आचार्य प्रशांत: तुम बहुत इकट्ठा कर लो, बहुत बड़े हो जाओ तो भी सत्य नहीं मिलेगा। तुम बहुत छोटे हो जाओ तो भी नहीं मिलेगा। मिट के ही मिलेगा, बचाये-बचाये नहीं मिलेगा। तुम बचाये-बचाये जो अधिक-से-अधिक और जो कम-से-कम कर सकते हो, तुम सब आज़मा कर देख लो, तुम्हें असफलता ही मिलेगी, सत्य नहीं। बाल लो, बाल की नोक लो, उसके सौ हिस्से करो, उसमें से एक हिस्सा उठाकर के उसके भी सौ हिस्से करो, फिर भी जो हाथ आएगा, जीवात्मा ही है। अब अपनी ओर से इससे ज़्यादा तो नहीं कह सकते वो। हम तब भी न समझे तो फिर!
अहम्-वृत्ति की बात हो रही है, जीवात्मा की बात हो रही है। इतना सूक्ष्म है, लेकिन वही फिर न जाने कितना प्रसार ले लेता है। ख़ुद उसकी कोई हस्ती नहीं लेकिन उसे सबके साथ जुड़ना बहुत पसन्द है। तो दो चीज़ें हैं जो हटानी हैं — एक वो जिसके साथ वो जुड़ गया है और वैसी कितनी चीजें हैं जिनके साथ वो जुड़ गया है? हज़ारों, हज़ारों। कह रहे हैं, 'अनन्त रूपों में विस्तृत हो जाता है।’ अनन्त चीज़ों के साथ उसने जुड़ाव ले लिया है। तो एक तो उन चीज़ों को हटाना ज़रूरी है।
उन चीज़ों को हटाने के बाद भी क्या बचेगा? वो जो अति सूक्ष्म है और जुड़ने को आतुर है। वो आख़िरी चुनौती होता है क्योंकि अब उसे छोड़ना नहीं है, अब उसे आत्मघात करना है। पहले तो वो अनन्त चीज़ें जिनसे वो जुड़ा हुआ है उसे छोड़ना है, वही बड़े कष्ट का काम है, 'हाय-हाय छोड़ कैसे दूँ, ये छोड़ दिया वो छोड़ दिया!' और फिर आख़िरी चुनौती क्या होती है? कि ये जो अति सूक्ष्म बचा है जीवात्मा, अहंकार, इसको अब क्या करना है? इसे आत्मदाह करना है, इसे आत्मसमर्पण करना है। इसे आत्महन्ता होना है। वो सबसे मुश्किल होता है, 'सब छोड़ तो दिया, अब तो जीने दो!’ नहीं, सब छोड़ दिया, अब अपने जीवन का समर्पण कर दो। ये आख़िरी चीज़ पकड़ कर क्यों रखते हो?
ये आख़िरी चीज़ का क्या नाम है?
'मैं’।







