वक्ता: शहंशाह का प्रश्न है कि इंडिविजुएलिटी व्यक्ति में आती कहाँ से है?
इंडिविजुएलिटी का अर्थ है निजता या अविभक्त्यता।
ये व्यक्ति में आती कहाँ से है?
कहीं से नहीं आती, जो तुम हो ही वो तुम कहाँ से पाओगे?
लेकिन मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ। जीवन में तुम सिर्फ़ उन चीज़ों को जानते हो जो तुमने कहीं से पायी हैं और तुम अपने आप को भी बस उन्हीं चीज़ों के सन्दर्भ में जानते हो जो तुमने कहीं से पाई हैं।
तुम अभी खड़े हुए, तुमने कहा “मैं शहंशाह हूँ“। अब निश्चित रूप से जिस क्षण तुम पैदा हुए थे तब शहंशाह नहीं थे, ये नाम तुमने कहीं से पाया और तुम अपने आप को सिर्फ़ उन्हीं सन्दर्भों में जानते हो जो तुमने कहीं से पाए हैं। तुम कहोगे कि तुम हिंदू हो या मुस्लिम हो, निश्चित रूप से ये धर्म भी तुमने कहीं से पाया है । तुम कहोगे कि मैं इतनी शैक्षणिक योग्यता रखे हुए हूँ, वो प्रमाण–पत्र भी तुमने कहीं से पाए, किसी और ने घोषणा की थी। तुम्हारे मन में जो कुछ भी है वो तुमने कहीं–न–कहीं से पाया ही है, धारण किया है, धारणायें ही हैं, मिला है तुम्हें। जो कुछ भी तुम्हारे पास ज़िन्दगी में है– नाम, इज्ज़त, शोहरत, कपड़े, किताबें, दौलत, ज्ञान– ये सब कुछ तुमको लगातार बाहर–ही–बाहर से मिला है।
तो मैं समझा इस बात को कि तुम्हें ये शक है कि निजता भी तुम्हें कहीं बाहर से मिल सकती है क्योंकि तुम्हें आज तक सब बाहर से ही मिला है| तो तुम्हारे मन में ये बात उठ रही है कि हो सकता है निजता भी कहीं बाहर से ही मिल जाये। ना, ऐसा नहीं हो पायेगा। वो तुम्हें कहीं बाहर से नहीं मिल पायेगी क्योंकि वो तुम्हारे पास है ही। सच तो ये है कि जो कुछ तुमको आज तक बाहर से मिला है, जब तुम ये जान लेते हो कि ये बाहरी है तो उसी जानने का नाम ‘निजता‘ है।




