तुम्हारे जीवन में अगर मक्खियाँ ही भरी हुई हैं बहुत सारी और भिना रही हैं बिल्कुल और जीना मुश्किल कर रखा है। भिन-भिन-भिन-भिन, एकदम खोपड़ा खा गई हैं। तो इसका मतलब ये है कि तुमने बहुत सारा गुड़ इकट्ठा कर लिया है, अब तुम उस गुड़ को नहीं खा रहे, गुड़ तुमको खा रहा है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृह्णीत भिक्षितुम्। पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही।।
राजन्! मैंने मधुमक्खी से यह शिक्षा ग्रहण की है कि सन्यासी को सायंकाल अथवा दूसरे दिन के लिए भिक्षा का संग्रह न करना चाहिए। उसके पास भिक्षा लेने को कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखने के लिए कोई बर्तन हो तो पेट। वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्खियों के समान उसका जीवन भी दूभर हो जाएगा।
सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृह्णीत भिक्षुकः। मक्षिका इव सङ्गृह्य सह तेन विनश्यति।।
यह बात खूब समझ लेनी चाहिए कि सन्यासी सबेर-शाम के लिए किसी प्रकार का संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा, तो मधुमक्खियों के समान अपने संग्रह के साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा।
सुखोपभज्यन्ते विप्रे आशासाना गृहाशिषः। मधुहेवागतं भृङ्गैः यतयो गृहमेधिनाम्।।




