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अपनों को खोने का दुख || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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(दुख के ऊपर ही तीन प्रश्न थे जिन्हें एकसाथ लिया गया है)

प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी, अपने परिवार के एक के बाद दूसरे पुरुष के चले जाने के बाद भी दुख न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?

प्र२: नमस्कार आचार्य जी, तो ऐसा तो नहीं है न कि सुख-दुख महसूस करना भी सही बात नहीं है? उदहारण स्वरूप अपने किसी करीबी को खो दिया तो दुख होना तो लाज़मी सी बात लगती है।

प्र३: आचार्य जी, मेरा भाई है जो जन्म से विकलांग है। उसके बेसिक (बुनियादी) काम भी मुझे और माँ को करने होते हैं। ऐसे में उससे बहुत मोह लगा हुआ है और इस परिस्थिति में भी अनासक्ति का भाव लाना चाहिए क्या? और अगर हाँ, तो कैसे?

आचार्य प्रशांत: देखो, बिलकुल ठीक कहा आपने कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि दुख का अनुभव न हो। और बिलकुल प्राचीन काल से ही जो मूलभूत मानव समस्या है, वो दुख की ही है। आदमी ने बाकी अपनी सारी समस्याओं का कुछ-न-कुछ किसी तरीक़े से निवारण, निष्पादन कर ही डाला है।

सुरक्षा की समस्या होती थी; इंसान ने उसके लिए घर बना लिये और व्यवस्थाएँ कर ली। रोटी की समस्या होती थी; आज रोटी की समस्या के लगभग पार जा चुका है आदमी। कपड़ा हो, और तरह की जो भी। जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक प्रगति करते जा रहें हैं, आदमी अपनी सभी तरह की अन्य समस्याओं से मुक्त ही होता जा रहा है।

एक यही समस्या है जिससे इन्सान छुटकारा पा ही नहीं पा रहा। वो समस्या आज भी लगभग उतनी ही है, शायद हो सकता है ज़्यादा ही हो, जितनी आज से दस हज़ार साल पहले थी। कौनसी समस्या? दुख की समस्या।

आप रोटी, कपड़े, पैसे, सुरक्षा सबका बन्दोबस्त कर भी लेते हैं लेकिन आप पाते हैं कि दुख तो अभी भी मौजूद है। तो मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि दुख इतनी हल्की चीज़ है कि आप दो-चार बातें सुनेंगे और दुख हट जाएगा इत्यादि-इत्यादि। न मैं ये कह रहा हूँ कि जो दुख का अनुभव कर रहा है उसने कोई अपराध वगैरह कर दिया।

ये हमारी बिलकुल मूलभूत शारीरिक प्रकृति है कि दुख का अनुभव होगा ही होगा; सबको है, सन्तों को भी होता है। तो क्या करें? दुख की बात क्या है पूरी? देखो, पूरी बात यह है कि दुख जब होता है तो एक व्यक्ति उस दुख की गहराई में पहुँच जाता है और दूसरा व्यक्ति चूँकि गहराइयों का अभ्यस्त ही नहीं होता, तो दुख की सतह पर ही रह जाता है। इस बात को मैं पूरा अच्छे से समझाऊँगा।

दुख की गहराई में जाने के दो मतलब होते हैं। पहला, 'ये जो घटना घटी, जिसने मुझे इतना हिला दिया कि तोड़ दिया, ये वास्तव में आ कहाँ से रही है मेरे भीतर से?' जब आप वहाँ पहुँच जाते हो, तो आप इस दुख के बाद, या इस दुख से मिलते-जुलते अन्य दुखों का दरवाज़ा बन्द कर देते हो। वो नहीं आएँगे। आपने दुख का भी सदुपयोग कर लिया। आपको चोट लगी, आपने उस चोट से भी फ़ायदा उठा लिया।

जो चोट लगी है, देखो, उससे तो जो पीड़ा है, कष्ट है, नुक़सान है, उसकी कोई भरपाई हो नहीं सकती। तो मैं वो बता रहा हूँ जो अधिकतम किया जा सकता है किसी अवाँछित स्थिति का अनुभव होने के बाद। वो यही किया जा सकता है कि तुम्हारे साथ जो हुआ उसको ठीक से समझो, पूरा ध्यान दो, गहराई से जाओ कि ये क्या हो रहा है।

इससे दो लाभ होंगे। पहला लाभ मैंने बताया कि ऐसी स्थिति तुम्हारे जीवन में दुबारा नहीं आएगी, तुम पुनरुक्ति से बच जाओगे। दूसरा जो लाभ होगा वो बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरा लाभ ये होगा कि तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारे साथ जो हुआ वो सिर्फ़ तुम्हारे ही साथ नहीं हो रहा है, सबके साथ हो रहा है। तुम्हारे मन में करुणा जागेगी। उससे दुख अपनेआप कम हो जाता है और उससे एक बड़े गहरे, सुन्दर और शुद्ध तरीक़े के सुख के दरवाज़े खुल जाते हैं — 'निस्वार्थ प्रेम'।

दुख तुमको इन दो तरीकों से अगर सुन्दर कर दे, शुद्ध कर दे, और उठा दे तो दुख बुरा नहीं हुआ फिर। पहला – दुख तुम्हारे जीवन में गहराई ले आ दे। दूसरा – दुख तुम्हारे जीवन में दूसरों के प्रति आत्मीयता ले आ दे। क्योंकि जो दुख तुम्हें मिल रहा है, तुम पहले नहीं हो, किसी-न-किसी रूप में वो दूसरों को भी मिल रहा है। अगर दुख ऐसा कर दे तो — सुनने में हो सकता है थोड़ा विचित्र लगे ये बात — दुख को वरदान ही मानना। दुख कुछ ऐसा कर गया आपके साथ जो दुख के बिना शायद हो ही नहीं सकता था, तो दुख को फिर हम वरदान क्यों न मानें।

लेकिन खेद की बात, कि अधिकांश लोग दुख का ही सदुपयोग नहीं कर पाते। दुख के बाद वो गहराई में जाने से और बचने लगते हैं, कतराते हैं। वो इतना डर जाते हैं कि बस चिड़चिड़े हो जाते हैं, और असुरक्षित अपनेआप को महसूस करते हैं। जिस चीज़ पर नियंत्रण करा ही नहीं जा सकता — माने जीवन के, प्रकृति के संयोग — उन संयोगों पर नियन्त्रण करने के लिए वो और ज़्यादा छटपटाते हैं। जिसे आप अंग्रेज़ी में कहोगे कंट्रोल फ्रीक (नियंत्रण प्रेमी) हो जाना।

अगर ऐसा हो रहा है तो इसका मतलब दुख आपके किसी काम आया नहीं। इसका मतलब ये है कि आपका अहंकार बहुत हठी है, बहुत बलवान है। वो अभी कह रहा है, 'मैं ये छोटे-मोटे दुखों से तो कुछ सीखूँगा ही नहीं। मुझे तो कोई बड़ा वाला दुख दो, तब शायद मैं कुछ सीखूँ!'

दुख आपको मिलता है — लोगों ने ग़लत नहीं कहा है बिलकुल — कि आप उससे कुछ सीखें और बेहतर हो पाएँ। इसीलिए दुख बहुधा लहरों में आता है। पहले छोटी लहर, फिर उससे बड़ी, फिर उससे बड़ी, फिर उससे बड़ी। पहले तो कोई छोटी लहर ही आएगी, आप उसी से सीख लो न! उससे सीख लिया तो आगे वाली बड़ी लहरों की नौबत ही नहीं आएगी।

अगर दुख की कोई बहुत बड़ी लहर आकर आपसे टकराई है, आपको चोट दी है, आपको बहाकर ले गयी है, तो एक बात तय जानिएगा, उससे पहले की दसियों जो छोटी लहरें आयी थी, आपने न उन्हें ध्यान दिया, न सम्मान। वो सब छोटी-छोटी लहरें आती रही, आप उनकी उपेक्षा करते रहे, 'अजि छोड़ो, अजि छोड़ो।'

फिर बड़ी लहर आती है, आपको धक्का लग जाता है, चिल्ला पड़ते हो, 'यह क्या हो गया मेरे साथ!' जो भी हो गया आपके साथ, अभी भी सीख लो, इसीलिए आया है वो कि सीखो।

सन्तों ने बहुत बार हमें समझाया है कि सुख का तो पता नहीं पर दुख को तो तुम परमात्मा का सन्देश समझना। उसकी सीधी-सीधी पुकार आप सुन नहीं रहे तो उसके पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, वो टेढ़ी उंगली से अब घी निकाल रहा है। वो कह रहा है, 'अब इसको बुलाने का एक ही तरीक़ा है, इसको दुख दो।' थोड़े से दुख में ही सुधर जाओ ताकि बड़ा दुख न झेलना पड़े। और अगर बड़े दुख में भी सुधर नहीं रहे हो तो चेतावनी ये है कि और बड़े दुख की माँग तुम ख़ुद कर रहे हो। शिकायत मत करना और बड़ा दुख आये तो; तुमने माँगा था। समझ में आ रही है बात?

तो अभी आपके जीवन में कोई ऐसी स्थिति है जिसमें दुख निहित है — मैं बिलकुल संवेदना रखता हूँ, लेकिन मैं आपको साथ ही ये भी कहूँगा, जितना आप गहराई से उतरेंगे उस स्थिति में, उतना आप पाएँगे कि दुख कम हो रहा है, बोध बढ़ रहा है। और जितना आप गहराई से उतरेंगे उस स्थिति में, उतना मैं कहूँगा कि आपमें जगत के प्रति करुणा भी बढ़ेगी, क्योंकि आपके साथ कुछ विशेष नहीं हो गया है। आदमी की सदा-सदा की ये कहानी है, क्या? 'दुख!'

गर्भ से दुख ही पैदा होता है। आप-अपने दुख को समझ गये, तो आप रो पड़ेंगे। इसलिए नहीं कि आप बहुत दुखी हैं, आप रो पड़ेंगे क्योंकि दुनिया का हर व्यक्ति बहुत-बहुत दुखी है। बस कुछ को दुख का अनुभव हो रहा है और कुछ को दुख ने इतना पंगु कर दिया है, इतना संवेदना-शून्य कर दिया है, इतना नम्ब (सुन्न) कर दिया है कि उनको दुख का अनुभव ही नहीं हो रहा; पर दुख का अनुभव तो होगा।

आपको किसी सर्जरी (शल्यचिकित्सा) वगैरह के दोरान बेहोश करने की दवाई दे दी जाती है, एनेस्थीसिया; वो सदा के लिए तो नहीं रहता न? वो हटेगा, लेकिन जब हटेगा तो चीखें उठेंगी। और चीखें न उठें उसके लिए हम क्या करते हैं? हम उसे हटने नहीं देते, हम एक तरह की बेहोशी के बाद दूसरी तरह की बेहोशी का कार्यक्रम कर लेते हैं।

ऋषि हमको समझा रहे हैं, "सुख का सम्बन्ध बेहोशी से नहीं है, सुख का सम्बन्ध ज्ञान से, अर्थात होश से है।"

और ये बात हमारे जीवन से बिलकुल उल्टी है, आप सावधान हो जाइए! मैं आपसे अभी कहूँ कि अपने जीवन के सबसे सुखी पलों की सूची बनाएँ, तो आप पाएँगे कि आपको सबसे ज़्यादा सुख मिलता ही वहाँ है जहाँ आप सबसे ज़्यादा बेहोश होते हो। ऋषि कह रहे हैं, सुख का सीधा सम्बन्ध किससे है? होश से, ज्ञान से। आप समझ रहे हो, आप चैतन्य हो; यही सुख है।

और आम-आदमी को सुख मिलता ही वहाँ है जहाँ वो बेहोश है, जहाँ उसे कुछ समझ-वमझ नहीं आ रहा है, जहाँ वो चेतना-शून्य हो गया है, जहाँ उसको बस मज़े आ रहे हैं। शराब में सुख मिलता है, प्रमाद में सुख मिलता है, ख़रीददारी में सुख मिलता है, सेक्स में सुख मिलता है; इन सब घटनाओं में ईमानदारी से बताइएगा, आपका होश ऊँचा होता है या नीचा? हमारे सुख का सम्बन्ध सीधा-सीधा होश के अभाव से है। इसीलिए हमारा सुख अति-घातक होता है। जब आप सुखी हो रहे हो तो अपनेआप से पूछिएगा, 'होश कहाँ है?'

सुख बुरा नहीं है, अध्यात्म सुख विरोधी नहीं होता; बेहोशी बुरी है, अध्यात्म जड़ता विरोधी होता है। अध्यात्म सुख का विरोधी नहीं है, अध्यात्म तो कहता है, "आनन्द स्वभाव है।" अध्यात्म तो आपको सुख के शिखर पर ले जाना चाहता है, महा-आनन्द में आपको स्थापित करना चाहता है।

तो फिर लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि, अरे! आध्यात्मिक हो गये तो हमारा तो सुख ही छिन जाएगा? क्योंकि हमारा सुख सदा किससे जोड़ी बनाकर रखता है? बेहोशी से। और अध्यात्म किसका विरोध करता है? बेहोशी का।

हमारी हालत कुछ ऐसी है कि हमारे सारे सुख ही बेहोशी से हैं, तो जब बेहोशी हटती है तो सुख भी हट जाते हैं। अध्यात्म बेहोशी हटाता है, साथ में हमारे सुख भी चले जाते हैं। तो हम कहते हैं, 'अध्यात्म बहुत बुरी चीज़ है, हमारे सारे सुख ही छीन लिये।'

अरे, अध्यात्म ने सुख नहीं छीन लिये, अध्यात्म ने बेहोशी छीनी है। अध्यात्म इसमें क्या करे अगर तुम्हारे सारे सुख ही बेहोशी के थे। तुम्हें नशा करके ही सुख मिलता था। पर नशा करके जो सुख मिलता है, मुझे बता दो, वो तुमको भीतर से छलनी नहीं कर रहा? क्या तुम ख़ुद नहीं जानते कि वो सुख झूठा है? उस सुख के मत्थे तुम जीवन काट लोगे? बोलो?

ज्ञान वाला सुख श्रेष्ठ है। होश में जो सुख है उसको अपनाएँ, फिर दुख से वास्तविक मुक्ति होगी।

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