इन्द्रियों पर विजय कैसे प्राप्त करें? कर्म और अकर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ ||
जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। शत-शत नमन। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान है, उसी को ज्ञान प्राप्त होता है और उसके बाद तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। लेकिन हम संसारी भौतिक सुख में इतने उलझ जाते हैं कि इन्द्रियों को जीतना मुश्किल सा हो रहा है। तो कृपया मार्गदर्शन करें ताकि अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकें।
आचार्य प्रशांत: श्लोक ही मार्गदर्शन है। श्लोक क्या कह रहा है? श्लोक कह रहा है - जितेन्द्रिय हो तो ज्ञान प्राप्त करोगे। साधनापरायण हो तो ज्ञान प्राप्त करोगे। तो श्लोक ने साध्य और साधन दोनों बता दिए न। क्या पाने योग्य है, ये भी बता दिया और किस साधन के द्वारा उसे पाया जा सकता है, ये भी बता दिया।
जो पाने योग्य है, उसका क्या नाम दिया यहाँ पर?
प्र१: सहजता से भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति।



