दूसरों को सज़ा देने का विचार है तुम्हारी सज़ा || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

श्रोता: सर, कई बार हम किसी गलत आदमी को उसकी गलती की सजा नहीं देते जिसके बाद उसको लगता है कि वो ठीक है। उसके बाद हमें तकलीफ़ होती है कि उसने ऐसा सोचा। अगर मैं सही था तो मुझे तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए। ठीक है मैंने उसे माफ़ किया, मैं अच्छा हूँ। अगर मैंने उसे पूरे तरीके से माफ़ नहीं किया है, तो मैंने उसको उसकी गलती की सजा क्यों नहीं दी?
वक्ता: एक बात बताओ। आहात होगे, तभी तो सजा दोगे। गलती होती है, तभी सजा दी जाती है। गलती होने का मतलब है कि कुछ बुरा किया है किसी ने तुम्हारे साथ। कुछ है जो तुमको आहात कर गया। तभी तो सजा देने की बात सोचते हो या नहीं? यह खुला आकाश है। इसमें कील ठोक कर दिखाओ। यहाँ एक लाख कील ठो लो, क्या तब भी इस जगह का कुछ बिगड़ेगा? नहीं बिगड़ेगा। वही कील लाकर इस दीवार पर ठोक दो तो तुरंत क्या होगा? निशान पड़ जायेगा, थोड़ी सी दीवार टूटेगी। इसको अहंकार कहते है।
आहत वही होता है, चोट उसी को ही लगती है, टूटता वही है, जिसके पास अहंकार होता है। चोट सिर्फ अहंकार को लग सकती है। तो जब भी कभी आहात अनुभव करना, तो जान जाना कि अहंकार पर ही वार हुआ है। और कुछ है ही नहीं जिसे चोट लग सके। सत्य को चोट नहीं लगती, बोध को चोट नहीं लगती, अहंकार को ही चोट लगती है। तो तुम में से जिन लोगों ने ये धंधा ही बना रखा है कि उन्हें बात-बात पर चोट लग जाती है, दिल टूट जाता है, वो समझ लें कि वे परम अहंकारी हैं क्योंकि अहंकार को ही चोट लगती है। हमने ये अच्छा खेल खेला हुआ है। पहले तो हम कहेंगे कि हमें चोट लग गयी। किसे चोट लग गयी? मुझे। तो उससे ‘मेरे’ होने की भावना पुख्ता हुई। फिर हम कहेंगे कि हमने माफ़ कर दिया। और माफ़ करने वाला कौन है ?
श्रोता: मैं।
वक्ता: तो बड़ा कौन है ?


