
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न उत्कृष्टता के बारे में है। तो आज ही एक न्यूज़ हेडलाइन आया था। भारत अब विश्व में तीसरा देश है, जिसने प्राइवेट रॉकेट लॉन्च करके सैटेलाइट्स ऑर्बिट में अलाइन किए हैं, और ये फर्स्ट अटेम्प्ट में हुआ है। तो ये उत्कृष्टता मुझे लगती है, क्योंकि इंजीनियरिंग में, एवियोनिक्स और कंबशन में, और इवन इन्वेस्टमेंट एंड पॉलिसी के इंफ्रास्ट्रक्चर में, ये बहुत ही एडवांस्ड अचीवमेंट है। मगर भारत में मुझे लगता है कि एक्सीलेंस जो है वो पॉकेट्स में मिलती है, छोटे-छोटे आइलैंड्स या पॉकेट्स। और हर फ़ील्ड में। बट एट द सेम टाइम, सेम फ़ील्ड्स में एक्स्ट्रीम पिछड़ापन भी दिखता है। और शायद मैंने कहीं और नहीं देखा ऐसे, दूसरे देशों में जो भारत से भी लेस जीडीपी पर कैपिटा हो सकते हैं, वहाँ भी उतना सुपरस्टिशन नहीं दिखता। अब क्या है इस देश में, जो इतना अनोखा है?
आचार्य प्रशांत: लोकधर्म। यही है, एक शब्द का उत्तर, लोकधर्म। ऐसा लोकधर्म जो आपकी ज़िंदगी की एक-एक गतिविधि को संचालित करता है। धार्मिक लोग दुनिया के हर देश में होते हैं, पर जैसा लोक धर्म हमारे यहाँ है ऐसा कहीं नहीं है। ऐसा कहीं नहीं है। दूसरी बात, लोकधर्म का जितना जलवा हमारे यहाँ है, इस अर्थ में कि जो लोक धार्मिक है वो अपने आपको जितनी मॉरल अथॉरिटी दे देता है, उतना कहीं नहीं है।
आप दूसरे देशों में जाएँगे, यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका, कहीं भी जाएँगे, वहाँ भी आपको लोग मिलेंगे जो बहुत कट्टर तरीक़े से लोक धार्मिक होंगे, ऐसे मिलेंगे, बिल्कुल मिलेंगे। पर उनके बगल में कोई चल रहा होगा, जो बोल दे, मान लीजिए कि, "मैं ईश्वर को नहीं मानता। मैं एथीस्ट हूँ," या "मैं कुछ हूँ।" तो वो अपने आप को यह मॉरल अथॉरिटी नहीं देंगे कि हम इसके ऊपर चढ़ बैठें। भारत की ख़ास बात यह है कि यहाँ लोक धार्मिक व्यक्ति को बड़ी मॉरल अथॉरिटी मिली हुई है। और वह मॉरल अथॉरिटी उन्होंने दी है जो लोक धार्मिक नहीं है।
मूर्खता पर कोई ऐसा नहीं कि हमारा ही विशेषाधिकार है, हमसे भी ज़्यादा मूर्ख दुनिया भर में कई देशों में पाए जाते हैं, बिल्कुल पाए जाते हैं। और वो बिल्कुल ज़बरदस्त पिछड़ेपन की बातें भी कर लेते हैं। हम जितने पिछड़ेपन की बातें करते हैं हमसे ज़्यादा पिछड़ी हुई बातें बिल्कुल संभव है कि किसी तथाकथित विकसित देश का कोई व्यक्ति कर रहा हो, बिल्कुल संभव है ये। कि आप बोलो, "फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्री है, डेवलप्ड कंट्री है, और ये यहाँ इतनी सुपरस्टिशियस और इतनी रिग्रेसिव बातें कर रहा है।"
हाँ, ऐसे लोग वहाँ भी मिलते हैं। लेकिन वहाँ वो अपने आप को यह अधिकार नहीं देते हैं कि अगर कोई हमारी बातें नहीं मान रहा, तो हम उस पर चढ़ बैठेंगे। हम उसकी बाज़ार में लिंचिंग कर देंगे, या हम उसको बदचलन घोषित कर देंगे। भाई, तुझे मानना है तू मान, जिसको नहीं मानना वो नहीं मानेगा। और तुझे कोई हक़ नहीं है उसके साथ गाली-गलौज करने का या उसकी ज़िंदगी पर चढ़ जाने का। ये अंतर है। और ये अंतर स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, लोक धार्मिक लोगों की ओर से नहीं है। यह उनकी ओर से है, जो लोक धार्मिक नहीं हैं, जैसे कि आप लोग।
जैसे आप यहाँ गीता सत्र में बैठे हो। आप यहाँ से बाहर निकलोगे, आप एक मिस्ड कॉल देखोगे। आप डर जाओगे आप फ़ोन करके बोलोगे, "नहीं, चाची, वो मैं न मैं तो ऐसे होटल में सो रहा था, आपकी कॉल मिस हो गई, वो साइलेंट पर लगा दिया था।" लोक धार्मिक चाची अमेरिका में भी हो सकती हैं, कहीं भी हो सकती हैं। लेकिन वहाँ पर जो दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी होगा आपकी तरह, वो उस लोक धार्मिक चाची से इतना डरेगा नहीं। तो लोक धार्मिक चाची यहाँ भी हैं वहाँ भी हैं, अंतर यह है कि वहाँ जो लोक धर्म को नहीं मानता वह डरपोक नहीं है। यहाँ जो लोक धर्म को नहीं मानता वह महाडरपोक है। जैसे कि?
(प्रश्नकर्ता अपनी ओर इंगित करते हुए)।
बात आ रही है समझ में? यह अंतर है।
आपके पास हौसला नहीं है, वो बुलंदी नहीं है कि खुलकर घोषणा कर पाएँ कि क्या बात है। आप चाहते हो तो बस अपनी हारों के कारनामे आकर पोत जाते हो।
"आज ना, मेरे सामने मेरे पापा और भैया ने आचार्य जी को बहुत गालियाँ दीं गंदी-गंदी, और उनकी सारी किताबें भी फाड़ दीं। और मैं कुछ नहीं कर पाई।" ये अंतर है। ऐसा कोई नमूना आपको जर्मनी में नहीं मिलेगा, वो वॉकआउट कर जाएगी। ये नमूने सिर्फ़ हमारे यहाँ मिलते हैं कि जिनको सच्चाई मिली भी हुई है, फिर भी झूठ से डरते हैं। यह अंतर है। अब इसका मैं क्या कर सकता हूँ, इसका कोई भी क्या कर सकता है।
प्रश्नकर्ता: मेरा सेकंड पार्ट था, बट आई थिंक आपने आंसर। सेकंड पार्ट था कि हम कैसे आइलैंड्स को बड़ा करें।
आचार्य प्रशांत: हाँ, उन आइलैंड्स की बहुत ज़रूरत है, पर वो आइलैंड्स एक फ़िज़िकल इंफ्रास्ट्रक्चर माँगते हैं जो कि एक फ़ाइनेंशियल कैपेसिटी माँगता है, जो मेरे पास नहीं है, मैं कैसे बनाऊँ। मैं जानता हूँ। (शुभंकर है यहाँ पर) मैं यूके से आया हूँ, उसके बाद से उसके साथ मैंने घंटों लगाकर यह सोचा है कि क्या हम किसी तरह अपना एक शहर बसा सकते हैं। फिर समझ में आया, नहीं। तो मैंने कहा, "क्या किसी तरह हम एक छोटी टाउनशिप बसा सकते हैं?" समझ में आया, नहीं। फिर उसी ने और कैलकुलेशंस किए। "क्या हम किसी तरह अपना एक बड़ा कैंपस बसा सकते हैं?" कहा, नहीं। मैं जानता हूँ कि वो काम, जो मैं करना चाहता हूँ, किन्हीं आइलैंड्स में ही हो सकता है। पर वो आइलैंड्स मैं कैसे बनाऊँ?
नतीजा क्या होने वाला है, बता देता हूँ। तुम भी नहीं रहोगे बहुत समय तक मेरे साथ, क्योंकि सबको एक मिनिमम सिक्योरिटी चाहिए होती है। अगर मैं आपको सिक्योरिटी नहीं दे पाऊँगा तो आपको छिटकना पड़ेगा, आपको दूर जाना पड़ेगा।
ये संस्था में सब जो काम करने वाले लोग भी हैं, वो भी जिन जगहों पर रहते हैं वहाँ उन्हें समस्याएँ आती हैं। और मैं जानता हूँ, उदाहरण के लिए, ग्रेटर नोएडा में लड़कियों को किराए पर मकान नहीं दिए जाते, खासकर अविवाहित लड़कियों को। हम तो बोल देते हैं कि आपका चयन हो गया, आइए यहाँ रहिए, काम करिए। वो कहाँ रहे? और वो पीजी में रहने जाती है, हॉस्टल वग़ैरह में वहाँ अलग तरह के टंटे होते हैं।
मैं तो चाहता हूँ कि एक छोटा-सा कैंपस हो, जहाँ मैं छोटे-छोटे सबको कमरे बनवाकर दे दूँ कि सब रहो यहाँ पर, और तमाम तरह की और सुविधाएँ कर दूँ। स्पोर्ट्स हैं, बड़ी लाइब्रेरी है। हर वो चीज़, जो मानव के विकास के लिए चाहिए, मैं वहाँ पर उपलब्ध करा दूँ कि रहो यहाँ पर ये है मानवता का एक नया ब्लूप्रिंट। ऐसे भी जिया जा सकता है।
मैं करना चाहता हूँ, मैं कैसे करूँ? यहाँ तो 90% ऊर्जा इसमें जाती है कि देखो अभी अगले महीने का रजिस्ट्रेशन कराया कि नहीं कराया। मेरी ज़िंदगी पूरी इसमें जा रही है। सोचिए, कैसा होता अगर आप यहाँ आए हैं, तो ये एक किराए का किसी बिजनेस स्कूल का ऑडिटोरियम नहीं होता, ये हमारा कैंपस होता। जहाँ मैं यह नहीं कहता कि सुबह की एक एचआईडीपी कर लो, शाम की कर लो। आप आते, मैं आपको हफ़्ते भर के लिए पूरे-पूरे दिन व्यस्त रख पाता और सौ तरह की मैं आपके लिए गतिविधियाँ निर्धारित कर पाता।
सोचिए, कैसा होता, आप कहते कि आचार्य जी इस बार हम दो महीने के लिए आए हैं, यहीं रहेंगे दो महीने। रोज़ बैठेंगे, रोज़ सुनेंगे और एक अलग तरह की ज़िंदगी जिएँगे ताकि मान पाएँ कि एक अलग तरह की ज़िंदगी संभव भी है। मुझे अपने शहर में, अपने मोहल्ले में, उस सोसाइटी, उस अपार्टमेंट में वापस नहीं जाना। मैं चाहता हूँ कि मैं आपको वापस न भेजूँ, पर कहाँ रखूँ?
मेरे पास ताक़त होती, मेरे पास सत्ता होती, मेरे पास पैसा होता, मैं दस साल के अंदर-अंदर इस देश की तस्वीर बदल देता।
अफ़सोस बस यह रहेगा कि ये सब; ताली क्या बजा रहे हो, मैं अफ़सोस की बात कर रहा हूँ कि यह सब किए बिना मैं चला जाऊँगा। और मुझे मालूम है, मैं क्या कर सकता था।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपने जो यह बात कही कि मतलब हम ऐसे प्लान बना रहे थे, यही प्लान मैं और मेरी छोटी बहन दो साल से बना रहे हैं, जब से आपसे जुड़े हैं। और हम भी ऐसे ही सोचते हैं कि मतलब एक सोसाइटी बन जाए, उसमें ये हमारा, आपका जो कार्यक्रम है, मतलब पूरी कम्युनिटी का चलता रहे और सब सेफ़ रहें। लेकिन हम भी इसी नतीजे पर पहुँचते हैं, मतलब उस मेरी छोटी बहन ने डायरियाँ भर रखी हैं ऐसे-ऐसे होगा, ये होगा, वो होगा। और पर हम भी इसी नतीजे पर जाते हैं, लोग साथ नहीं देंगे।
आचार्य प्रशांत: मैं वहाँ पर था लंदन में, मेरे लिए हर दिन अफ़सोस का होता था। मैं वहाँ जो कुछ देखता था, मैं अपने आप से पूछता था, ये मैं अपने देश में अपने लोगों के लिए क्यों नहीं कर सकता?
प्रश्नकर्ता: सर, यही हम सोचते हैं। वहाँ की तस्वीरें जब देखते हैं ना, तो हमें भी लगता है कि ऐसा यहाँ भी होना चाहिए, हो सकता है।
आचार्य प्रशांत: और कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है, कोई बहुत महँगा काम नहीं है। करा जा सकता है, पर वो करने के लिए भी जितने लोग चाहिए, जितने संसाधन चाहिए, वो नहीं है मेरे पास। तो क्या करूँ? ठीक है यह तो।
प्रश्नकर्ता: सर हम यह भी सोचते हैं कि जैसे संस्था के जितने लोग हैं, हम बिखरे-बिखरे हुए हैं। अगर एक जगह हो जाएँगे तो।
आचार्य प्रशांत: हाँ उससे फ़र्क पड़ता है, बिल्कुल फ़र्क पड़ता है।
प्रश्नकर्ता: इसीलिए मैंने अपना मतलब ख़ुद का घर नहीं बनाया अभी तक, किराए पर रहती हूँ मैं। जो है गाँव में वो है।
आचार्य प्रशांत: आप घर-वर बना लो, यहाँ कुछ नहीं होना है।
प्रश्नकर्ता: नहीं बनाना ही नहीं है सर, अब तो मुझे लगता है किराए पर रह सकते हैं हम।
आचार्य प्रशांत: मैं कुछ बातें लिख जाऊँगा, कह जाऊँगा, शायद बाद में कोई आएगा वो उनको साकार कर पाएगा। मुझे नहीं लगता कि मेरे जीवन काल में कुछ होना है।
कुछ भी नहीं था ऐसा लंदन में जो मैं ठीक यहीं नहीं खड़ा कर सकता था, मैं अपनी काबिलियत जानता हूँ। और जितनी एफिशिएंसी के साथ और जितने रिसोर्सेज के साथ और जितना समय लगाकर उन्होंने खड़ा करा है, मैं उसके एक चौथाई समय में सब यहाँ खड़ा कर सकता हूँ। कैसे करूँ?
प्रश्नकर्ता: सर यही हम दोनों बैठते हैं, सोचते हैं, करते हैं। लेकिन पीछे यही लगता है यहाँ के लोगों में ईमानदारी नहीं है।
आचार्य प्रशांत: यहाँ के लोग माने कौन? किसकी बात कर रहे?
प्रश्नकर्ता: सर हम सभी।
आचार्य प्रशांत: यही तो हैं।
प्रश्नकर्ता: एक जगह, सर, मेरे हस्बैंड अलवर में जॉब करते हैं, वहाँ एक सोसाइटी है जापानियों ने बसा रखी है वो। शायद मुझे इतनी जानकारी नहीं है, मैं चंडीगढ़ रही हूँ, नोएडा में रही हूँ। अभी मैं वृंदावन में एक सोसाइटी में रह रही हूँ। मथुरा में भी रही हूँ। लेकिन जितनी जगह मैंने देखी, मुझे ऐसी सोसाइटी नहीं लगी। फिर मैंने सोचा कि ये अलवर के पास ये कैसे हो गई ऐसी? तो मैंने सोचा कि न ये जापानियों ने बसाई, इसलिए ऐसी है। और वो कुछ-कुछ इस तरह की है, जैसे आप यूरोप में थे तो वहाँ से वीडियो डालते थे। कोई गंदगी नहीं दिखती है, कोई नाली नहीं दिखती है। साइकिल पथ वग़ैरह बिल्कुल साफ़ दिखते हैं और सब मेंटेनेंस एकदम बढ़िया रहता है। साफ़-सफ़ाई बहुत अच्छी रहती है। सब कुछ बढ़िया रहता है।
आचार्य प्रशांत: किसी और युग में पैदा हुए होते बादशाह बनके तो कुछ करके दिखाते। फ़ितरत तो सम्राटों वाली ही है, पर पैदा हो गए आपके साथ तो आचार्य बन गए हैं। यही कर सकते हैं, यही करेंगे। बाक़ी आप देखिएगा।