आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मेरा प्रश्न देश में चल रहे पेपर लीक प्रोटेस्ट्स के ऊपर है। तो पिछले कुछ घंटों में एक खबर आई है, जिसमें एजुकेशन मिनिस्टर ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। अब इसको जेन ज़ी के द्वारा एक बहुत बड़ी जीत के तरीके से सेलिब्रेट किया जा रहा है। तो आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है: अब जेन ज़ी के लिए कल की सुबह कैसे होने वाली है? और क्या इस सब के बाद, जितना कुछ हुआ, कुछ वास्तविक बदलाव एक्सपेक्ट किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुमने जवाब ख़ुद ही दे दिया? मैं इसमें क्या बोलूँ? सबसे पहले तो बहुत अच्छी बात है। आपने आंदोलन करा, आपको लग रहा था कि मंत्री के इस्तीफ़े से बात बनेगी। आपको इस्तीफ़ा मिल गया, बधाई हो। लेकिन हाँ, अच्छा सवाल है कि अब कल की सुबह अलग कैसे होने वाली है? कल क्या बदल जाने वाला है?
क्या बदल जाने वाला है? पता नहीं। तुम बताओ, क्या बदलेगा कल? मंत्री बदल गया है। और क्या बदला है? मंत्री तो बदल गया है और शायद अच्छा हुआ मंत्री बदल गया। ठीक है? एजुकेशन सेक्रेटरी को भी बदला गया है, और भी कई अफ़सर हैं, उनको भी हटाया गया है, कुछ लोग गिरफ़्तार भी हुए हैं। उनकी जवाबदेही है, उनको एक ज़िम्मेदारी दी गई है व्यवस्था चलाने की। वो नहीं चला पाए उनको हटना पड़ा, वो ठीक है। पर कल क्या-क्या बदला हुआ होगा? मैं जानना चाहता हूँ।




