वक्ता: जब किसी को बहुत कुछ हासिल होता है, तो वो थोड़ा मिलने पर खुश नहीं हो जाता और थोड़ा जाने पर दुखी भी नहीं हो जाता| जैसे कि कोई करोड़पति नाचने नहीं लग जायेगा, अगर उसे दस रूपए मिल गए और रोने नहीं लग जायेगा, अगर उसके दस रूपए कम हो गए | ऐसी हालत जिसमें मन को लगातार यह एहसास है कि कुछ बहुत कीमती चीज़ उसके पास है| ‘है’ और छीनी जा नहीं सकती, पक्का-पक्का मिली ही हुई है, बहुत करीब है, स्वरूप जैसी है, स्वभाव जैसी है| इस स्थिति को कहते हैं, ‘समभाव’, ‘*एक्वानिमिटी*’|
उस कीमती चीज़ के एहसास से, दुनिया के प्रति समभाव आता है| समभाव माने, जो भी है, वो मेरे लिए एक समान है क्योंकि जो असली है, वो पहले से मेरे पास है| तो अब बाहर-बाहर जो भी हो रहा है, वो एक बराबर ही है| समझ रहे हो बात को? मेरे पास कुछ ऐसा है जो बहुत महत्वपूर्ण है| जो भी कुछ आख़िरी हो सकता था, ऊँचे-से-ऊँचा और कीमती-से-कीमती है, वो मुझे उपलब्ध है| वो मुझे मिल ही गया है| अब बाहर का नफ़ा-नुकसान, मुझे प्रभावित करता ही नहीं|
“तो किसी दिन खूब खाने को मिल गया, कोई बात नहीं, बहुत खुश क्या हो जाना है? और किसी दिन बिना जलपान के रह लिये, तो भी कोई बात नहीं| जो हमारी असली भूख थी वो मिटी हुई है|” समझ रहे हो? कुछ इसी तरीके से कोई अच्छी जगह रहने को मिल गयी, तो भी ठीक है और खुले मैदान में ही सोना पड़ गया तो भी ठीक है| क्यों? क्योंकि जिसका असली आसरा हो सकता है, वो हमें मिला हुआ है| गणित की भाषा में कहो तो इनफिनिटी में पाँच हज़ार जोड़ भी दो, तो भी क्या रहेगा?
श्रोता*(एक स्वर में)*: इनफिनिटी




