(दुख के ऊपर ही तीन प्रश्न थे जिन्हें एकसाथ लिया गया है)
प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी, अपने परिवार के एक के बाद दूसरे पुरुष के चले जाने के बाद भी दुख न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?
प्र२: नमस्कार आचार्य जी, तो ऐसा तो नहीं है न कि सुख-दुख महसूस करना भी सही बात नहीं है? उदहारण स्वरूप अपने किसी करीबी को खो दिया तो दुख होना तो लाज़मी सी बात लगती है।
प्र३: आचार्य जी, मेरा भाई है जो जन्म से विकलांग है। उसके बेसिक (बुनियादी) काम भी मुझे और माँ को करने होते हैं। ऐसे में उससे बहुत मोह लगा हुआ है और इस परिस्थिति में भी अनासक्ति का भाव लाना चाहिए क्या? और अगर हाँ, तो कैसे?
आचार्य प्रशांत: देखो, बिलकुल ठीक कहा आपने कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि दुख का अनुभव न हो। और बिलकुल प्राचीन काल से ही जो मूलभूत मानव समस्या है, वो दुख की ही है। आदमी ने बाकी अपनी सारी समस्याओं का कुछ-न-कुछ किसी तरीक़े से निवारण, निष्पादन कर ही डाला है।
सुरक्षा की समस्या होती थी; इंसान ने उसके लिए घर बना लिये और व्यवस्थाएँ कर ली। रोटी की समस्या होती थी; आज रोटी की समस्या के लगभग पार जा चुका है आदमी। कपड़ा हो, और तरह की जो भी। जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक प्रगति करते जा रहें हैं, आदमी अपनी सभी तरह की अन्य समस्याओं से मुक्त ही होता जा रहा है।




