी हैं कि हम जीतने पर भी दुखी रहते हैं। दुःख हमारी अनिवार्य स्थिति है। तुम भूल कर रहे हो अगर तुम सोच रहे हो कि तुम हारने के कारण दुखी होते हो। मैं तुमसे कह रहा हूँ — तुम दुखी हो ही, इसीलिए तुम हार-जीत के फेर में पड़ते हो। तुम सोचते हो हार पहले आती है, फिर दुःख आता है। तुमने सोचा कि हारे इस कारण दुखी हुए। न, मैं तुमसे कह रहा हूँ, दुःख पहले आया है इस कारण हार-जीत आए हैं।

दुखी तो हो ही! दुखी हो ही इसीलिए क्यूँकी अपने भीतर ये भाव बैठा लिया है कि हार जैसा कुछ होता है। दुखी हो इसलिए क्यूँकी अपनी अनिवार्य जीत को अस्वीकार किये हुए हो; क्यूँकी हार जैसा शब्द तुमने गढ़ लिया है, हार कुछ है नहीं।

जो जीत हार के विरोध में आती है, जो जीत हार का विपरीत है, हार का उल्टा है; वो जीत किसी काम की नहीं है क्यूँकी उस जीत के लिए हार चाहिए।

जो हारा हुआ है वो ही जीतने की कोशिश करेगा और जो जीता हुआ है, अगर वो और बड़ी जीत की अपेक्षा कर रहा है तो इसका अर्थ ही यही है कि वो जीत उसे पूरी पड़ी नहीं है; वो जीत किसी काम की नहीं थी।

मन में एक बादशाहत का भाव रखो। जीतने पर बहुत उत्तेजित मत हो जाओ कि कोई बहुत बड़ी घटना घट गयी और हारने पर संतप्त मत हो जाओ कि कोई बहुत बुरी घटना घट गयी। बादशाहत के भाव से अर्थ है कि तुम्हारे पास इतना कुछ है कि तुमको अगर दस रूपये और मिल जाएँ, तो तुम्हें बड़ा उत्सव करने की ज़रुरत नहीं है। एक अरबपति हो, उसको अगर दस रुपए का नोट मिल जाए, तो वो नाचने लगेगा क्या? तो ये छोटी-मोटी जीतों पर तुम इतने उत्तेजित क्यों हो जाते हो? जो दस रुपये का नोट मिलने पर नाचने लग जाए, निश्चित रूप से बहुत बड़ा कंगला है।

हमारी हालत यही है; छोटी सी जीत मिलती नहीं है, और हम पागल हो जाते हैं। किसी को तर्क में हरा दिया, किसी के दो रुपये मार लिए, परीक्षा में नकल कर ली, कुछ खाने को मिल गया और हम बिलकुल बौरा उठते हैं कि पता नहीं क्या मिल गया। वही कि कंगले को तो दस रुपया भी मिल जाएगा तो उसे लगेगा कि स्वर्ग मिल गया और वैसे ही कोई छोटी सी चीज़ छिन जाती है, तो हमारे चेहरे उतर जाते हैं। दस में से सात नम्बर मिलने चाहिए थे, साढ़े छह ही मिले; अब ये ढ़ाई घंटे से रो रहे हैं, और पाँच-सात जगह फ़ोन कर दिए हैं। किसी ने मुड़ के ज़रा सा इनकी ओर देख लिया; फेसबुक पे गाना गा रहे हैं। ये क्या भिखारीपन है?

ज़रा-ज़रा सी बातों पे उन्माद, और ज़रा-ज़रा सी बातों पे विषाद। दुनिया में ऐसे जीयो कि बहुत हमें मिल नहीं सकता; और बहुत हमसे ये ले नहीं सकते। तुम दस-बीस रुपए वाले हो सब; चारों ओर जो कुछ है ये दस-बीस रुपये वाले हैं और हम हैं अरबपति। तो इनसे जो भी हमारा लेन-देन होना है वो छोटा ही छोटा होना है, बड़ा कुछ नहीं हो सकता; ऐसे जीयो। इसको कहते हैं कि नदी पार भी कर लो, और पाँव भी गीला न हो।

दुनिया में रहो पर ऐसे नहीं कि जो आस-पास है वो बहुत महत्त्पूर्ण है; यहाँ कोई बड़ी चीज़ हैं ही नहीं। जो कुछ बड़ा है, जो महत्वपूर्ण है, जो कीमती है और असली है; उसको जानो, उसको पाओ। वो तुम्हें बाहर नहीं मिलेगा, दुनिया में नहीं मिलेगा; दुनिया में तो वही मिलेगा जो क्षुद्र है।

ये नहीं कहा जा रहा है कि जो कुछ क्षुद्र है उससे कुछ मतलब मत रखो। रखो, मतलब। अरबपति को भी दस-बीस रुपय की चीज़ें लेनी-देनी पड़ती हैं; ले दे लो। पर उसको जीवन मरण का प्रश्न मत बना लो! उसको ये मत कह दो कि मेरी पूरी सत्ता, मेरा होना, मेरी अस्मिता इस पर निर्भर करती है; ऐसा कुछ नहीं है। ठीक है, घटनाएँ हैं, घट रही हैं। बात आ रही है समझ में? थपेड़े मत खाते रहो कि बाहर कोई घटना घट गयी तो वाह! और नहीं घटी तो आह!

‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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