गीता का संबंध हमारे जीवन से है, सिर्फ़ हमारे जीवन से ही है और किसी चीज़ से नहीं है। अध्यात्म, दर्शन — ये सब इसलिए नहीं होते कि आपका ज्ञान बढ़ जाए। ये इसलिए होते हैं ताकि आपका जीवन सुधर जाए। ये श्लोक आपको कुछ बता रहा है, आपके संबंधों के बारे में। पलायन कर लेना आसान होता है। अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए अपने कर्तव्यों की बलि चढ़ा देना आसान होता है, और ये सब करते हैं हम लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी में।
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आचार्य प्रशांत: आज हमारे सामने जो श्लोक है, उसको अगर समझना हो तो आपको श्रीकृष्ण के पूरे दर्शन को समझना पड़ेगा। 29वाँ श्लोक है। उसमें आपको पहले देखना पड़ेगा कि पीछे 25, 26, 27, 28 में श्री कृष्ण क्या बोलते आ रहे हैं। और पीछे जाना पड़ेगा 72 श्लोक सांख्ययोग के, क्या कहना चाह रहे हैं श्री कृष्ण?
श्रीकृष्ण ने क्या कहा है, कि मैं सिर्फ़ कुछ के लिए 'कृष्ण' हूँ, बाकियों के लिए नहीं हूँ? बोलिए। या वो ये कह रहे हैं कि प्रत्येक जीव की चेतना के एक केंद्र में जो बैठा है — भले वो छुपा हुआ केंद्र हो, आच्छादित केंद्र हो, मैं वो हूँ? क्या श्रीकृष्ण अपनी ओर से भेद करते हैं? या श्रीकृष्ण ये कहते हैं कि मैं तो उपलब्ध हूँ, तुम्हारी ओर से पुकार की प्रतीक्षा है, बस? तो श्रीकृष्ण अपनी ओर से कोई भेद नहीं करने वाले हैं।
27वें श्लोक में हमसे कह रहे थे, कि सब कुछ प्रकृति करती है, लेकिन मूर्ख लोग क्या मानते हैं? “मैंने करा।” 28वें में वही बात आगे बढ़ा दी, बोले कि सब कुछ प्रकृति करती है, और ये बात ज्ञानी लोग जानते हैं और ये जानकर के वे विरक्त रहते हैं। 26वें में क्या बात कह रहे थे? 26वें में कह रहे थे कि, अज्ञानियों का नेतृत्व करना, ज्ञानी की जिम्मेदारी है। कर्तव्य बता रहे थे आपको 26वें श्लोक में आपका।




