सेवा की शर्त है: समझदारी। जब कोई आए और बड़ी उत्सुकता दिखाए कि आपकी सेवा करनी है, तो इतना ज़रूर देख लेना कि उसने अपनी सेवा कर ली है या नहीं। जो अपना हितैषी नहीं हो पाया, वो तुम्हारा हितैषी क्या ख़ाक होगा। और जब तुम्हारे मन में ये भाव उठे कि, "मुझे किसी की सेवा करनी है," तो स्वयं से ये पूछ लेना, "क्या मैं इस क़ाबिल हूँ? अपनी सेवा कर ली?"
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प्रश्नकर्ता: सेवा का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: सेवा कैसे करोगे? अस्पताल में मरीज़ है, डॉक्टर कैसे सेवा करेगा? तुम्हें शरीर का कुछ पता नहीं, मन का कुछ पता नहीं, तुम्हें इलाज के औज़ारों का कुछ पता नहीं, तुम सेवा कैसे करोगे?
मैं कई बार उस शराबी की कहानी सुना चुका हूँ, फिर सुना देता हूँ; एक शराबी रात में झूमता, बहकता सड़क पर चला जा रहा था। वो देखता है कि सड़क पर दुर्घटना हो गई है, और एक आदमी सड़क के किनारे पड़ा हुआ है, उसके सिर से खून बह रहा है। उसे देखकर शराबी कहता है कि सेवा करनी चाहिए, और वो सेवा कर देता है। सिर से खून बह रहा है, वो उसकी वहीं पर ब्रेन सर्जरी कर देता है। शराबी कहता है, "इसके सिर में चोट लगी है, दुर्घटना हुई थी, मैं सेवा करूँगा," और वो सेवा कर देता है। वहीं उस आदमी की ब्रेन सर्जरी कर देता है। क्या यह सेवा है? क्या आपको सेवा का अर्थ स्पष्ट है?
शरीर की भी सेवा करनी हो तो शरीर को समझना पड़ता है। पाँच साल का तो एम.बी.बी.एस. कोर्स करना पड़ता है, और फिर उसके आगे की भी पढ़ाई! सिर्फ़ शरीर की सेवा करने के लिए इतनी तैयारी करनी पड़ती है। दसों साल की पढ़ाई, और फिर उसके बाद दसों साल का अनुभव चाहिए सिर्फ़ शरीर की सेवा करने के लिए; शरीर भी छोड़ो, शरीर के छोटे-से हिस्से दाँत की भी सेवा करनी हो, तो उसके लिए भी दसों साल की तैयारी चाहिए, समझ चाहिए, जानकारी चाहिए। तब करते हो न सेवा या यूँ ही किसी के दाँत में दर्द है, तो जाकर खींच लेते हो कि उखाड़ दिया, सेवा कर दी?




