दूसरे पर छींटाकशी करने का समय तो उसी के पास है, जिसके पास अपनी ज़िंदगी में कुछ ऊँचा नहीं है। सही ज़िंदगी में डूबने से ये होता है कि फालतू लोगों की फालतू बातें पता ही नहीं चलतीं। जो हिम्मत की राह चल रहे हैं, उन्हें दीन अनुभव करने के लिए ये दुनिया सौ कारण देगी। सही काम एक बार पकड़ लिया, तो फिर पकड़ लिया। डटे रहिए — यही गीता-सार है। यही वो रिश्ता है, जो एक बार बन जाए तो नहीं तोड़ा जाता।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: अभी मैंने आपका आई.आई.एम. बैंगलोर और आई.एस.सी. बैंगलोर में भी सत्र अटेंड किया था, लाइव। तो मैं ऐक्चुअली पी.एच.डी. इन बायो-केमिस्ट्री हूँ, स्विट्ज़रलैंड से, और आई.एस.सी. में भी मैंने कुछ 3 साल गुज़ारे हैं रिसर्च के। तो आपने आज जो "आग" की बात की, “कि आप अपने आप को झोंक दीजिए काम में” तो ये मैंने वैज्ञानिकों में हमेशा देखा है, पागलों की तरह काम करना।
3-3 बजे तक हमारा कैंटीन खुला रहता था आई.एस.सी. में, तो लोग बस काम ही काम किए जा रहे हैं। और कई सीरियस, कई तो ऑफ़ कोर्स टाइम पास भी करते थे, बट काफ़ी सारे वैज्ञानिकों को मैंने देखा है जो ऐक्चुअली में ज़ुनूनी तरीक़े से काम करते हैं, मतलब उनको होश ही नहीं कि अभी क्या टाइम हुआ है ऐंड ऑल दैट। तो वो किस-किस स्तर के ज्ञानी कहलाएँगे? क्या हम उन्हें ज्ञानी कह सकते हैं? बिकॉज़ बाक़ी लक्षण मुझे नहीं लगता कि वो मैच करते हैं।




