पान मसाला बेचने वाले महानायक || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आप दुनिया को जगाने का इतना महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, बहुत धन्यवाद इसके लिए। अभी एक प्रश्न कैंसर पर आया। इसका एक प्रमुख कारण तंबाकू भी है। आज की परिस्थितियाँ देखकर मन विचलित हो उठता है।
और जैसे हम सबको पता है कि शराब बेचने वाली कंपनियाँ सोडे का और जो तंबाकू बेचने वाली कंपनियाँ हैं, पान मसाले का एड (प्रचार) करती हैं। उस प्रचार में भी कंपनियों ने जो प्रमुख देश के प्रमुख अभिनेता हैं, उनको ब्रांड एम्बेसडर (ट्रेंडमार्क राजदूत) बनाया हुआ है। जो आम जनता है उन्हें भी ये सीधे-सीधे पता है कि मूर्ख बनाया जा रहा है। फिर भी कोई गुस्सा नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं।
तो क्या ऐसे समाज में परिवर्तन लाना सम्भव है? ऐसा प्रतीत होता है जैसे समाज में झूठ के साथ गठबंधन ही कर लिया हो। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: समाज ने उनसे गठबंधन नहीं कर लिया,वो समाज ही हैं। वो समाज ही हैं। गठबंधन की कोई बात नहीं है। तंबाकू, पान-मसाला, खैनी, गुटखा बेचने वालों को नागरिक सम्मान, पदमश्री ये आसमान से थोड़े ही टपके हैं, समाज ने ही तो दिये हैं। धर्म को पूरी तरह भ्रष्ट करने वालों को घोर अंधविश्वास फैलाने वालों को पद्मभूषण, पद्म विभूषण, असमान ने थोड़े ही दिये हैं, समाज ने ही तो दिये हैं।
तो ये समाज ही ऐसा है, जो स्वयं भ्रष्ट है और भ्रष्ट लोगों को ही सिर पर चढ़ाकर बैठना चाहता है। इसमें आपके लिए सीख बस इतनी है कि इन सम्मानों को आप सम्मान देना छोड़ दीजिए। उनका नाम है नागरिक सम्मान, उनमें बस नाम का ही सम्मान रहने दीजिए। उनमें कुछ भी सम्माननीय नहीं है।
देखिए, हमारी बड़ी इच्छा रहती है ये मानने की कि हम ठीक हैं, या थोड़े बेहतर हैं दूसरों से। और ग़लतियाँ दूसरे लोग कर रहे है, या समाज कर रहा है, या व्यवस्था कर रही है। समाज हम हैं, व्यवस्था हमारी है, नेता हमने चुने हैं, अभिनेताओं की पिक्चरों के टिकट हम लेते हैं। आप उनकी फ़िल्में चलाते हैं, उन्हें पदमश्री मिल जाता है। फिर वो जाकर के गुटका बेचते हैं।



