भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न उत्कृष्टता के बारे में है। तो आज ही एक न्यूज़ हेडलाइन आया था। भारत अब विश्व में तीसरा देश है, जिसने प्राइवेट रॉकेट लॉन्च करके सैटेलाइट्स ऑर्बिट में अलाइन किए हैं, और ये फर्स्ट अटेम्प्ट में हुआ है। तो ये उत्कृष्टता मुझे लगती है, क्योंकि इंजीनियरिंग में, एवियोनिक्स और कंबशन में, और इवन इन्वेस्टमेंट एंड पॉलिसी के इंफ्रास्ट्रक्चर में, ये बहुत ही एडवांस्ड अचीवमेंट है। मगर भारत में मुझे लगता है कि एक्सीलेंस जो है वो पॉकेट्स में मिलती है, छोटे-छोटे आइलैंड्स या पॉकेट्स। और हर फ़ील्ड में। बट एट द सेम टाइम, सेम फ़ील्ड्स में एक्स्ट्रीम पिछड़ापन भी दिखता है। और शायद मैंने कहीं और नहीं देखा ऐसे, दूसरे देशों में जो भारत से भी लेस जीडीपी पर कैपिटा हो सकते हैं, वहाँ भी उतना सुपरस्टिशन नहीं दिखता। अब क्या है इस देश में, जो इतना अनोखा है?
आचार्य प्रशांत: लोकधर्म। यही है, एक शब्द का उत्तर, लोकधर्म। ऐसा लोकधर्म जो आपकी ज़िंदगी की एक-एक गतिविधि को संचालित करता है। धार्मिक लोग दुनिया के हर देश में होते हैं, पर जैसा लोक धर्म हमारे यहाँ है ऐसा कहीं नहीं है। ऐसा कहीं नहीं है। दूसरी बात, लोकधर्म का जितना जलवा हमारे यहाँ है, इस अर्थ में कि जो लोक धार्मिक है वो अपने आपको जितनी मॉरल अथॉरिटी दे देता है, उतना कहीं नहीं है।




