बोधग्रंथों को पढ़े बिना ध्यान करने की कोशिश || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शिविर के बाद बहुत परिवर्तन हुआ है। मन स्थायी रूप से शांत रहता है। मुझे ध्यान करना और आपके वीडियो सुनना अच्छा लगता है। परंतु मेरी धार्मिक ग्रंथों में अभी रुचि नहीं है। क्या यह सही है? कृपया मार्गदर्शन करने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: भावना जी, धार्मिक ग्रंथों का काम व्यक्ति में कुछ जोड़ना नहीं होता, उसे कुछ अलग करने के लिए प्रेरित करना इत्यादि नहीं होता। धार्मिक ग्रंथ जिसे आप कह रही हैं, अगर वह खरा है तो नकार के रास्ते पर चलेगा, निषेध की बात करेगा। वह आपको सिखाएगा भी तो कुछ ऐसा जो आपसे कुछ घटा देता हो, कुछ जोड़ेगा नहीं आप में।
ग़ौर करिएगा कि अधिकांशतः जो शब्द धर्म के साथ जुड़ते हैं, वह नकार के शब्द हैं — अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, असत्य। आपसे कहा जाता है — जीवन से कुछ हटाओ। आपसे कहा जाता है — जीवन से कुछ हटाओ — यह काम होता है धर्म ग्रंथों का।
धर्म ग्रंथ जीवन से क्या हटाने को कहते हैं? वो, जो असली लग रहा है पर असली है नहीं। और लग कैसा रहा है? असली और आकर्षक और सुंदर। क्या कहने! तो धर्म ग्रंथ कुछ ऐसा हटाने को कहते हैं जीवन से जो असली लग रहा है, असली है नहीं।
अब आते हैं ध्यान पर। आपने कहा ध्यान करना पसंद है लेकिन धर्मग्रंथ पढ़ना पसंद नहीं है। जिसे आमतौर पर ध्यान कहा जाता है, वह क्या है? वह है किसी ध्येय में मन को एकाग्र करके स्थिर और संयमित कर देना। यही है न ध्यान?
ध्येय तो सभी चुनते हैं, भावना जी। दुनिया में कोई नहीं मिलेगा आपको जो पूर्णतया ध्येयरहित हो। और ध्येय अगर सभी के पास है तो ध्यानी भी सभी हो गए एक दृष्टि से। जब जीवन में सभी के ध्येय उपस्थित है तो ध्यानी भी तो सभी हो गए न उस नाते! पर सब तो ध्यानी होते नहीं। ध्यान तो अद्भुत, विलक्षण और विरल बात है। किसी-किसी को ही संभव हो पाता है वास्तविक ध्यान।


