कृपा प्रदर्शित करने का तरीका है — युद्ध में निष्ठुरता। जो धर्म-विरुद्ध जा रहा हो, उसके प्रति सबसे बड़ी कृपा यही है कि उसको रोक दिया जाए। अगर अचेत व्यक्तियों को तुमने निष्ठुर होकर रोका नहीं, तो तुम उन्हें परोक्ष रूप से और ज़्यादा अधर्म करने के लिए प्रोत्साहित ही कर रहे हो। याद रहे कि किसी व्यक्ति के प्रति तुम्हारी आसक्ति, सत्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से बड़ी न हो जाए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी इस पूरे दृष्टान्त में जब भी देवी प्रकट होती हैं तो काफ़ी तेज दिखाया जाता है। और तेज देवी का प्रकट होना तभी दिखाते हैं जब देवों द्वारा बुलाया जाता है। तो अगर जीवन में तेज नहीं है, अर्थात् देवी नहीं है तो क्या यही मतलब है कि अन्दर के देव बुला नहीं रहें? और तेज जो था वो दुर्योधन के जीवन में भी था, तो क्या उसके जीवन में जो तेज था,वो देवी नहीं वो कुछ और था?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो ऐसा है कि जैसे तुम कहो कि किसी व्यक्ति के पास कभी रुपया-पैसा बिल्कुल पाया नहीं जाता। जैसे तुम कह रहे हो कि तेज नहीं है। वैसे ही मैं उदाहरण लेकर समझा रहा हूँ कि मान लो कोई व्यक्ति उसके पास पैसा नहीं है। और फिर तुम्हें पता चले कि नहीं ये तो हर महीने अच्छा पैसा कमाता है। लेकिन पैसा कभी इसके पास होता नहीं। इसका क्या मतलब है? कमाता हर महीने अच्छा है। लेकिन जब भी उसके पास जाओ तो सही में उसके पास पैसा नहीं होता। इसका मतलब क्या है?
वो एक बहुत मोटी किस्त भर रहा है। उसने कोई ऐसी चीज़ मोल ले रखी है बल्कि कर्ज़ ले रखी है जिसमें उसका सारा पैसा माने सारा तेज लगातार व्यय होता रहता है। है तो बहुत कुछ पर जितना है सब उधर को जा रहा है। एक तारीख को एक लाख आता है, दो तारीख को नब्बे हज़ार उधर निकल जाता है। अहंकार बढ़ाने-चढ़ाने के लिए बड़ा भारी महल कर्ज़े पर खरीद रखा है, उसकी किस्त चुकाते हैं।




