कबीर अपनेआप को मैं की अपेक्षा कबीर कहकर उससे दूरी कर लेते हैं जो मरेगा, जो सीमित है और फिर वो शान से फ़रमाते हैं, “मैं कबीरा ऐसा मरा, दूजा जनम न हो।” “मैं कबीरा ऐसा मरा।” वो मर गया, जो कहता, ‘मैं’ कबीर, मैं कबीर। अब कौन बचा या तो सिर्फ़ मैं, या तो सिर्फ़ कबीर, ये जुड़ना नहीं बचा, ये द्वैत नहीं बचा। वो अतृप्त अहंकार नहीं बचा जिसे नाम का सहारा चाहिए और वो नाम नहीं बचा जो अहंकार की बैसाखी के साथ खड़ा होता है।
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प्रश्नकर्ता: कमलेश पूछ रहे हैं कि ये राज़ क्या है कबीर हों, कि बुल्लेशाह हों, ये अपनेआप को किसी गैर की तरह क्यों सम्बोधित करते हैं — “कहें कबीर सुनो भाई साधो, कबीरा खड़ा बाज़ार में”? ऐसा क्यों नहीं बोलते — “मैं खड़ा बाज़ार में”? “बुल्ले नु समझावण आइयाँ”, “बुल्ला की जाणा मैं कौन” — ये क्या है?
आचार्य प्रशांत: कबीर अगर कबीर हैं तो फिर तो नीरू और नीमा के हैं, फिर तो बनारस के हैं, फिर तो जुलाहों के हैं, फिर तो बस चौदहवीं शताब्दी के हैं। समझ रहे हैं न? कबीर होना झूठ नहीं है, बस आंशिक है। कबीर हो जाने का अर्थ हो गया — वो देह हो जाना जिसे कुछ लोगों ने अधिकार पूर्वक नाम दिया था, कबीर! और यदि कबीर वो व्यक्ति ही हैं तो वो व्यक्ति तो बड़ा सीमित है। वो व्यक्ति तो मर गया और उस व्यक्ति ने एक सीमित भाषा में कुछ सीमित बातें बोली थीं। कबीर से दूरी रखकर, कबीर अखिल ब्रह्मांड के हो जाते हैं और कबीर अगर कबीर ही रहे आते तो एक छोटे से कुनबे भर के रह जाते। हम चूँकि हम रहे आते हैं इसलिए संसार हमसे बेगाना रहा आता है।
आप अगर वही शरीर हैं, जिसका जन्म हुआ, आप अगर वही पहचान हैं, जो आपको मिली है और आपने ओढ़ी तो फिर तो आपके वो सारे कर्तव्य भी हैं और वो सारी सीमाएँ भी हैं, जो नामों, पहचानों और देह के साथ आती हैं। अब भूल जाइए “वसुधैव कुटुम्बकम्”, अब भूल जाइए अमरता और अनन्तता। कबीर तो एक दिन जन्मा था और मरेगा; पर कबीर न जन्मते हैं, न मरते हैं।




