गुड़ इकट्ठा करोगे तो मक्खियाँ भी झेलोगे

Acharya Prashant

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गुड़ इकट्ठा करोगे तो मक्खियाँ भी झेलोगे
तुम्हारे जीवन में अगर मक्खियाँ ही भरी हुई हैं बहुत सारी और भिना रही हैं बिल्कुल और जीना मुश्किल कर रखा है। भिन-भिन-भिन-भिन, एकदम खोपड़ा खा गई हैं। तो इसका मतलब ये है कि तुमने बहुत सारा गुड़ इकट्ठा कर लिया है, अब तुम उस गुड़ को नहीं खा रहे, गुड़ तुमको खा रहा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृह्णीत भिक्षितुम्। पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही।।

राजन्! मैंने मधुमक्खी से यह शिक्षा ग्रहण की है कि सन्यासी को सायंकाल अथवा दूसरे दिन के लिए भिक्षा का संग्रह न करना चाहिए। उसके पास भिक्षा लेने को कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखने के लिए कोई बर्तन हो तो पेट। वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्खियों के समान उसका जीवन भी दूभर हो जाएगा।

सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृह्णीत भिक्षुकः। मक्षिका इव सङ्गृह्य सह तेन विनश्यति।।

यह बात खूब समझ लेनी चाहिए कि सन्यासी सबेर-शाम के लिए किसी प्रकार का संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा, तो मधुमक्खियों के समान अपने संग्रह के साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा।

सुखोपभज्यन्ते विप्रे आशासाना गृहाशिषः। मधुहेवागतं भृङ्गैः यतयो गृहमेधिनाम्।।

तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियों का जोड़ा हुआ मधु उनके खाने से पहले ही साफ कर जाता है, वैसे ही गृहस्थों के बहुत कठिनाई से संचित किए पदार्थों को, जिनसे वे सुख भोग की अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि-अभ्यागतों को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा।

सुखोपभज्यन्ते विप्रे आशासाना गृहाशिषः। मधुहेवागतं भृङ्गैः यतयो गृहमेधिनाम्।।

तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियों का जोड़ा हुआ मधु उनके खाने से पहले ही साफ़ कर जाता है, वैसे ही गृहस्थों के बहुत कठिनाई से संचित किए पदार्थों को, जिनसे वे सुख भोग की अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि-अभ्यागतों को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा।

आचार्य प्रशांत: अवधूत गीता के अध्याय दो से श्लोक क्रमांक 11, 12, 15 और 16 को उद्धृत करा है। ये सारे ही श्लोक सीख दे रहे हैं, हिदायत दे रहे हैं संग्रह-संचय के विरुद्ध, ठीक है। कह रहे हैं ये जो तुम इतना बचा के रखते हो, इतना संग्रह करते हो, ये मूर्खतापूर्ण तो है ही, ये तुम्हारा बंधन भी है। ऐसा कह रहे हैं ये सब श्लोक।

तो प्रश्नकर्ता कह रहे हैं, कि “श्लोक तो सिखा रहे हैं कि संग्रह से जीवन कठिन हो जाता है और ये सब संग्रहित धन दूसरे ही भोगते हैं। लेकिन मैं अपना जीवन देखता हूँ तो दिखता है कि मैं तो जीवन की सुरक्षा के लिए संग्रह करता हूँ, और मुझे संग्रह से फायदे भी खूब हुए हैं। संग्रह से जीवन में परिवार की शिक्षा, अपना घर आदि बनाना, ये सब काम पूरे हो गए और इधर-उधर की परेशानियों से बचने में मदद मिली। तो अवधूत गीता की जो सीख है और मेरा जो अनुभव है, इनमें मुझे विरोधाभास दिखता है। तो बताइए।” ये प्रश्न पूछ रहे हैं।

आपके प्रश्न का आधार क्या है? आपका विरोधाभास कहाँ दिख रहा है? संग्रह के ख़िलाफ़, अवधूत गीता यही तो कह रही है कि संग्रह करोगे तो दुख भोगोगे और तुमने जो संग्रह किया है, वो तुम्हारे काम नहीं आने का।

और आपका अनुभव क्या है? कि आपने संग्रह से परिवार की शिक्षा कर ली है, अपना घर बना लिया और ये सब कर लिया है। तो आपके साथ वही तो हुआ है जो अवधूत गीता कह रही है, दुख ही तो भोगा है। आपके दावे का कुल आधार ये है कि आप मान रहे हैं कि आपने ये सब जो ज़िंदगी में अपनी नजर में बड़े-बड़े काम किए हैं, ये सुख वाले काम हैं।

तो अवधूत गीता कह रही है, कि जो संग्रह करते हैं वो दुख पाते हैं और आप कह रहे हैं कि “नहीं साहब, हमने सुख पाया। देखो, हमने संग्रह किया तो हमने परिवार खड़ा किया, घर खड़ा किया, बच्चों की परवरिश करी। तो हमने थोड़े ही दुख पाया है। अवधूत गीता गलत है, अवधूत गीता क्या बोल रही है? संग्रह करोगे तो दुख पाओगे। पर हमारी ज़िंदगी में देखिए, हमने संग्रह किया तो हमने क्या-क्या पाया है। हमने घर खड़ा कराया है, इज़्ज़त पाई है, गाड़ी आ गई है, बच्चों के लिए ये कर दिया, वो कर दिया, ये सब हमने करा है न।”

जनाब यही तो दुख है, जो सब आपने करा है। आपकी गलतफ़हमी ये है कि आपने अपनी ज़िंदगी में जो कुछ किया है वो बड़े शुभ और बड़े सुखदायक काम हैं। नहीं हैं।

हाँ, सामाजिक चलन ये है कि ये सब काम बड़े सम्माननीय माने जाते हैं। माना जाता है कि आपके पास अपना घर है और ओहदा है, रुतबा है तो आप बड़े श्रेष्ठ आदमी हैं। आप श्रेष्ठ सामाजिक जगत में हो सकते हैं, आंतरिक जगत में आप कहाँ से श्रेष्ठ हो गए? और आंतरिक जगत में इसीलिए नहीं श्रेष्ठ हुए क्योंकि वो सब करते रहे जिसका नकार और जिसका विरोध अवधूत गीता ने किया हुआ है।

आप जो पूरा दावा कर रहे हैं अवधूत गीता के ख़िलाफ़, दत्तात्रेय के ख़िलाफ़, उस दावे का आधार है अपने जीवन की उपलब्धियों में बड़ा विश्वास। आप कह रहे हैं, “मुझे देखो, मैंने संग्रह किया, मैंने कमाया, मेरा परिवार देखो, मेरे बच्चे देखो, मेरा घर देखो, मेरा महल देखो, मेरा रुतबा देखो। मैंने वो सब कुछ किया जिसकी मनाही ही कर रहे हैं दत्तात्रेय, और फिर भी मैं तो सुखी हूँ।”

आप सुखी हैं, वाक़ई?

अगर आप सुखी हो ही तो भली बात, अवधूत गीता में आग लगा दीजिए। और अगर आप दुखी हैं तो उस दुख का कारण ही वो सारे काम हैं जो आपने जीवनपर्यंत किए हैं। क्यों आप अपने आप को इस गलतफ़हमी में रखे हुए हैं कि ये सब कुछ जो आपने अपने चारों ओर खड़ा कर रखा है, ये आपके सुख का कारण है। जानते नहीं हैं क्या आप, कि यही तो आपके गले का फंदा है। ख़ुद ही भोग रहे हैं, ख़ुद ही अनुभव कर रहे हैं। लेकिन फिर भी यहाँ दावा ये कर रहे हैं कि “देखो, मैंने तो जो सब धन का संचय किया, ऊँचे-नीचे सब तरीक़ों से, वो मुझे कितना फल दे रहा है, कितना सुख दे रहा है।” कौन सा सुख महोदय? कहाँ है सुख?

और मैं कोई नहीं हूँ जो ज़बरदस्ती आपको मनवाऊँ कि आप सुखी नहीं हैं। आपको अगर स्वयं ये विश्वास है, ईमानदारी से कि आप सुखी हैं तो ठीक बात। आप जीते, गीता हारी।

बड़ा बुरा लगता है न, कि “हैं! जो-जो चीज़ें हम जीवन की उपलब्धियों के तौर पर गिनाते हैं, वही हमारी गर्दन से लटका हुआ पत्थर है।” हाँ, ऐसा ही तो है और क्या?

ये बात समझनी, स्वीकार करनी मुश्किल होगी क्योंकि ये बात स्वीकार करने में बड़े कड़वे तथ्य को स्वीकार करना होगा — कि संग्रह पर आधारित अपनी पूरी ज़िंदगी ही बर्बाद रही है। हम कहीं के नहीं हैं, हम भिखारी से बदतर हैं। ये बात स्वीकार करने के लिए बड़ी विनम्रता चाहिए। उतनी विनम्रता हममें होती नहीं, खास तौर पर उस व्यक्ति में तो ये विनम्रता मुश्किल से ही पाई जाएगी जिसने जीवन भर खूब पैसा संग्रह किया है। वो कहेगा, “इतना पैसा है मेरे पास, मैं कैसे मान लूँ कि इन सारे पैसे के होते हुए भी मैं भिखारी हूँ। और अगर मैं भिखारी हूँ तो जन्म ही बर्बाद कर लिया, इसका मतलब। नहीं, हम मानेंगे ही नहीं। हम मानेंगे ही नहीं कि हमने जन्म बर्बाद कर लिया।” तुम मानो चाहे ना मानो, बर्बाद तो हो गया। अब जो शेष बचा है, उसको बचाना चाहते हो तो फिर सीधी बात करो।

पुरानी कहानी है, अफ्रीका की तरफ़ से। जाने गन्ने के लिए है, जाने शक्कर के लिए है, जाने गुड़ के लिए है, किसी मीठी चीज़ के लिए है, जाने किसी मिठाई के लिए। वो कहती है कि जब मीठा मिले तो खा लो। खा लोगे तो तुम्हारा होगा, नहीं खाओगे तो मक्खियों का होगा। ये संग्रह के ख़िलाफ़ सबसे आधारभूत सीख है, समझ लो।

तुम्हारे जीवन में अगर मक्खियाँ ही भरी हुई हैं बहुत सारी और भिना रही हैं बिल्कुल और जीना मुश्किल कर रखा है। भिन-भिन-भिन-भिन, एकदम खोपड़ा खा गई हैं। तो इसका मतलब ये है कि तुमने बहुत सारा गुड़ इकट्ठा कर लिया है, अब तुम उस गुड़ को नहीं खा रहे, गुड़ तुमको खा रहा है।

आपके जीवन में जितनी भी मक्खियाँ हैं वो इसीलिए हैं क्योंकि आपने गुड़ इकट्ठा कर रखा है। उतना ही अर्जित करो जितना तुम्हारे निकट के भोग के लिए अनिवार्य हो।

ऐसी चीज़ तो अर्जित करो ही मत जिसकी कामना तुमसे ज़्यादा मक्खियों को हो।

संग्रह की भी जब बात होती है तो उसमें कौन से संग्रह का निषेध किया जाता है। ऐसी चीज़ मत इकट्ठा करो जो तुम्हें जितनी प्यारी है उतनी ही प्यारी मक्खियों को भी है। और हम तो ऐसी चीज़ें इकट्ठा करते हैं, जब ऐसी चीज़ इकट्ठा करोगे तो तुम्हारे जीवन में तमाम मक्खियाँ प्रवेश कर जाएँगी।

और मक्खी लिपटी किससे हुई है? गुड़ से। तुम्हें क्या लगेगा? तुम्हें लगेगा तुमसे लिपटी हुई है, स्वीटू है। अरे, ना तुम स्वीटू हो, ना वो स्वीटू है। गुड़ स्वीटू है। बात आ रही समझ में? गुड़ हटा दो तो मक्खी भी हट जानी है। लेकिन देखो, यहाँ दावे कैसे हैं, कि हमने तो गुड़ इकट्ठा किया और हम बड़े गुणवान कहलाए। अरे, तुम गुणवान नहीं, गुड़वान हो। समझ में आ रही है बात?

कितनी समस्याएँ बचेंगी तुम्हारी अगर तुम्हारे पास गुड़ ना हो, बताना, बोलो। तुम्हारे पास गुड़ ना हो तो समस्याएँ भी रहेंगी? गईं, स्वीटू गॉन। अब अगर तुम गुड़ को फेंक देना चाहते हो तो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ किसको होगी? तो ना सिर्फ़ ये जो मक्खी है तुम्हारे जीवन में प्रवेश करेगी गुड़ के कारण बल्कि ये मक्खी ही है जो तुम्हें गुड़ को त्यागने भी नहीं देगी। क्योंकि उसका और तुम्हारा रिश्ता ही गुड़ का रिश्ता है भाई। जहाँ तुमने कोशिश की गुड़ को त्यागने की, सबसे ज़्यादा शोर कौन मचाएगी? मक्खिया। आ रही बात समझ में?

और अध्यात्म तो और कुछ है ही नहीं। गुड़ को परखने का विज्ञान है, कि ये गुड़ कितना काम का है और कितना बेकार का। और तुमने जहाँ परखा नहीं गुड़ को, तुम कहोगे, यार जितना ले सकते हैं ले लें, बाक़ी छोड़ दें, आगे बढ़ें। अब तुमने जहाँ छोड़ने की बात की, तहाँ मक्खिया ने आमरण अनसन, ऐसे कैसे छोड़ दो। गुड़ के ही तो चारों ओर सात फेरे लिए हैं, पूरा खेल ही इसी का था।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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