निकटवर्ती को ही हाथ बढ़ा कर सहारा दिया जा सकता है || आचार्य प्रशांत (2015)

प्रश्न: मैं क्या पूछूँ समझ में नहीं आ रहा है पता नहीं क्यूँ।
वक्ता: दसवीं कक्षा की गणित की चल रही हो क्लास और उसमें बढ़िया पढ़ाया जा रहा है टॉपिक, क्वाड्रैटिक इक़ुएशन मान लो। वहाँ बिठा दो पाँचवी के बच्चे को, जिसको अभी लीनियर इक़ुएशन ही नहीं पता, तो वो कुछ पूछ सकता है क्या? पूछने के लिए तुमको विषय वस्तु के आस-पास तो होना चाहिए न? तुम यदि थोड़ा सा पीछे हो किसी से, तो हाथ बढ़ा के उसको पकड़ सकते हो। देखा है कभी? जा रहे होते हैं ट्रक-टेम्पो — बिहार में बहुत होता है — पीछे से साइकिल वाले पकड़ लेते हैं उनको हाथ से, और वो चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। अब साइकिल भी चल रही है 30-40 की स्पीड से पर उसके लिए ज़रूरी क्या है? उसके लिए ज़रूरी क्या है? उसके लिए ज़रूरी ये है कि साथ वो लगा हो। जब साथ वो लगा है तो हाथ बढ़ा के पकड़ लिया। अब कोई पीछे छूट गया, बहुत पीछे छूट गया वो हाथ बढ़ाएगा तो क्या पाएगा? जो साथ लगा हुआ था यदि वो हाथ बढ़ाएगा तो उसकी गति उतनी ही हो जाएगी जितनी टेम्पो की। पर जो छूट गया पीछे अब वो हाथ बढ़ाएगा भी तो क्या पाएगा?
संवाद हो सके इसके लिए ये तो ज़रूरी होता है न कि कहने वाला और सुनने वाला, माहौल और तुम करीब-करीब एक तल पर हो। जहाँ सफ़ाई है, वहाँ सफाई का काम है विस्तार लेना, वो आगे बढ़ती चली जाती है और जहाँ सफाई नहीं है, उसका काम है और संकुचित होते चले जाना। वो अपने आप में ही सिमटती चली जाती है। दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं और एक समय के बाद किसी भी तरह का संपर्क, कोई संवाद असंभव हो जाता है। यही वजह है कि आम-आदमी की ग्रंथों में कोई रुचि होती ही नहीं और उसको पकड़ कर के बैठा दो, ‘‘लो पढ़ो। ये शास्त्र हैं, इन्हें पढ़ो’’ तो भी उसे कुछ समझ नहीं आता जबकि शास्त्रों की भाषा भी सरल, बात भी सीधी लेकिन फिर भी उसे कुछ समझ नहीं आता। समझ में इसीलिए नहीं आता क्यूँकी दुनिया अलग हो चुकी हैं। कैसे समझोगे अब? शास्त्रों की दुनिया अलग है वो किसी और मन से कहे जा रहे हैं और आम आदमी की दुनिया अलग है। शास्त्र जिन शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो आम-आदमी के लिए वैध ही नहीं हैं।



