
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मेरा प्रश्न देश में चल रहे पेपर लीक प्रोटेस्ट्स के ऊपर है। तो पिछले कुछ घंटों में एक खबर आई है, जिसमें एजुकेशन मिनिस्टर ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। अब इसको जेन ज़ी के द्वारा एक बहुत बड़ी जीत के तरीके से सेलिब्रेट किया जा रहा है। तो आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है: अब जेन ज़ी के लिए कल की सुबह कैसे होने वाली है? और क्या इस सब के बाद, जितना कुछ हुआ, कुछ वास्तविक बदलाव एक्सपेक्ट किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुमने जवाब ख़ुद ही दे दिया? मैं इसमें क्या बोलूँ? सबसे पहले तो बहुत अच्छी बात है। आपने आंदोलन करा, आपको लग रहा था कि मंत्री के इस्तीफ़े से बात बनेगी। आपको इस्तीफ़ा मिल गया, बधाई हो। लेकिन हाँ, अच्छा सवाल है कि अब कल की सुबह अलग कैसे होने वाली है? कल क्या बदल जाने वाला है?
क्या बदल जाने वाला है? पता नहीं। तुम बताओ, क्या बदलेगा कल? मंत्री बदल गया है। और क्या बदला है? मंत्री तो बदल गया है और शायद अच्छा हुआ मंत्री बदल गया। ठीक है? एजुकेशन सेक्रेटरी को भी बदला गया है, और भी कई अफ़सर हैं, उनको भी हटाया गया है, कुछ लोग गिरफ़्तार भी हुए हैं। उनकी जवाबदेही है, उनको एक ज़िम्मेदारी दी गई है व्यवस्था चलाने की। वो नहीं चला पाए उनको हटना पड़ा, वो ठीक है। पर कल क्या-क्या बदला हुआ होगा? मैं जानना चाहता हूँ।
श्रोता: मंत्री नया आएगा।
आचार्य प्रशांत: हाँ, ठीक है। और क्या बदला हुआ होगा?
प्रश्नकर्ता: सर, यह धारणा मज़बूत हो जाएगी कि इसी तरह का प्रोटेस्ट करने से बदलाव आएगा।
आचार्य प्रशांत: चलो, शुरू से शुरू करें। भारत में अभी हाल के वर्षों में प्रतिवर्ष लगभग 15,000 युवा आत्महत्या करते हैं, जेन ज़ी की बात हो रही है। कितने? 15,000। और पिछले 15 सालों में यह आँकड़ा लगभग दो गुना हो गया है, दो गुना। हम क्यों जेन ज़ी और आत्महत्या के आँकड़ों से बात शुरू क्यों कर रहे हैं? क्योंकि एक बड़ी दर्दनाक घटना घटी थी अभी नीट पेपर लीक के साथ। 10 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी और वही मूल मुद्दा था। वही असली बात थी कि हमारे युवा ज़बरदस्त दबाव में हैं, तनाव में हैं। वही तो असली ह्यूमन ट्रेजडी है न, हमें उसी का तो समाधान चाहिए न। तो मैं बात वहीं से शुरू करता हूँ।
15,000 युवा प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक है? थोड़ा-बहुत आँकड़ा ऊपर-नीचे होता रहता है हर साल। और यह आँकड़ा 15 साल पहले की अपेक्षा लगभग दो गुना हो गया, 80–90% बढ़ा हुआ है। आशंका यह है कि भविष्य में और बढ़ेगा। अब एक और आँकड़ा सुनो, इन 15,000 में से सिर्फ़ 1,500 होते हैं जिनकी आत्महत्या का कारण होता है फ़ेल्यर इन एग्ज़ामिनेशन। जिन्होंने आत्महत्या सिर्फ़ इसलिए करी थी क्योंकि उनको किसी परीक्षा में सफलता नहीं मिली, चाहे वो बोर्ड एग्ज़ाम हो, चाहे वो एंट्रेंस एग्ज़ाम हो। ठीक है? 15,000 में से 1,500, जिनकी आत्महत्या का संबंध परीक्षाओं से था। और इन 1,500 में से भी और बहुत-बहुत कम हैं जिनका संबंध पेपर लीक की किसी विशेष घटना से हो। क्योंकि पेपर कोई पहली बार नहीं लीक हुआ है, हम जानते हैं पिछले 10–15 सालों में पेपर लगातार लीक हुए हैं दर्जनों बार लीक हुए हैं, दर्जनों बार। ठीक है?
तो पेपर लगातार लीक होते रहे हैं, और हमने यह पाया है कि 15,000 में से सिर्फ़ 1,500 होते हैं जिनकी आत्महत्या का; हम युवाओं की बात कर रहे हैं, हम जेन ज़ी* की बात कर रहे हैं, जिनकी आत्महत्या का संबंध परीक्षा में उनकी परफ़ॉर्मेंस से होता है। और उन 1,500 में से भी शायद बमुश्किल 10 से 20 होते हैं जिनकी दर्दनाक मृत्यु, आत्महत्या का संबंध पेपर लीक से होता है। तो फिर प्रश्न यह उठता है कि बाक़ी सब, लगभग सारे के सारे 14,990, वो युवा क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? और उनके लिए कल क्या बदल गया?
क्या हम मूल समस्या को समझना भी चाह रहे हैं? मूल समस्या यह है कि भारत अपने बच्चों और अपने युवाओं के साथ ज़बरदस्त नाइंसाफ़ी करता है। यह है मूल समस्या। और ताज्जुब मुझे इस बात पर होता है कि इस मूल समस्या को स्वयं युवा ही नहीं समझना चाहते, जबकि नाइंसाफ़ी उन्हीं के साथ हो रही है लगातार। मैं इसे नाइंसाफ़ी क्यों बोल रहा हूँ? क्योंकि जब उनके साथ समाज का, व्यवस्था का, परिवार का दुर्व्यवहार शुरू होता है तब वो इस हालत में भी नहीं होते हैं कि कोई चुनाव कर सकें।
देखो, मैं आमतौर पर बोलता हूँ कि किसी को विक्टिम कार्ड नहीं खेलना चाहिए। मैं आमतौर पर बोलता हूँ कि कोई यह न कहे कि मेरे साथ नाइंसाफ़ी हुई, मेरे साथ ग़लत हुआ, मैं तो मजबूर था। लेकिन उसमें एक अपवाद होता है, बच्चा। चुनाव वह करेगा न जिसका कम-से-कम शारीरिक तंत्र इतना विकसित हो, ब्रेन इतना विकसित हो कि वह चुनाव कर पाए। चार साल... चार साल तो ज़्यादा हो गया, चार महीने, दो साल, चार साल, छह साल, आठ साल, चौदह साल का भी बच्चा चुनाव नहीं कर सकता। वो हर तरीके से आश्रित है, उसे कुछ नहीं पता और उसके सामर्थ्य भी कुछ नहीं। और यही वह वर्ग है जिसके साथ समाज-व्यवस्था सबसे ज़्यादा अन्याय करते हैं।
22 लाख... सोचो, 22 लाख कैंडिडेट्स हैं। 22 लाख या 24 लाख। सीटें कितनी? 25,000 या 50,000, ऐसी ही रहती हैं। गवर्नमेंट की 25,000 सीटें। यूपीएससी कितना? 20 लाख या और ज़्यादा? 12 लाख। और सीटें कितनी? हज़ार। मैं पूछ रहा हूँ, इन बच्चों को, इन युवाओं को सबसे पहले यह बताओ: ये सिखाया किसने कि इन्हीं रास्तों पर भागना ज़रूरी है? इन पर इतना दबाव बनाया किसने कि हज़ार सीटों के लिए 12 लाख युवा भागे जा रहे हैं? शुरुआत वहाँ से करनी पड़ेगी न, नहीं तो कल की सुबह कुछ बदलने नहीं वाला। इस्तीफ़ा आ गया, लेकिन उससे कुछ बदलने नहीं वाला। बल्कि होगा यह कि वो लोग जो ख़ुद उत्तरदायी हैं युवाओं पर पड़ते घोर दबाव के लिए, तनाव के लिए, वही सेलिब्रेशन की पार्टी में सबसे आगे-आगे होंगे।
उदाहरण के लिए, कोचिंग इंस्टीट्यूशंस। युवाओं की जो दुर्गति है उसके बहुत बड़े बेनिफ़िशरी तो कोचिंग इंस्टीट्यूशंस ही हैं। बहुत सारी ये जो एग्ज़ामिनेशन-रिलेटेड सुसाइड्स होती हैं, ये कोचिंग टाउन्स में होती हैं। पर अभी अब जब उत्सव का माहौल बनेगा कि "हाँ, युवा जीत गए," तो उसमें बहुत सारे लोग आगे-आगे होंगे, जिसमें कोचिंग वाले भी आगे-आगे होंगे। माँ-बाप भी कह रहे होंगे कि, "हाँ, हाँ, मेरा बच्चा भी गया था वहाँ पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में, तो हमने सरकार को झुकाया। देखो, मेरे बच्चे ने करके दिखाया।" मेरे बच्चे ने तो करके दिखाया पर तुम ख़ुद वो हो जिसने अपने बच्चे पर उम्र भर प्रेशर बनाया। उम्र भर प्रेशर बनाया। वह असली ट्रेजडी है जिसकी बात कोई नहीं करना चाहता।
एक समाज के तौर पर, एक शिक्षा-व्यवस्था के तौर पर, एक परिवार के तौर पर और व्यक्तियों के तौर पर, क्योंकि माँ-बाप सबसे पहले व्यक्ति होते हैं, इंसान होते हैं। हम कैसे हैं कि हम अपनी औलादों को अपने अरमान पूरा करने का ज़रिया बना लेते हैं? इस सवाल पर कोई बहस नहीं हो रही। और जब कोई बहस नहीं हो रही तो मुझे डर है कि कल की सुबह अलग नहीं होने वाली। कल फिर से सुबह न जाने कितने बच्चों और युवाओं को ज़बरदस्ती अँधेरे रास्तों पर धकेल दिया जाएगा।
"अरे, हमारे अरमान और हमारी इज़्ज़त के लिए तुम जाओ अब इंजीनियरिंग करो। जाओ, तुम्हें डॉक्टर बनना ही पड़ेगा क्योंकि बुआ का लड़का बन गया है न जाकर डॉक्टर। तो तुम्हें भी डॉक्टर बनना पड़ेगा। नहीं, नहीं, ये सब तुम क्या कर रहे हो? छोटी-मोटी नौकरी नहीं चलेगी। प्राइवेट नहीं चलेगा। आओ, घर बैठो यूपीएससी की तैयारी करो। अच्छा, तुम्हें दिल्ली जाकर तैयारी करनी है यूपीएससी की? चलो, हम देते हैं पैसा, जाओ, हमारी इज़्ज़त का सवाल है, तुम हमारे सपने साकार करके दिखाओ।" ये सब कल सुबह फिर शुरू हो जाएगा, और ये वो कारण हैं जिन कारणों से युवा टूटता है, आत्महत्याएँ होती हैं। ये कारण बरक़रार रहने वाले हैं। कोई चर्चा नहीं कर रहा।
आज जो युवा उत्सव मना रहे हैं वही कल के अभिभावक हैं, माँ-बाप हैं। है न? और वही कल अपने बच्चों पर फिर से दबाव डालने वाले हैं कि, "चलो, चलो, चलो, ज़िंदगी की रेस जीतकर दिखाओ।" और ज़िंदगी है क्या, वो जानते नहीं। ज़िंदगी का कुछ पता नहीं पर जल्दी से माँ-बाप बन जाना है और फिर अपने बच्चों को धकेलते जाना है। ये असली ट्रेजडी है जिसकी हम बात कर ही नहीं रहे, जिसके बाद कोई धरना, कोई प्रोटेस्ट नहीं करता।
तुम सोचो तो। तुम जा रहे हो तुम प्रोटेस्ट कर रहे हो, तुम क्या बोल रहे हो? तुम कह रहे हो कि जो परीक्षा है उसका प्रोसेस फेयर होना चाहिए। तुम ये भी तो बता दो कि तुमने इस बात की कोई तहक़ीक़ात करी कि तुम्हें उस परीक्षा में बैठना भी चाहिए था या नहीं। तुम यह तो बार-बार बोल रहे हो कि “द एग्ज़ाम, द एंट्रेंस एग्ज़ाम, द सिलेक्शन प्रोसेस मस्ट बी फेयर एंड ट्रांसपेरेंट।” और यह बहुत वाजिब माँग है, मैं सहमत हूँ इससे, बिल्कुल सहमत हूँ। भाई, आप अगर परीक्षा ले रहे हो और वह फेयर नहीं है, ट्रांसपेरेंट नहीं है, तो आप परीक्षा ले ही क्यों रहे हो? फ़िक्स्ड मैच कौन खेलना चाहता है? आपने पहले से ही तय कर रखा है कि कौन सेलेक्ट होगा, कौन नहीं सेलेक्ट होगा। आप कभी पेपर लीक कर रहे हो, कभी सिलेक्शन बोर्ड का बायस है, कभी इंटरव्यू पैनल का अपना प्रिजुडिस है। आप ये सब नौटंकी अगर करने वाले हो तो एग्ज़ाम लो ही मत।
मैं भी चाहता हूँ कि जब परीक्षा हो, तो बिल्कुल फेयर हो, ट्रांसपेरेंट हो, न्याय होना चाहिए। और मैं ख़ुद लाभार्थी रहा हूँ ऐसी परीक्षाओं का, जो फेयर थीं, मेरिट-बेस्ड थीं। तो वो होना चाहिए। लेकिन यह तो बता दो कि यह जो इतने सारे लोग उन परीक्षाओं में बैठ रहे हैं उन्हें बैठना भी चाहिए था क्या? परीक्षा तो फेयर होनी चाहिए थी, पर क्या हो अगर पता चले कि तुम उस परीक्षा में नाहक ही बैठे; कि तुम एक ऐसी सड़क के गड्ढों को हटाने की माँग कर रहे हो जिस सड़क पर तुम्हें कभी चलना ही नहीं चाहिए था। इसको तो फिर वही कहिए न, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। तुम कह रहे हो कि यह जो सड़क है, सरकार की ज़िम्मेदारी है कि इसके गड्ढे भर दे। मैं भी मानता हूँ, भाई, सड़क है तो उसके गड्ढे भरे हुए होने चाहिए। पर उससे बिल्कुल हटकर और ज़्यादा ज़रूरी एक दूसरा सवाल है, वो ये है कि तुम इस सड़क पर हो क्यों? तुम्हें इस सड़क पर भेज किसने दिया?
मैं मानता हूँ, गड्ढे नहीं होने चाहिए सड़क पर। सरकार भरे, और सरकार नहीं भर रही तो सरकार की अकाउंटेबिलिटी है, सरकार को भरना चाहिए। ठीक? पर तुम ये तो बता दो तुम क्यों हो इस सड़क पर? इतने सारे लोग, ये यूपीएससी, जेईई, नीट, क्या ये सचमुच तुम्हारी अपनी मंशा है? या तुम किसी और व्यवस्था के शिकार हो और उस व्यवस्था का तुम नाम भी नहीं ले रहे हो? तुम अपना सारा आक्रोश स्टेट पर निकाल रहे हो। और तुम्हारा आक्रोश जायज़ भी है, स्टेट ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई, आक्रोश होना चाहिए। पर इसका आधा भी आक्रोश उन इंस्टीट्यूशंस के प्रति नहीं जिन्होंने तुम्हें अँधी राहों पर धकेल दिया। बोलो तो।
और अगर नहीं है तो कल की सुबह फिर यही होने वाला है कि बिल्कुल एक अनमना-सा बच्चा या नौजवान आप पाओगे कि माँ के द्वारा या बाप के द्वारा स्कूल बस पर धकेला जा रहा है; ज़बरदस्ती धक्का देकर कॉलेज की ओर भेजा जा रहा है; ट्रेन का टिकट कटाकर कोटा की ओर भेजा जा रहा है। "जाओ, वहाँ जाओ, तुम्हें भी तो आईआईटियन बनना है।" क्यों बनना है? यह बनने का कॉन्सेप्ट क्या है?
लाइवलीहुड, मैं भी मानता हूँ होनी चाहिए, भूखा किसी को नहीं मरना चाहिए, हम सबके लिए कमाना ज़रूरी है, भाई। पर लाइफ़ क्या सिर्फ़ लाइवलीहुड होती है या उससे आगे की कोई बात होती है? और क्या सचमुच आज के समय में लाइवलीहुड इतनी बिरली चीज़ है, इतनी बड़ी और इतनी महँगी चीज़ है कि लाइवलीहुड, लाइवलीहुड करके तुम उसका बचपन और जवानी दोनों ख़राब कर दो? यह असली ट्रेजडी है आज के युवा की, हमारी जेन ज़ी की। और ज़्यादा बड़ी इससे यह ट्रेजडी है कि वह अपनी ही ट्रेजडी से परिचित नहीं है। उसको लग रहा है कि मेरे साथ नाइंसाफ़ी यह हुई है कि पेपर लीक हो गया। मैं कह रहा हूँ, ऐसा भी तो हो सकता है कि ज़्यादा बड़ी नाइंसाफ़ी यह थी कि तुम उस पेपर में बैठे, क्योंकि तुम्हें उस पेपर में ज़बरदस्ती बैठाया गया है। देखो अपनी ज़िंदगी को और पूछो अपने आप से। क्या सचमुच तुम्हें उस पेपर में बैठना भी था?
हर चीज़ में तो तुम आज़ादी ही आज़ादी कहते हो। और ज़िंदगी अपने बोध, अपने विवेक के अनुसार जीने की, चलने की आज़ादी, उसका कोई अर्थ नहीं? वो कहाँ है?
तो ढाक के तीन पात।
समस्या ख़ून में है, तमाम तरह के टॉक्सिन्स ख़ून में बह रहे हैं, ख़ून ही गंदा हो गया हमारा। और एक मुहाँसा फोड़कर हम पार्टी करना चाहते हैं कि, "देखो, फ़तह, जीत मिल गई।" जैसे कि वो मुहाँसा समस्या था। वो लक्षण था, सिम्पटम था बस, सिम्पटम। मूल समस्या जस की तस है और अब ख़तरा ये है कि आप मूल समस्या से और ज़्यादा बेख़बर हो जाएँगे, आप कहेंगे, "देखो, हमने मुहाँसा फोड़कर समस्या तो हल कर दी न, तो अब कौन-सी समस्या बची?" जब ऐसा सोचने लग जाओ, तो जो असली समस्या है वो और बढ़ जाती है विकराल हो जाती है।
पेपर लीक भी तुम समझ रहे हो क्या चीज़ है? इतने सारे लोगों को, इतने सारे लोगों को चंद सीटें चाहिए। एक-एक सीट के ऊपर हज़ार- हज़ार या दस-दस हज़ार कैंडिडेट बैठे हुए हैं। यह एक सजा-सजाया बाज़ार है, भाई। पेपर लीक हुआ तो खरीदा किसने था? स्टूडेंट्स ने ही तो खरीदा है ख़ुद। तो प्रोटेस्ट फिर किसके ख़िलाफ़ हो रहा है? पेपर लीक हुआ। मंत्रालय से लीक हुआ, वहाँ कोई ऑफ़िसर बेईमान है, फिर कोई बीच में दलाल आया होगा। और खरीदा किसने है पेपर? स्टूडेंट ने ही तो खरीदा है। तो उन स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ कब प्रोटेस्ट हो कि जिन्होंने पेपर खरीदा? उन स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ कब प्रोटेस्ट होगा जिन्होंने पेपर खरीदा था? और जिन्होंने पेपर खरीदा था, उनमें से कितने लोग प्रोटेस्ट करने आए?
इतने सारे स्टूडेंट्स आए प्रोटेस्ट करने, उनमें वो कहाँ हैं जिन्होंने पेपर खरीदा था? और इतनी गिरफ़्तारियाँ भी हुईं, सब हुआ। वो माँ-बाप जिनके पैसों से पेपर खरीदा गया उनकी संतानों के लिए, उनका नाम कौन लेगा? उनका नाम कौन लेगा?
हम ऐसा दर्शाना चाहते हैं जैसे समस्या वहाँ है, बाहर कहीं। और माफ़ करिएगा आपको मैं सवाल पूछूँगा, असुविधा हो जाएगी, आपको बुरा लगेगा, ग़ुस्सा आएगा मेरे ऊपर पर कर लीजिए ग़ुस्सा। मैं ये भी पूछना चाहता हूँ, ऐसा तो नहीं कि ऐसे भी प्रोटेस्टर्स थे, जिनको अगर किसी तरह पेपर मिल गया होता और सिलेक्शन हो गया होता, तो वे कदापि प्रोटेस्ट में नहीं आते? बोलिए। तो हम प्रोटेस्ट कर किसके ख़िलाफ़ रहे हैं? इस बात के ख़िलाफ़ कि उसने फ़ायदा उठा लिया लीक का? फिर तो प्रोटेस्ट इस बात के ख़िलाफ़ है कि लीक हुआ पेपर और फ़ायदा उसने उठा लिया।
क्योंकि ये सवाल चुभता है, और मुझे मालूम है इस सवाल को सुनकर बहुतों को ग़ुस्सा आएगा, लेकिन फिर भी सवाल तो सवाल है। और आप जवान लोग हैं आप भी इतने सवाल करते हैं, तो आपको बुरा नहीं लगना चाहिए कि मैं भी अगर आपसे कुछ सवाल करूँ तो। बहुत बार तो ऐसा भी हुआ होगा न, बताना। कि पेपर चुपचाप लीक हो गया, किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा भी तो होता होगा। हमें तो बस वो किस्से पता चलते हैं, जहाँ पेपर लीक हुआ और यह बात भी लीक हो गई कि पेपर लीक हो गया। तो हमें तो डबल लीक पता चलती है। दो घटनाएँ हैं: एक है पेपर का लीक होना, और दूसरा इस बात का लीक होना कि पेपर लीक हो गया।
इनमें ऐसा भी तो होता होगा न, बहुत सारे राज्यों में, बहुत सारे सालों में, बहुत सारे एग्ज़ाम्स में, कि पेपर लीक हुआ और चुपचाप लीक भी हो गया। जिन्हें ख़रीदना था, उन्होंने खरीद भी लिया। वो सेलेक्ट भी हो गए, वो डॉक्टर, इंजीनियर, उन्हें जो बनना था वो बन भी गए। ये सब जो बन गए, डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, जो भी बन गए, इन्हें तो हमने कभी प्रोटेस्ट करते नहीं देखा। इन्हें तो नहीं देखा न? तो कुल मिलाकर बात यह है कि मेरा हित सध जाए, मेरा हित सध जाए। और यही जो बात है यह कल की सुबह को बदलने नहीं देगी।
ऊर्जा और आक्रोश खूब है युवाओं के पास, लेकिन विवेक के बिना आक्रोश अँधा हो जाता है। अँधे आक्रोश से, अँधी ऊर्जा से कुछ नहीं होगा।
राजनेता बहुत खाए-खेले लोग होते हैं। आप जब हँस रहे होंगे, पार्टी कर रहे होंगे कि, "देखो, हम जीत गए," वहाँ पर पाँच पॉलिटिशियंस बैठे होंगे, वे स्क्रीन पर आपको पार्टी करते देख रहे होंगे और वे आपस में मुस्कुराएँगे और कहेंगे कि, "ये सोचते हैं कि ये जीत गए।"
युवा हैं, युवाओं में अभी थोड़ी मासूमियत बाक़ी होती है, तो थोड़ा भोलापन होता है। वो इन मँजे हुए राजनेताओं के खेल समझते भी नहीं हैं। चाहे वो राजनेता अपोज़िशन का हो जो इनके समर्थन में आ गया है, और चाहे वो राजनेता रूलिंग पार्टी का हो जिसके ख़िलाफ़ ये नारे लगा रहे हैं। दोनों ही ओर अपने-अपने पॉलिटिकल स्वार्थ साधे जा रहे हैं, और मुझे डर यह है कि इस चक्की में जो हमारा युवा है, वो बेचारा पिस जाएगा। उसको पता भी नहीं चलेगा कि दोनों ही ओर के पॉलिटिशियंस उसका फ़ायदा उठा ले गए, कुछ बदला नहीं। हम बस म्यूज़िकल चेयर्स खेल रहे हैं पॉलिटिकल कुर्सियों पर।
प्रश्नकर्ता: सोशल मीडिया पर जेन ज़ी के थ्रू बहुत सारी चीज़ें पता चली थीं प्रोटेस्ट के बारे में। और ऐसे कॉल टू एक्शन भी थे कि, "आप भी आइए और जुड़िए हमारे साथ।" क्योंकि मैं भी जेन ज़ी हूँ, तो मुझे भी कुछ-न-कुछ करना था अपनी जनरेशन के हैं जिनके साथ इतनी नाइंसाफ़ी हो रही थी। और यह कन्फ्यूज़न भी था कि उधर वायलेंस भी है। और आपको सुनकर उतना समझा भी कि वो जो भी है, इवन थो जस्टिफ़ाइड है, बट शैलोनेस से आ रहा है। पूरी समझ से नहीं आ रहा कि क्या एक्चुअल प्रॉब्लम है। तो फिर अगर मेरे जैसे कोई जेन ज़ी होंगे, जिनको यही कन्फ्यूज़न है कि जाएँ और न जाएँ, तो फिर कैसे हेल्प कर सकते हैं यही प्रॉब्लम को सॉल्व करने में?
आचार्य प्रशांत: देखो, जाओ, बेशक जाओ। पर जैसे हो ऐसे रहते हुए मत जाओ।
गीता इसमें सबसे सुंदर उदाहरण है। देखो, श्रीकृष्ण क्या कर रहे हैं। अर्जुन के पास दो त्वरित विकल्प हैं, इमीडिएट ऑप्शंस। पहला, युद्ध छोड़कर चला जाऊँ। यह हुआ न जाना? कि कहीं कुछ हो रहा है मैं उस संघर्ष से पीछे हट गया। श्रीकृष्ण ने कहा, "नहीं, तुम्हें लड़ना पड़ेगा।" लेकिन श्रीकृष्ण ने ये नहीं कहा, "जैसे हो, वैसे ही लड़ जाओ।" श्रीकृष्ण ने कहा, "पहले गीता सुनो पूरी, फिर लड़ना।" ये कह रहा हूँ। और गीता सुने बिना अगर लड़ोगे तो गड़बड़ हो जाएगी, बहुत गड़बड़ हो जाएगी।
अब आपका तर्क यह उठेगा कि, "तो क्या हम ज्ञानी और विद्वान होने का इंतज़ार करते रहें, लड़ें नहीं? और क्या कभी भी ऐसा हो सकता है कि सबको पूरा ज्ञान हो जाए, उसके बाद ही क्या हम निकलेंगे प्रोटेस्ट करने?"
नहीं, तुम मेरी बात नहीं समझ रहे हो। पहली बात, श्रीकृष्ण ने सबको नहीं कहा कि, "आओ, आओ, आओ, आओ, गीता सुनो और गीता एग्ज़ाम पास करो, तभी लड़ोगे। यही क्राइटेरिया है, एंट्रेंस क्राइटेरिया है।" नहीं। उन्होंने कहा कि जो सर्वश्रेष्ठ है और जो नेतृत्व करने वाला है, मैं उससे बात करूँगा। और उसके ऊपर एक क्वालिफ़ाइंग क्राइटेरिया लगाया। बोले, "ऐसे नहीं तू एक भी तीर चला सकता, पहले गीता सुन।"
श्रीकृष्ण ने यह बात सारे कौरवों और सारे पांडवों को लेकर नहीं कही, पूरी सेनाओं को। इतनी अक्षौहिणी सेनाएँ वहाँ पर खड़ी हुई थीं, सबको लेकर नहीं कही। सारे पांडवों को लेकर भी नहीं कही। यह भी नहीं कहा कि, "अरे, कम-से-कम युधिष्ठिर, आप धर्मराज हैं, आप भी आइए बैठिए, गीता चल रही है।" लेकिन जो सबसे अग्रणी था लड़ने में, जो सबसे ज़्यादा कह रहा था कि, "मैं तो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हूँ। युद्ध किस तरफ़ को जाएगा ये मुझ पर निर्भर करता है।" श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम... तुम... तुम नहीं लड़ सकते जब तक कि तुम गीता से गुज़रे नहीं हो। और मैं तुम्हें भागने भी नहीं दूँगा, लड़ना तो तुम्हें पड़ेगा। युध्यस्व। लड़ो। पर जैसे तुम हो, ऐसे नहीं लड़ सकते, ऐसे नहीं।”
जिस भीड़ की आँख नहीं खुली है, उसको आपने आँख खोले बिना ही सड़कों पर भेज दिया तो सड़कों पर फिर क्रांतियाँ नहीं होतीं, हादसे होते हैं, दुर्घटनाएँ होती हैं। जिन्हें ख़ासकर सड़क पर उतरना है उनके लिए और ज़रूरी हो जाता है कि उनकी आँखें खुली हुई हों। मैं तुमसे कह रहा हूँ, आँखें खोलो पहले, फिर उतरो सड़क पर। बिल्कुल उतरो। फिर मैं भी उतरूँगा तुम्हारे साथ।पर आँखें बंद करके नहीं, ऐसे नहीं चलेगा।
सवाल का एक हिस्सा अभी भी शेष रह जाता है। तो आँख खोलने में तो पता नहीं कितना वक़्त लग जाएगा। कितना वक़्त लगा था अर्जुन से बात कर रहे हैं श्रीकृष्ण, कितना वक़्त लग गया था? बारह साल? दोनों तरफ़ सेनाएँ सजी हुई थीं, इतना तो वक़्त है ही नहीं। बहुत वक़्त नहीं लगता, भाई। अर्जुन को लेकर नहीं गए थे कि चलो पहले मेरे साथ बारह साल की रिट्रीट पर और जब पूर्ण ज्ञानी बन जाओगे, सिर्फ़ तभी तुम आकर के युद्ध करना। हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि गीता के 700 श्लोकों के बाद भी अर्जुन पूर्ण ज्ञानी नहीं बन गए थे। हम जानते हैं, गीता के बाद फिर महाभारत के युद्ध के बाद अर्जुन को पुनः गीता के उपदेशों की ज़रूरत पड़ी थी। और तब अर्जुन की बात शुरू ही यहाँ से होती है कि, "पहले आपने जो गीता का उपदेश दिया था, वो मैं भूल गया हूँ, तो पुनः बताएँ।"
तो पूर्ण ज्ञान का इंतज़ार करने को आपको नहीं कह रहा हूँ, बाबा, कि जब पूरे तरीके से तुम लिबरेटेड हो जाओ या रियलाइज़्ड हो जाओ, सिर्फ़ तब लड़ने जाना है। मैं कह रहा हूँ, कम-से-कम अर्जुन जैसे तो हो जाओ। एक न्यूनतम स्तर की स्पष्टता तो आ जाए जीवन में, तब लड़ो। और तब तुम ऐसे लड़ोगे कि तुम्हें कोई रोक नहीं पाएगा, जैसे अर्जुन को कोई रोक नहीं पाया। और अर्जुन को रोक कोई इसीलिए नहीं पाया, क्योंकि अर्जुन अपने न तो सौ कौरव भाइयों के साथ थे और न चार पांडव भाइयों के साथ थे, अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ थे।
तुम चाहते हो कि तुम्हारा युद्ध ऐसा हो कि तुम रोके ही न जा सको, तो तुम्हें श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण से मेरा आशय, आप जानते ही हैं किसी व्यक्ति से नहीं है, एक दिशा से है। स्पष्टता की ही दिशा को, आंतरिक स्पष्टता की दिशा को कृष्णत्व कहते हैं। बारह साल इंतज़ार करने को नहीं कह रहा हूँ। 18 दिन का युद्ध था, गीता के भी 18 अध्याय। अरे, थोड़ा समय तो दो न अपने आप को, दिन का एक घंटा दे सकते हो कि नहीं दे सकते हो? और यह दोनों प्रक्रियाएँ साथ चल सकती हैं, आइदर-ऑर नहीं है। अफ़सोस मुझे यह होता है कि सिर्फ़ एक प्रक्रिया चल रही है, बाहर वाली। चलो, बाहर की ओर चलते हैं और नारा लगाते हैं। और भीतर की ओर कौन चलेगा? भीतर की ओर कौन चलेगा?
इतना समय तुम व्यर्थ के सोशल मीडिया पर लगाते हो। एक घंटा विज़डम लिटरेचर पर भी प्रतिदिन लगा लिया करो, तुम ज़्यादा अच्छे क्रांतिकारी बनोगे, तुम्हारी क्रांति में ज़्यादा जान होगी। और फिर कोई पॉलिटिशियन तुम्हें ठग नहीं पाएगा। भूलिएगा नहीं, अर्जुन को न तो यह कहा कि तुम युद्ध नहीं लड़ोगे और न ही यह अनुमति दी कि अपने अँधेरे और अज्ञान के साथ ही तुम बस लड़ जाओ। उन्होंने कहा, लड़ेंगे तो ज़रूर पर पहले पूरी बात को समझेंगे, फिर लड़ेंगे। ज्ञान के बिना लड़ाई लड़ना आत्मघातक हो जाएगा। यह क्या ज़्यादा बड़ी माँग है?
बस यही आपको सलाह दे रहा हूँ। जाओ, जाओ पर अँधे ग़ुस्से के साथ नहीं। पहले समझो कि समस्या शुरू कहाँ से हो रही है। पहले समझो कि जिनके पीछे-पीछे चल रहे हो, उनके मंसूबे, इरादे क्या हैं। और पहले समझो कि तुम कौन हो और तुम्हें अपनी ज़िंदगी में सचमुच चाहिए क्या है? इस समझ के साथ फिर जब क्रांति सड़क पर भी उतरती है तो फिर वह सभी दिशाओं को जीत लेती है। कोई एक सड़क ही नहीं। समझ रहे हो बात को?
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आप कहते हैं कि डेमोक्रेसी में इलेक्शंस होना एक बहुत बड़ा रेवोल्यूशन है। तो ये रेवोल्यूशन में लोग तो रहेंगे, बट स्टूडेंट्स जो 17 और 18 इयर्स के हैं, अभी जो प्रोटेस्ट कर रहे हैं अपने राइट्स के लिए, वो तो राइट टू वोट में आते नहीं हैं। और चार-पाँच साल के बाद हर साल मतलब बदलती रहती हैं सरकारें, तो क्या कर सकते हैं छात्र इसमें?
आचार्य प्रशांत: ज़्यादातर जो लोग कभी प्रोटेस्ट कर रहे हैं, वो वोट देने की उम्र में कम-से-कम उसमें 70–80% ऐसे हैं जो अब 18 साल की जो थ्रेशहोल्ड है उसको पार कर चुके हैं।
मैं कह रहा हूँ, आप बदलाव चाहते हो अगर तो यह लोकतंत्र है। यह कहना कि देखो, फ्रेंच रिवॉल्यूशन में और रूसी क्रांति में भी तो बदलाव तभी आया था जब हम सारे के सारे सड़कों पर उतरे थे, क्योंकि इस तरह के तर्क आ रहे हैं। और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का भी नाम लिया जा रहा है। कह रहे हैं, देखो, अंग्रेज़ को भी तो भगाने के लिए हमें सड़कों पर उतरना पड़ा था न। उतरना पड़ा था न? और चीन में भी उतरना पड़ा था; रूस में उतरना पड़ा था; यूरोप के लगभग सभी देशों में किसी-न-किसी स्तर की क्रांतियाँ हुई हैं। ब्रिटेन में भी हुई है। फ्रांस तो हम जानते ही हैं। स्पेन में भी हुई है। अमेरिका हम जानते ही हैं, बाकायदा सिविल वॉर ही हुआ था वहाँ तो। बोल रहे हैं ये सब।
अरे बाबा, आप जहाँ का नाम ले रहे हैं वहाँ सब में जो शासक था, वह ज़बरदस्ती बैठा हुआ था। उनकी तुलना आज के भारत से करना बिल्कुल-बिल्कुल अनुचित है। फ्रांस में जिस राजा के ख़िलाफ़ क्रांति हो रही है उसको लोगों ने थोड़ी चुना था। चीन में जिसके ख़िलाफ़ क्रांति हो रही है, फिर रूस में जिसके ख़िलाफ़ क्रांति हो रही है, वो ज़ार, वह कोई डेमोक्रेटिक प्रोसेस से थोड़ी आया था। अब यहाँ हम कह रहे हैं कि मुझे उसके ख़िलाफ़ क्रांति करनी है जिसको मैंने ही वोट दिया है। तो तुम बताओ, किसके ख़िलाफ़ करना चाहते हो? किसके ख़िलाफ़ करना चाहते हो? अभी जिन मंत्री महोदय ने इस्तीफ़ा दिया है, मैंने पढ़ा कि 30–40 साल पहले वह ख़ुद एक स्टूडेंट प्रोटेस्ट का हिस्सा थे, पेपर लीक के ही ख़िलाफ़। और वहीं से उनकी राजनीति सुदृढ़ हुई थी।
एक के बाद एक क्रांतियाँ होती रहती हैं। 75 की क्रांति हुई, इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ इमरजेंसी। जनता ने ही क्रांति करी और क्रांति के ही पाँच साल के अंदर-अंदर जनता ने ही जितने क्रांतिकारी थे उनको सबको भगा दिया। इलेक्शन हुआ, उसमें इंदिरा गांधी बिल्कुल बहुमत लेकर के वापस आ गईं। तुम क्रांति कर किसके ख़िलाफ़ रहे हो, पहले तय कर लो तुम्हें क्या चाहिए। अभी जब यह इंडिया अगेंस्ट करप्शन वाला चला था बारह साल पहले, तो तुम जिनको लेकर के आए आज तुम उनको बिल्कुल पसंद नहीं करते। तुम ही ने उनको भगा दिया। तुम किसके ख़िलाफ़ क्रांति कर रहे हो? तुम अपने ही वोट के ख़िलाफ़ क्रांति कर रहे हो।
ये डेमोक्रेसी है भाई, यहाँ पर कोई वाइसरॉय नहीं है। यहाँ पर कोई बाहर से भेजा हुआ लॉर्ड नहीं तुम्हारे ऊपर राज कर रहा है। तुम जिसके ख़िलाफ़ क्रांति कर रहे हो उसको तुमने ही चुना है अपना वोट देकर के। तो तुम जवाब दो पहले कि ऐसों को तुम लगातार चुन क्यों रहे हो? यह जवाब माँगना कुछ ग़लत हो गया क्या? तो यह जवाब कोई दे ही नहीं रहा। तुम्हें बस क्रांति करनी है, जल्दी-जल्दी करनी है।
इधर वोट दोगे किसी को और फिर उधर जाकर उसी के ख़िलाफ़ क्रांति करोगे। फिर वापस आओगे, फिर किसी को वोट दोगे, फिर उधर जाकर उसके ख़िलाफ़ क्रांति करोगे। तुम एक आदमी बताओ जिसको तुम नापसंद करते हो और उसको तुमने चुना नहीं है ख़ुद ही। तो सबसे ज़्यादा नापसंद तो तुम्हें ख़ुद को ही करना चाहिए फिर, कि तुम बार-बार ऐसों को चुनते हो जिनको तुम ही नापसंद करते हो। हमें वोटर को ही बदलना पड़ेगा। और अगर वोटर को बदल दिया तो हर तीन महीने में किसी-न-किसी बड़े राज्य में चुनाव होते हैं। क्रांति अपने आप हो गई न? हो गई न? वोटर को बदल दिया, वोटर ख़ुद ही सरकार गिरा देगा। पाँच साल क्या इंतज़ार करना है।
पाँच साल क्या इंतज़ार करना है आ तो रहे हैं एक के बाद एक। भारत इतना बड़ा देश है, हर तीसरे-छठे महीने कहीं-न-कहीं चुनाव होते रहते हैं। वोटर ख़ुद ही एक-एक करके सरकार को गिराता चलेगा। लो, हो गई क्रांति। जनतंत्र में क्रांति इनबिल्ट होती है, कैलेंडर पर शेड्यूल्ड होती है कि, लो, ये इलेक्शन आ रहा है। क्रांति करके सरकार गिरा दो। पर आप वोटर को बदले पर न, अगर सरकार को गिराना चाहते हो तो आप बताओ यह क्या हो रहा है फिर?
वो बिल्कुल सरकार बदलनी चाहिए; इतनी सारी सरकारें हम जानते हैं निकम्मी रही हैं, भ्रष्ट रही हैं, अपवाद तो मिलते ही नहीं। अगर आप वोटर को बदले बिना सरकार को गिरा रहे हो, तो आप यह कह रहे हो कि, साहब, लोग तो बेवकूफ़ हैं, बेवकूफ़ ही रहेंगे। हम मुट्ठी भर लोग हैं, मान लो, हम सब क्रांतिकारी यहाँ बैठे हैं, पाँच सौ जने क्रांतिकारी। हम ज़्यादा होशियार हैं, और बहुमत ने जिस सरकार को चुन करके गद्दी पर बैठाया है, वो बहुमत बेवकूफ़ है। तो हम सब क्रांति करके जो बहुमत की इच्छा है, उसको पलट देंगे।
ये तो सिनिसिज़्म हो गया न। ये तो आप कह रहे हो कि, जो बहुमत है, जो मासेस हैं, उनको सुधारा ही नहीं जा सकता इसीलिए एक छोटी-सी जो अवेकेंड पॉपुलेशन है, वो जाएगी क्रांति करेगी सरकार को बदल देगी, मिनिस्टर को बदल देगी। ये तो जो आप बात बोल रहे हो, वो तो अलोकतांत्रिक भी हो गई कि नहीं हो गई? बोलो? भाई, उस मिनिस्टर को वहाँ पर लोगों ने ही बैठाया है। लोगों ने ही बैठाया है न? तो उन लोगों को हम बदल देते हैं न ताकि इस तरह के मिनिस्टर्स आगे कभी आएँ ही न। वो ज़्यादा सही तरीका होगा न?
और एक और ख़तरा बता रहा हूँ। वो जो एक बड़ा विशाल बहुमत है, जो सरकारों को चुन-चुन कर लाता है गद्दी पर, अगर वो भी सड़कों पर उतर आया, तो अब बताओ तुम्हें रिवॉल्यूशन मिलेगा या एनार्की मिलेगी? एक वर्ग तो सड़कों पर उतरा हुआ है, अच्छी बात है। पर एक वर्ग वह भी है न जो सत्ता पक्ष का समर्थन करता है, है न देश में? अगर वो भी कहे कि यही तरीका है मामले सुलटाने का, हम भी उतरते हैं सड़कों पर। वो भी उतर आए, तो फिर तो गृह-युद्ध होगा, सिविल वॉर होगा बस, सिविल वॉर होगा। वो कहेंगे, तुम उतर सकते हो सड़कों पर अपनी माँग के लिए, तो हम भी उतरेंगे अपनी माँग के लिए, आओ फिर सड़कों पर ही फ़ैसला कर लेते हैं। फिर तो बस सिविल वॉर होगा, एनार्की।
इन सबसे कहीं अच्छा है न कि मैं वोटर को ही बदल दूँ। आपकी संस्था वही काम कर रही है। जो क्रांति युवा बाहर-बाहर करना चाहता है, वो बिना जड़ की क्रांति है।
हम क्रांति का गहरी जड़ों वाला वटवृक्ष ही बड़ा कर रहे हैं, इससे बड़ी क्रांति दूसरी नहीं है जो हम यहाँ रोज़ कर रहे हैं।
आप मुझसे पूछ रहे थे, "आचार्य जी, क्या आप इन प्रोटेस्ट्स के समर्थन में हैं?" मैंने कहा, "मैं समर्थन क्या करूँगा? मैं तो प्राइमरी प्रोटेस्टर हूँ। जब ये प्रोटेस्टर्स पैदा भी नहीं हुए थे, मैं तो तब से बहुत गहरी-से-गहरी प्रोटेस्ट कर रहा हूँ। पर तुम्हें पता भी नहीं है, तुम्हें पता भी नहीं है कि वास्तविक प्रोटेस्ट कहते किसको हैं। तुम्हारी प्रोटेस्ट कल-परसों ख़त्म हो जाएगी, मेरी तब तक चलेगी जब तक मेरी साँस है।" ये अंतर है। तुम मिनिस्टर को बदलने से संतुष्ट हो जाते हो, मैं तब तक संतुष्ट नहीं होऊँगा जब तक पूरा हिंदुस्तान नहीं बदल जाता। और बदल जाएगा हिंदुस्तान, तो फिर किसी मिनिस्टर को बदलने की ज़रूरत रह जाएगी क्या?
हम क्यों ये साधारण-सा सवाल पूछने से बचते हैं कि ऐसे मिनिस्टर्स को सत्ता में लाता कौन है? अगर आपको मिनिस्टर से इतनी समस्या है, तो पूछिए कि फिर उसे सत्ता में लाया कौन था? और आपको तो सबसे ही समस्या है, क्योंकि पेपर लीक भी इतने राज्यों में हो रहा है और एक नहीं सौ तरह के भ्रष्टाचार हर राज्य में हो रहे हैं। हर सरकार में हो रहे हैं, हर साल हो रहे हैं। तो ले-दे के आप अगर जेन ज़ी से पूछोगे, तो वो यही कहेंगे कि सारे ही पॉलिटिशियंस भ्रष्ट हैं। तो मज़ेदार सवाल हो गया। अगर सारे ही पॉलिटिशियंस भ्रष्ट हैं, तो इनको वोट किसने दिया था? वोट किसने दिया था? और उस वोटर को नहीं बदल रहे हो, तो जो अगला आएगा, वह भी तो भ्रष्ट ही होगा।
पर नहीं, सड़क पर उतरना... मैं क़दर करता हूँ जो सड़क पर उतरे, लाठियाँ खाईं उनकी। लेकिन देखो, वो दो-चार दिन का काम है। युद्ध में आप उतर रहे हो, तो आपको एड्रेनलिन चाहिए। आप कहीं कुछ जीत रहे हो, तो उससे आपको डोपामिन मिल रहा है। अच्छा है, मोटिवेशन बढ़ता है। वह अच्छी बात है। लेकिन अगर आप देश को ही बदलना चाहो, तो फिर उसके लिए डोपामिन नहीं डिवोशन चाहिए होता है, और लॉन्ग-टर्म डिवोशन चाहिए होता है। वो काम हम कर रहे हैं।
और जो लोग आकर के कह रहे हैं न कि संस्था के लोग क्यों नहीं गए प्रोटेस्ट्स में, हम असली प्रोटेस्टर्स हैं। हमारी प्रोटेस्ट लॉन्ग-लास्टिंग है और साइलेंट है। और यह क्रांति किसी एक मंत्री को नहीं बदलती, यह क्रांति यहाँ से शुरू होती है इंसान को बदलती है, परिवार को बदलती है, समाज को बदलती है, सत्ता को बदलती है; पूरे संसार को बदल देती है। हम वो क्रांति कर रहे हैं।
मैं आग्रह करता हूँ, सिनिकल न बनें। यह ना कहें कि लोग तो बेवकूफ़ ही हैं, इनको नहीं बदला जा सकता। कोई बेवकूफ़ नहीं है, इंटेलेक्ट ऊपर-नीचे होती रहती है। दिल की तड़प सभी के पास है। इंटेलेक्ट, हाई आईक्यू, हो सकता है किसी-किसी के ही पास हो; पर यहाँ (अपने भीतर) दर्द, जो है न वह सभी के पास है, सब बदलना चाहते हैं।
जैसी हालत है भीतर की और बाहर की, पसंद किसी को नहीं है, सब बदलना चाहते हैं। यह मत कहो कि हम पढ़े-लिखे हैं। हम युवा हैं, तो सिर्फ़ हमारे ऊपर क्रांति का दारोमदार है। हर एक इंसान चाहता है कि यह मंजर बदले। उनको डिस्काउंट मत करो, यह मत कहो कि लोग तो बेवकूफ़ हैं, वह तो जाकर के अंधविश्वास के आधार पर या जाति या धर्म के आधार पर या पैसों के आधार पर, या फ़्रीबीज़ के आधार पर ही वोट दे देंगे। ऐसा ज़रूरी नहीं है।
हर इंसान एक आधारभूत गरिमा रखता है; हर इंसान फंडामेंटली अपनी डिग्निटी चाहता है। तुम जाओ, तुम उनसे बात करो, वह तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। असली क्रांति अब शुरू होती है। दिल्ली की सड़कों को छोड़ो। आओ, एक-एक शहर, गाँव, देहात की सड़क पर उतरो और लोगों से बात करो उनको जगाओ। और जगाने से मेरा आशय यह नहीं कि वो बाहर निकले और नारेबाज़ी करें और कहें कि मंत्री गया अब सरपंच भी जाएगा। जगाने से मेरा आशय वो जो यहाँ हो रहा है, यह करो; इसको एक-एक गाँव, एक-एक घर तक पहुँचाओ।
आ रही है बात समझ में?
तुम्हें जो करना था दिल्ली में तुमने कर लिया, अब आग्रह कर रहा हूँ, आओ मेरा साथ दो, यहाँ बैठो सामने। मुझे बहुत ज़रूरत है युवाओं की, मैं तुम्हें स्पेक्टेकल नहीं दे पाऊँगा। ये जो हो रहा है, ये बड़ा एक साधारण-सा दृश्य लगता है, इसमें बहुत अच्छी इंस्टा रील्स नहीं बनतीं। कैसे दिखाऊँ कि कैसे अपने घर की चारदीवारी में किसी की ज़िंदगी बदल गई है। कैसे दिखाऊँ कि जो किचन में है, वह महिला बदल चुकी है। कैसे दिखाऊँ कि एक छोटी-सी दुकान में जो बैठा हुआ है, उसकी ज़िंदगी बदल चुकी है। पर वहाँ जो बदलाव हो रहा है, वो असली है, उसमें साथ दो मेरा। हम जो काम कर रहे हैं, वो कैमरा-फ्रेंडली नहीं है, पर बुनियादी है।
बात आ रही है समझ में?
नहीं होना चाहिए कि किसी के भी शरीर पर लाठियों के ज़ख़्म पड़ें, बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लेकिन लाठियों के ज़ख़्म के साथ यह गनीमत रहती है कि तुम उसकी फ़ोटो खींच सकते हो, और डाल सकते होबऔर लोग देखेंगे, और नीचे कमेंट करेंगे, और वो फ़ोटो और ये वीडियो वायरल भी हो जाएगा। पर मैं चाहता हूँ कि तुम यह भी देखो कि हिंदुस्तान का एक-एक आदमी, एक-एक औरत, सिर्फ़ शरीर पर नहीं यहाँ दिल पर ज़ख़्म खाए हुए बैठा है, और उसकी फ़ोटो नहीं खींची जा सकती। हमें उन ज़ख़्मों का इलाज करना है।
यह काम चुप्पी का है, साइलेंट है; यह काम संयम माँगता है, पर ऐसा भी नहीं है कि यह काम अनंत है कभी ख़त्म नहीं होगा और असंभव है। नहीं, ऐसा नहीं है। यह काम हो सकता है, हम कर रहे हैं, ज़िंदगियाँ बदल रही हैं। और ज़िंदगियाँ अगर बदल रही हैं तो भारत भी बदल रहा है, चुपचाप बदल रहा है, किसी को पता भी नहीं चल रहा। हम भारत को चुपचाप बदल रहे हैं, रोज़। हर सत्र में भारत थोड़ा और बदल जाता है। बस, आप यहाँ बैठे हो, इसका श्रेय आपको नहीं मिलने वाला। क्योंकि आप किसी फ़ोटो में, वीडियो में या किसी ग्राफ़ में यह प्रमाणित नहीं कर पाओगे कि कुछ बदल गया।
बाहर जब परिवर्तन आता है तो उसका प्रमाण उपलब्ध होता है। आपकी ज़िंदगी जैसे बदल रही है, आप इसका प्रमाण नहीं दे सकते। तो जिनको सिनिकल रहना है, जिन्हें संशय करते ही रहना है वह अपना संशय रखे रह जाएँगे।
आग्रह कर रहा हूँ उनसे, इतना संशय है तुम्हें अगर हमारे काम की इफेक्टिवनेस के बारे में, तो आओ न बैठो साथ में। जाँचो-परखो। यही तो एक जवान आदमी का तरीका होना चाहिए न, अंधविश्वासी तुम्हें थोड़ी ही बनना है, आओ, परखो कि सचमुच जो हम काम कर रहे हैं वो इफेक्टिव है कि नहीं है। और न लगे इफेक्टिव तो छोड़ देना।
15,000 आत्महत्याएँ, 365 दिन में। प्रतिदिन कितनी बैठीं लगभग? कितनी बैठीं? रोज़ की कितनी बैठीं? 50 से कम, 40 मान लो। 40। हर घंटे कितनी बैठीं? डेढ़ मान लो। हमें बात करते इस मुद्दे पर हो गया होगा न? घंटा हो गया होगा अभी तक बात करते। इतनी देर में हमारे एक युवा ने आत्महत्या कर ली है, एक लाश गिर गई है इसी दरमियान। बोलो, उस लाश के लिए कल की सुबह कैसे बदली? बोलो। मिल तो गया इस्तीफ़ा। और ठीक अभी पिछले एक घंटे में एक युवा ने आत्महत्या की है, जेन ज़ी ने ही की है।
स्ट्रक्चरल रीज़न्स हैं, इस बिल्डिंग का नक्शा ही ख़राब है, इसकी बुनियाद ही गड़बड़ है। और तुम एक छोटे-से कमरे का पेंट बदल रहे हो बस। मैं तुम्हारे जज़्बात की क़दर करता हूँ, लेकिन तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम जो काम कर रहे हो, वो फंडामेंटल नहीं है, दूर तक नहीं जाएगा। और तुम भी पाओगे कि तुम्हें निराश होना पड़ रहा है। तुम भी कहोगे, "यार, हमने इतनी क्रांति की, निकला क्या? स्थितियाँ तो वैसी की वैसी रह गईं।"
और याद रखना ये जो हमारे अभी जवान लड़के या लड़की की लाश गिरी है पिछले एक घंटे में, उसका पेपर लीक से कोई ताल्लुक नहीं है। पर उसके ऊपर दबाव डालने वाली ताक़तें वही थीं जिन ताक़तों ने हम सबको प्रोफेशनली और पर्सनली व्यर्थ के रास्तों पर धकेला है। आपका कुछ ऐसा थोड़ी है कि सिर्फ़ प्रोफेशनल डिसीज़न ही इन्फ्लुएंस्ड होता है। आपके पर्सनल डिसीज़न्स भी तो बहुत अंधी जगहों से आते हैं। आपको नहीं पता होता कि क्यों आप कोई व्यक्तिगत फ़ैसला ले रहे हो। और वह सारे के सारे अंधे फ़ैसले जिस अंधी जगह से आ रहे हैं वह अंधकार एक है, हम उस अंधकार को चुनौती दे रहे हैं भाई।
एक अंधी गुफा है उसमें से हर तरह के विषैले साँप, बिच्छू और न जाने कितने तरह के जंतु निकल रहे हैं। तुमने उसमें से निकलने वाले किसी एक साँप, बिच्छू, कीड़े-केकड़े, गिरगिट को पकड़ लिया है और ख़ुश हो रहे हो। हम कह रहे हैं, हमें यह अंधेरा ही मिटाना है, तमसो मा ज्योतिर्गमय। न रहेगी यह गुफा और न इसमें से निकलेंगे इतने विषैले जंतु। आओ, उस गुफा में सशरीर प्रवेश करते हैं, डरो मत। बात समझ रहे हो?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपना थोड़ा एक्सपीरियंस बताना चाहूँगी। मैं कोटा से ही हूँ, और आपने जो एक्सपेक्टेशंस की बात की, मतलब फ़ैमिली एक्सपेक्टेशंस वग़ैरह की बात की आपने जैसे।
तो मुझे ज़बरदस्ती 12th के बाद, एक साल ड्रॉप करवाकर प्रीमेडिकल की, उस टाइम पर पीएमटी होता था, प्रीमेडिकल की एंट्रेंस के लिए बिठाया गया था। और मैंने मना कर दिया था साफ़ उस टाइम पर कि मतलब, यहाँ कोचिंग इंस्टिट्यूट्स में माहौल अच्छा नहीं है, टॉक्सिक है बच्चों के लिए। क्योंकि मैंने देखा था, वहाँ पर बच्चे रोज़ गिर रहे थे। स्ट्रेस के मारे वहाँ पर ड्रिप्स चल रही थीं बच्चों को। क्लास में से उनको उठाकर ले जाया जाता था। हॉस्पिटल्स वहाँ पर, जैसे-जैसे कोचिंग इंस्टिट्यूट बढ़े वहाँ पर हॉस्पिटल्स बहुत सारे खुल गए हैं। और मतलब अब तो ख़ैर, आई थिंक, 6 से 10,000 करोड़ का सालाना वहाँ पर *बिज़नेस₹ होता है। और रियल एस्टेट भी उसके साथ-साथ ही वहाँ पर *एस्टैब्लिश₹ हो गया है बहुत ज़्यादा।
बट उस टाइम पर भी, मतलब, जो मेंटल स्ट्रेस मैंने झेला और मैंने आसपास देखा, उस हिसाब से मैं डिस्करेज करती थी सबको कि आप मत करिए क्योंकि ये माहौल अच्छा नहीं है। तो मुझे अपने पेरेंट्स से या रिलेटिव्स से हमेशा ये सुनने के लिए मिलता था कि अंगूर खट्टे हैं।
आचार्य प्रशांत: इंसान भीतर से ही थोड़ा कम वायलेंट हो जाए, हमें वो चाहिए, दैट रिवोल्यूशन। और उसका रिश्ता इससे है कि माँ-बाप का बेटी का संबंध कैसा होगा। और इससे भी है कि इंसान और पृथ्वी का संबंध कैसा होगा। इतनी ये दो अलग-अलग बातें लगती हैं पर आ एक ही रूट से रही हैं। और उस रूट को आप संबोधित नहीं कर रहे हैं। तो आप बस यह कह रहे हैं कि मैं जिस डाल पर बैठा हूँ, वो डाल हरी रहे चाहे जड़ें सूख जाएँ।
आप जो चाह रहे हैं, वो कभी नहीं हो पाएगा। ऐसा हो सकता है कि आप कहें कि एक डाल है उस पर मेरा घोंसला है, उस पर मेरे अरमान हैं, वह डाल तो हरी रहनी चाहिए। और जड़ों से मुझे कोई मतलब नहीं, जड़ें चाहे सूख जाएँ। और अगर हमने जड़ों का ख़याल कर लिया तो सारी डालें ख़ुद-ब-ख़ुद हरी हो जाएँगी, हरे आएँगे पत्ते और ख़ूब खिलेंगे फूल। हमें जड़ों पर काम करना है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। अभी मैं फ़िलहाल एक एचआर कंसलटेंसी में काम कर रहा हूँ, टेंपरेरिली। वहाँ पर मैंने देखा है कि ऐसे रिक्रूटमेंट्स के लिए कुछ बड़ी कंपनीज़ हैं। वो लोगों के क्वालिफिकेशंस के ऊपर ध्यान देती हैं, तो जैसे कोई एक सॉफ़्टवेयर डेवलपमेंट का पोज़िशन आया। 14 साल का एक्सपीरियंस है ये, ठीक है? और एक बंदा हमें मिला है, जो सब कुछ ठीक है, उसका एक्सपीरियंस लेवल, जो उसको स्किल चाहिए, सब ठीक है। पर उसने शुरुआत में बीटेक न करके बीकॉम किया है, तो अब उसको हम नहीं लेंगे। और ऐसे लोग, जो हर दो साल में, एक साल में, अपनी कंपनीज़ बदल रहे हैं, उनको उनके काम से लगाव नहीं है। बट वो सैलरी पैकेजेज़ के लिए बदल रहे हैं।
यार, एक बात बताओ, ऐसी ज़िंदगी चाहिए क्या जिसमें जैसे आज तक चलते आया है वैसे ही तुमने शादी कर ली। अभी यह जो इतना ज़बरदस्त एस्ट्रो वग़ैरह का मार्केट है, इनके प्राइमरी ग्राहक जेन ज़ी ही हैं और वह वहाँ पर जाकर के दो ही चीज़ें पूछ रहे हैं। एक, नौकरी कब मिलेगी? एक, शादी कब होगी? जैसे पुराना अँधेरा बहता चला आ रहा है, तुमने उसी तरह से शादी-विवाह कर ली; तुमने उसी तरह नौकरी पकड़ ली; तुमने वैसे ही बच्चा पैदा कर लिया। और तुमने उसी तरीके से, जैसे तुम कंडीशन रहे हो बच्चे को भी कर दिया। और तुम्हें कुल ज़िंदगी की एक पटरी बता दी गई है कि जॉब करो, किस सेक्टर में? जो सेक्टर बता दिया गया है कि अभी सनराइज सेक्टर है, ब्लूमिंग सेक्टर है, उसमें घुस जाओ। वो कोई भी हो सकता है। कल को लेदर टेक्नोलॉजी बढ़ जाए, तुम लेदर टेक्नोलॉजी में घुस जाओ। परसों रियल एस्टेट बढ़ जाए, उसमें घुस जाओ। फिर रिटेल आ जाए, तुम उसमें चले जाओ। फिर कुछ और आ जाए, तुम उसमें चले जाओ।
दिल कहाँ है? और जिस सेक्टर में भी चले गए हो, वहाँ एक के बाद एक दूसरी कंपनी में थोड़े-थोड़े पैसों के लिए, हज़ार- दो हज़ार के लिए, 4% की हाइक के लिए जंप लेते रहो। ये सब में दिल कहाँ है? ज़िंदगी कहाँ है? जवान आदमी हो भाई तुम। बताओ न दिल कहाँ है इसमें? और तुम इसी सिस्टम में रहने के लिए यह कह रहे हो कि मैं एक और एंट्रेंस एग्ज़ाम दूँगा, उसको क्लियर कर लूँगा तो मुझे एक हाई पेइंग जॉब लग जाएगी। यही तो कर रहे हो न?
तो तुम्हारी सारी जो माँगें हैं, वो सिस्टम के अंदर बने रहने के लिए हैं। तुम सिस्टम को तोड़ना नहीं चाह रहे हो। एक तरह से कहें तो तुम कोई क्रांति कर ही नहीं रहे हो। तुम बस ये कह रहे हो कि सिस्टम के भीतर ही भीतर इंसाफ कर दो। और मैं तुमसे पूछ रहा हूँ कि तुम्हें ये सिस्टम चाहिए भी है क्या? क्या यह सिस्टम, यह व्यवस्था पूरी इस लायक है कि इसको रखा जाए? नहीं है, इस लायक नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि यह जो पूरा सिस्टम है, ये इंसान के अँधेरे से उपजा है। हमें मालूम ही नहीं हम कौन हैं। य, ज़िंदगी क्या चीज़ है, इसमें हमें करना क्या है। जब हमें कुछ नहीं मालूम, तो पीछे से जो चला आ रहा है हम उसी को आगे चलाते रहते हैं। हम बस यह कर रहे हैं।
ऐसे समझो कि एक ट्रेन है। एक ट्रेन है और वो खचाखच भरी हुई है, और वह एक ऐसी दिशा में जा रही है जिसको कोई नहीं जानता कि क्या है। कोई उस मंज़िल से परिचित नहीं है। ठीक है? पर वो ट्रेन खचाखच भरी हुई है क्योंकि वह ट्रेन सदा से चलती आई है और जिस दिशा में जा रही है, उधर को ही जाती रही है। खचाखच भरी हुई है। खचाखच भरी हुई है।
अँधी ट्रेन है, अँधे लोग हैं; अँधी दिशा, अँधी मंज़िल। लेकिन एक डिब्बे में क्या होता है कि कुछ लोग जिनके पास टिकट नहीं था या रिज़र्वेशन नहीं था, वो जाकर के कुछ सीटों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। उन्होंने क्या करा? उन्होंने बेईमानी करके कुछ सीटें हड़प लीं। तो वहाँ जो मुसाफ़िर थे उन्होंने बहुत ज़ोर से नारे लगाए, उन्होंने तगड़ा वहाँ विद्रोह किया। बोला, हम विरोध कर रहे हैं, विरोध कर रहे हैं। ये नहीं चलेगा, ये नहीं चलेगा, ये ग़लत लोग आकर सीटों पर बैठ गए हैं। टिकट हमारे पास है। बैठ ये गए हैं। इनके पास टिकट नहीं है, हमारा रिज़र्वेशन था, हम बैठेंगे। यह सब है।
चलो ठीक है, तुमने वहाँ पर इंसाफ पा भी लिया। रेलवे पुलिस आई। जो लोग ग़लत बैठ गए थे उनको हटा दिया, जिनके पास टिकट था उनको बैठा दिया। तो भी इससे क्या ट्रेन बदल गई? वह अभी भी एक अँधी ट्रेन है, जो एक अँधी पटरी पर, एक अँधी दिशा में, एक अँधी मंज़िल की ओर जा रही है, खचाखच भरी हुई। हम उस ट्रेन को, उस पटरी को ही बदल देना चाहते हैं, हम नहीं चाहते कि तुम ज़िंदगी भर एक अँधी यात्रा करो यह हमारा काम है। बात समझ में आ रही है? हाँ, मैं मानता हूँ कि अगर आप ट्रेन में हो, आपने टिकट लिया है तो आपको आपकी सीट मिलनी चाहिए। बिल्कुल मिलनी चाहिए, बट दैट इज़ अ वेरी स्मॉल एस्पेक्ट ऑफ जस्टिस। इट इज़ लेजिटमेट बट स्मॉल।
याद रखो, मैं उसको ग़लत नहीं बोल रहा, मैं उसको सिर्फ़ स्मॉल बोल रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, ज़्यादा बड़ी बात यह है कि तुम पूछो कि मैं इस ट्रेन में आ कहाँ से गया? मुझे नहीं बैठना इस ट्रेन में। और वह ट्रेन, हम फिर कह रहे हैं, खचाखच भरी हुई है। हर आदमी एक ही ट्रेन में चढ़ना चाहता है क्योंकि सबको डर है कि मैं अकेली यात्रा करूँ तो कहीं मेरा कुछ अहित न हो जाए।
हम चाहते हैं कि तुम्हारे भीतर वो ताकत जगे कि तुम अकेली यात्राएँ कर पाओ। तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं है इन ट्रेनों पर चढ़ने की। चाहे वह प्रोफ़ेशनल ट्रेंस हों, चाहे वह पर्सनल ट्रेंस हों, बात आ रही है।
नहीं तो ऐसी ही कहानियाँ सुनने को मिलेंगी। “मैं एचआर अभी कंसल्टेंसी में हूँ, फिर ये हुआ, फिर वो हुआ।” अभी मैं लिंक्डइन पर वीडियो देख रहा था किसी फ़न फ्राइडे का। कंपनियों ने आज के लिए शुरू करा है, पता है कि उनका जो काम है, वो ज़्यादातर तो जान सोख लेता है, ख़ून पी लेता है। तो फ़न फ्राइडे होता है, उसमें वो जितने भी एम्प्लॉइज़ थे, उनको नचाया गया था। वो नाच रहे थे और किसी ने वीडियो बनाया, वो ऐसे नाच रहे हैं। अब नौकरी के लिए, सैलरी के लिए नाचना भी पड़ता है, पर मुँह पर लिखा हुआ है कि दुर्दशा है। ऐसे जीना चाहते हो क्या? ऐसे जीना चाहते हो? पर तुम एंट्रेंस एग्ज़ाम इसीलिए तो क्लियर कर रहे हो कि तुम्हें उस कंपनी में जॉब मिल जाए।
तुम्हारा ये जो सारा *एंट्रेंस का खेल है, यह इसीलिए तो है कि तुम्हें उस कंपनी में जॉब मिल जाए, जहाँ तुम्हारा मुँह ऐसे रहेगा जीवन भर। जंजीर खींचो और उतर के भागो। किधर को भी भागो पर इस ट्रेन से उतरो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका जो सॉल्यूशन था, वो बहुत ही इंस्पायरिंग है और एक्चुअली जब आप डिस्क्राइब कर रहे थे कि जो बच्चों के ऊपर प्रेशर होता है, तो मेरा ऑलमोस्ट रोना आ गया मेरे को, क्योंकि ये काफ़ी दबाव होता है बच्चों के ऊपर। पर अभी मेरा जो मन में प्रश्न उठा, अब थोड़ा मेरे को सिली भी लग रहा है, पर वो ऐसे लग रहा है कि जैसे दो लेवल पे अंधकार है, जिससे हम फ़ाइट करने की आप बात कर रहे हैं। वो बहुत बड़ा है। वो पूरे देश में फैला हुआ है, पूरे समाज में फैला हुआ है, बहुत डीप तक फैला हुआ है।
और एक तो जैसे-जैसे हम गीता कम्युनिटी में हैं या और भी जो संस्थाएँ होंगी जो सिमिलर काम कर रही हैं, उनका आकार मेरी समझ के हिसाब से छोटा है। जैसे आप बहुत बड़े शत्रु से लड़ रहे हैं और आप छोटे हैं। और दूसरा लेवल यह है कि इवन विदिन गीता, हम लोग, जैसे मैं भी अगर अध्यात्म के मार्ग पर चला हूँ, तो ऐसा नहीं कि मैं पूरा सुधर गया हूँ, मेरी भी रोज़ अपने से फ़ाइट होती है। मेरे को भी हर रोज़ जैसे देखना पड़ता है ख़ुद को कि मेरा जॉब सही है।
तो जो सॉल्यूशन है आपका, सही है। वही सॉल्यूशन है। पर मैं इसलिए अपने क्वेश्चन को सिली कह रहा हूँ, क्योंकि आप सीधा-सा आंसर ये हो सकता है कि हाँ, मतलब मुश्किल है, पर करना ही है। पर जस्ट ऑन द लॉजिस्टिक साइड, इट इज़ हमारा जो एनिमी है, जो अंधकार है, जो अहंकार है, बेसिकली उसे पूरी सोसाइटी के लेवल पे हैं। यहाँ पे जो लोग बैठे हैं, एटलीस्ट उनका कुछ इंटरेस्ट बन गया है और डिफ़रेंट तरीके से लोग जुड़े हैं, यूट्यूब से या फ्रेंड ने इनवाइट किए हैं या उनका ख़ुद का झुकाव था। पर इस चीज़ को करोड़ों लोगों तक पहुँचाना, जिससे कि असली देश में बदलाव आएगा, उसका लॉजिस्टिक्स मेरे मानने में कि कैसे हो पाएगा?
आचार्य प्रशांत: आपको करना है, कैसे होगा और कोई नहीं करेगा, आप ही तो करोगे और कौन करेगा। और यही बात आप मान नहीं रहे हो न। मैं तो जो कर सकता हूँ, कर रहा हूँ, शान से खड़ा हूँ। हर रात मुझे यह पता होता है कि इससे ज़्यादा मैं कुछ कर नहीं सकता था। आपको करना है। और आप क्यों कह रहे हो कि लॉजिस्टिक्स बहुत बड़ा एक मुद्दा है? अभी प्रोटेस्ट हुई, तो उसमें हम देख रहे हैं, दुनिया भर से लोग खाना भिजवा रहे हैं, आ रहे हैं। अचानक से सब कुछ वाइल्डफ़ायर की तरह फैल गया। आप चाहो तो सब कुछ हो सकता है, सब कुछ हो सकता है।
अभी महीने भर पहले कुछ नहीं था। अभी महीने भर में इतना फैल गया। वो एक आदमी ने थोड़ी फैलाया था, वो बाक़ी सब ने फैला दिया था ना। लेकिन वही बात कि ट्रेन में मेरी बोगी में मेरी सीट छीन ली गई, इसके लिए लड़ना हमें आसान लगता है। पर मैं हूँ ही क्यों एक अंधी ट्रेन की अंधी भीड़ का हिस्सा? इसके लिए हम लड़ना नहीं चाह रहे। मैं क्या करूँ इसमें? बात इसकी नहीं है कि मैं छोटा हूँ, बात इसकी है कि आप फ़ैसला नहीं कर रहे।
आप मेरी ओर देख रहे हो जैसे मेरी ज़िम्मेदारी हो। हाँ, मेरी ज़िम्मेदारी है पर ठीक उतनी ही है जितनी आपकी है। कुछ छोटा नहीं है, ये इंटरनेट एज है भाई। आग रातोंरात फैल सकती है, सब हो सकता है। द बॉल इज़ इन योर कोर्ट, नॉट माइन।
आप तो चलिए, आप कम्युनिटी हैं, आप छात्र हैं मेरे। मैं तो संस्था से कहा करता हूँ कि तुम मेरे काम के व्हीकल नहीं हो, तुम दुश्मन हो मेरे। मुझे दुनिया तक पहुँचना पड़ता है, संस्था से भी लड़कर। आप ख़ुद डरे हुए हो कि कहीं आपका कोई अहित न हो जाए। इसी तरह संस्था में भी जो अंदर लोग रहते हैं, वो भी अपने आप को बचा-बचा कर चल रहे हैं। बचा-बचा कर चल रहे हैं। क्योंकि फ़ेथ की कमी है। क्योंकि सबने अपने स्टेक्स किसी दूसरी जगह भी रखे हुए हैं, क्योंकि सब बँटे हुए हैं। क्योंकि सब सेफ़ खेलना चाहते हैं और क्योंकि सब में गरिमा की कमी है।
जहाँ दूसरी जगह आप स्टेक्स रखकर आए हो वही जगहें है जहाँ आप पिटते हो, जहाँ आपकी गरिमा का हनन होता है। पर फिर भी आप वहाँ जाकर झुकना चाहते हो, आप तब भी वहाँ पर जाकर के संबंधित रहना चाहते हो। इसीलिए आप यहाँ आते भी हो, तो आधे-अधूरे, आधे-बँटे। आप आ तो जाते हो मेरे सामने पर पूरे थोड़ी होते हो।
संस्था में भी अब इतने लोग हो गए, हज़ार लोग हो रहे हैं, पर जिनके दम पर चल रही है वो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। बाक़ी तो सब ऐसे हैं कि भाई, देखभाल के चलो। जब तक यहाँ ठीक चल रहा है, यू नो, जस्ट कीप एन आई। वॉच आउट, वॉच आउट। किसी दिन कुछ गड़बड़ हो तो जल्दी से भाग लो। सो, द क्वेश्चन जस्ट टर्न्स बैक, यू हैव टू आंसर इट। मैं इसमें क्या कर सकता हूँ?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अगर सवाल में कोई ग़लती हो तो माफ़ कर देना, पर मुझे बोलना ही था। माफ़ी इसमें भी। आपने बोला ट्रेन जैसी भी है, मतलब ट्रेन जैसी भी नहीं है। कुछ भी हो, जैसा भी हो, ट्रेन से उतरो सबसे पहले तो। ट्रेन से उतर गए और बहुत मार पड़ रही थी इसीलिए ही उतरे। लेकिन अब धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा है कि अब बात ट्रेन की नहीं है। ट्रेन की जब बात थी तुमने छोड़ दी, अब बात बेटा भीतर की भी आ गई है। तो ये बिल्कुल वैसा ही है कि मान लीजिए बाहर से कुछ बदलना था, तो किसी को कोई करियर चेंज करना था या कोई बहुत फिजिकल चेंज था, वो तो कर लिया। लेकिन अब जैसे-जैसे ये चीज़ें दिख रही हैं, इट्स गेटिंग मोर टफर। मैं कुछ चाहता था।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें एक ख़बर सुनाता हूँ। तुम अभी भी ट्रेन पर हो, तुमने बस बोगी बदलकर विंडो सीट ले ली है और उस विंडो सीट से बाहर झाँक कर तुम मुझे देख रहे हो। तुम मेरे साथ नहीं हो, तुम उसी ट्रेन पर हो। जो मेरे साथ होते हैं न उनको ट्रेन का ख़याल आना बंद हो जाता है। उन्हें वक़्त ही नहीं मिलता याद करने का कि कौन-सी ट्रेन कहाँ, कब, कहाँ। हाँ, बिल्कुल तुमसे मेरा रिश्ता है, दृश्य और दृष्टा का है। तुम्हें मैं पसंद हूँ तो तुमने किनारे वाली सीट ले ली है और खिड़की से मुझे देखते रहते हो। तुमने ट्रेन छोड़ी ही नहीं है, सीट बदल ली है अपनी।
जिन्होंने ट्रेन छोड़ दी होती है न, उनका एक लक्षण बता देता हूँ, उनके लिए यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि जितने ज़्यादा लोगों को हो सके ट्रेन से उतारें। जिसको यह ज़रूरी नहीं लग रहा है कि और जितने ज़्यादा लोगों को हो सके उतारूँ, वह ख़ुद अभी ट्रेन में ही बैठे हुआ हैं। यह तो छोड़ दो कि उसे यह कसक उठती है कि काश मैं भी ट्रेन में होता, दो-चार पल के लिए इसी ट्रेन में वापस मिल जाए। ऐसी कसक का उठना तो छोड़ दो, उनके भीतर आग लग जाती है कि इस ट्रेन से जितने ज़्यादा लोगों को हो सके, मुझे उतारना है। यह लक्षण होता है उतरने वाले का। और जिसको वो आग नहीं लगी उसने बस अपना बोगी, कंपार्टमेंट, सीट, बर्थ ये सब बदल लिया होगा और कुछ नहीं किया उसने। उस पर दावा यह है कि, “आचार्य जी, हम तो उतर गए आपके साथ हैं।”
मैं प्रोटेस्टर्स से, छात्रों से, जेन ज़ी से कहना चाहता हूँ, ये सब जो तुम्हारे सपोर्ट में खड़े हो गए हैं, इनको ज़रा ठोक-बजा के देख लेना। ये तुम्हारे शुभचिंतक नहीं हैं। ये कौन हैं? कुछ अपोज़िशन पार्टी वाले हैं जिनको अपना उल्लू सीधा करना है। कुछ तो कोचिंग इंस्टिट्यूट वाले ही हैं। वो भी आ गए हैं कि नई-नई रील बना रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं, प्रोटेस्ट के समर्थन में खड़े होकर आ रहे हैं। और ये ठीक वही लोग हैं जिनके स्टेक्स हैं, इकोनॉमिक, फ़ाइनेंशियल स्टेक्स हैं जिनके स्टूडेंट्स को और ज़्यादा प्रेशराइज़ करने में। पर वो बंदा एक वीडियो बना देगा आपके लिए, तो आपको लगेगा, “ये तो मेरे सपोर्ट में खड़ा हुआ है।” आप यह देख ही नहीं पाते कि वो जो आपके सपोर्ट में खड़ा हुआ है, जो कह रहा है कि “मैं आपके सपोर्ट में खड़ा हुआ हूँ”, उसके स्टेक्स हैं, उसका स्वार्थ है। बिल्कुल उसी सिस्टम में, जिस सिस्टम ने आपको ऑप्रेश कर रखा है।
ये कितनी अजीब बात है।
पर कोई आकर के प्यारा-प्यारा, मीठा-मीठा बोल देता है, चाहे पर्सनल लाइफ़ में, चाहे प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में, हमें लग जाता है, “ये आदमी तो अच्छा ही है न। इसने मुझे सपोर्ट किया, देखो।” यूटूबर्स हैं, इंस्टाग्रामर्स और ये सब हैं। ये आकर के सब खड़े हो रहे हैं, “हम सपोर्ट करते हैं। हम सपोर्ट करते हैं।” अरे, उन्हें तुमने हज़ारों घंटे का कंटेंट दे दिया, उनकी चाँदी हो गई है। उनको विंडफ़ॉल गेन हो रहा है व्यूज़ का और उसी से उनकी कमाई चलती है। तुम्हें दिख नहीं रहा कि वो तुम्हारी इस हालत से कितना मुनाफ़ा बना रहे हैं? पर तुम्हें अच्छा लगता है कि ये सब तो हमें सपोर्ट कर रहे हैं ना। और अब मेरी बात आती है, तो कहते हैं, “आपने तो हमें ऐसे कोई खुल के सपोर्ट किया नहीं। इतने सारे थे जो हमें सपोर्ट करने आए।”
चलो छोड़ो मुझे। ये जो तुम्हें सपोर्ट करने आए, ज़रा इनको परख लेना और देख लेना ये कैसे हैं। और इन्हीं को मैं कह रहा हूँ, यही वो लोग हैं जो ट्रेन के भीतर हैं, आप उतरना भी चाहते हो तो ये आपके हाथ रोक लेते हैं। और आपको लगता है कि ये तो मेरे अपने हैं न। मेरे दोस्त हैं, मेरे वेलविशर्स हैं। ये वेलविशर्स नहीं हैं, ये बस मधुर हैं। ये बस प्यारी बातें करना जानते हैं और ये ख़ुद भी विक्टिम्स हैं, ये ख़ुद भी ऑप्रेस्ड हैं। उस ट्रेन में जो कोई है, वो शिकार ही है। और ये ऐसा शिकार है जिसको फिर शिकारी भी बनना है। उस ट्रेन में इक्वेशन ही यही होती है। या तो आप शिकार हैं या आप शिकारी हैं, और आज जो शिकार है वह कल का शिकारी बनेगा। वहाँ और कोई रिश्ता बनता ही नहीं, वहाँ पर कोई भी दो लोग हैं उनके बीच में यही रिश्ता बनता है।
आपके सामने बहुत सारी पुरानी कसमें और वादे और बहुत सारे बंधन खड़े हो जाते हैं कि दिख तो गया है, पर अब मान कैसे लें? दिख तो गया है कि ये जो मेरी वर्क प्लेस है ये बिल्कुल पापियों से ही भरी हुई है, पर अब ऐसे अगर मान लिया, तो फिर झंझट खड़ा हो जाएगा। इसे कैसे मान लें? दिख तो गया है कि मैं यहाँ पर सिर्फ़ अपनी गरिमा बेच रही हूँ पर अगर अब बोल दूँगी तो फिर बाहर निकलकर के कमाना भी तो पड़ेगा। अभी यहाँ घर बैठी हूँ। ठीक है, गरिमा का मेरा सौदा होता है लेकिन उससे समाज में इज़्ज़त मिल जाती है। घर में पैसे मिल जाते हैं, सुख-सुविधा है, बिस्तर है, टीवी है, बढ़िया है। यह है। और फिर ये लोग इतने भी बुरे नहीं हैं और फिर ये लोग इतने भी बुरे नहीं हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ, यह बात उनके व्यक्तिगत अच्छे या बुरे होने की नहीं है। जो भी इंसान अंधेरे का शिकार है वो बुरा ही है। वो और क्या करेगा?
और इसमें उसकी कोई व्यक्तिगत ग़लती भी नहीं है, वो शिकार ही हुआ है। आप उसके साथ भी इंसाफ़ करना चाहते हो, तो ख़ुद भी ट्रेन से उतरो। उसको भी उतारो।
नहीं उतरना है। क्यों? जब हमें ज़रूरत पड़ी थी, तब तो उन्होंने ही हमारा सपोर्ट करा न। जब हमें ज़रूरत पड़ी थी, तब तो उन्होंने ही हमें सपोर्ट करा। ये आचार्य जी थोड़ी हमारा कोई सपोर्ट करने आए थे। ठीक है भाई। तुम देख ही नहीं पा रहे हो कि ये कैसे लोग हैं, जिनको तुम अपना यार समझते हो, हितैषी समझते हो।
ये गाना याद आ रहा है। आप गंभीर हो गए, इतना आपको गाना सुनाना ज़रूरी है। वो मूवी थी, मनोज कुमार ने गाया था। मुझे लग रहा है कि इस वक़्त पर मैं उसको जेन ज़ी के लिए गा दूँ। क्योंकि अभी तो यही है कि ये बातें करते थे पर हमारे समर्थन में तो आए नहीं। और अभी हमें समर्थन करने वाले इतने मिले हुए हैं और हमने जंग भी जीत ली है और सब मिलकर हिप-हिप हुर्रे! कर रहे हैं।
गाना पता है न क्या है?
“कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ फिर तुम्हें छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिय, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए।
दर्पण तुम्हें जब डराने लगे, जवानी भी दामन छुड़ाने लगे, तब तुम मेरे पास आना प्रिय, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए।”
जेन ज़ी को संदेश है क्योंकि उन्हें ही बड़ी आपत्ति है।
“नज़रों में अपनी जब गिरने लगो, अंधेरों में अपने ही जब गिरने लगो, तब तुम मेरे पास आना प्रिय, यह दीपक जला है, जला ही रहेगा तुम्हारे लिए।”
प्रश्नकर्ता: हाँ, आपसे गीता सत्रों से जुड़ने के बाद बहुत सारे रिश्ते हैं, वो सही जगह पर आ रहे हैं। तो यह काम कर रहा है, धीरे-धीरे चल रहा है प्रोसेस।
थैंक यू।
आचार्य प्रशांत: जल्दी करवा लीजिए, पता नहीं किसके पास कितना वक़्त है। तो जल्दी कर लीजिए।