श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

पाहन लै देवल रचा, मोटी मूरत माहि। पिण्ड फूटि परबश रहै, सो लै तारे काहि।।
पाहन पूजि के, होन चहत भव पार। भीजि पानि भेदै नदी, बूडै जिन सिर भार।।
वक्ता: मुक्ति का, बड़े से बड़ा भ्रम यह है कि ‘मुक्ति’, हमारे किये मिल सकती है। हम, कुछ ऐसा कर लेंगे, जो हमें मुक्त कर लेगा। आदमी ने, जितनी कोशिश मुक्ति की, की है, उतना ही ज़्यादा, ये बेवकूफी भी की है कि माना है कि ‘मुक्ति’ एक ऐसा साध्य है, मन जिसका साधन हो सकता है। गहरी से गहरी कोशिश, हमारी है, सच को जान लेने की और उतना ही गहरा आग्रह, गहरी ज़िद्द, हमारी है कि ‘हम ही’ जानेंगे। एक छोटी सी बात है, जिसे आदमी, हमेशा भूल जाता है कि,
‘स्वयं’ मुक्त नहीं हुआ जाता । ‘स्वयं से’, मुक्त हुआ जाता है ।
हम, लगातार ये कोशिश करते रहते हैं कि हम मुक्त हो जाएँ। हम जो हैं, हम वही रहें — और जान लगा दें, पूरी कोशिश कर दें, श्रम में कोई कमी ना रहे। कोई ऐसा जादू हो जाए कि — हम, ‘हम ही’ रहते हुए, पा लें रौशनी को, और मुक्त हो जाएं। क्या किया है आदमी ने? बिलकुल ये समझ में आया है कि अहंकार छोटा है। बिलकुल समझ में आया है कि, ‘’है कोई परम, जो इतना सुन्दर है, इतना अछूता है कि उसको, हम जानते भी नहीं हैं। आदमी ने उसे अपनी बनाई हुई मूर्ति में, बांध दिया और यहीं पर, सब नष्ट हो जाता है।



