Live SessionsHIDP 2.0AP FrameworkHis BiographyThe MissionHis WorkOperation 2030
Op-Eds & ColumnsMedia CoveragePress ReleasesInstitutional TalksPodcastsGalleryInvite Him
BooksArticlesVideo CoursesVideo LibraryCareers
Acharya Prashant App
Get it on Google PlayDownload on the App Store

Contact Us
[email protected]+91 96505 85100
Copyright © 2026 PrashantAdvait Foundation
Terms and ConditionsPrivacy PolicyUndertaking
AP Articles
For YouTrendingAll Topics
AP Articles
Self Enquiry

मैं कौन हूँ? || आचार्य प्रशांत (2015)

Acharya Prashant

13min
1.3kreads
मैं कौन हूँ? || आचार्य प्रशांत (2015)

प्रश्न: सर, मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ। मतलब शरीर दूसरों ने दिया, नाम दूसरों ने दिया, विचार भी दूसरों ने ही दिए।

वक्ता: बेटा, ये सवाल भी तो तुम्हें दूसरों ने ही दिया है न।

श्रोता १: सर बहुत जिज्ञासा है जानने की।

वक्ता: ये जिज्ञासा तुम्हें होती क्या अगर तुम्हें ये संकल्पना ना दी गई होती कि तुम्हारा शरीर दूसरों का है, तुम्हारे विचार दूसरों के हैं? ये जो जिज्ञासा है, ये भी दूसरों ने ही दी है। जैसे तुम इतनी किताबें पढ़ते हो वैसे ही तुमने एक आध्यात्मिक किताब भी पढ़ ली जिसमें ये सब बातें लिखीं हुई थीं कि शरीर और मन बाहर से आये हैं, तो उस कारण ये सवाल तुम्हारे लिए थोड़ा महत्वपूर्ण हो गया। ईमानदारी से बताओ कि अगर उस तरह की किताबें नहीं पढ़ी होतीं तो क्या ज़िन्दगी भर भी तुम्हें ये सवाल आता कि ‘मैं कौन हूँ?’। और दुनिया में करोड़ों लोग हैं जो ऐसी किसी चर्चा में जाके नहीं बैठते हैं। वो अस्सी-साल के हो जाएँ या पांच-सौ-साल के हो जाएँ, उन्हें कभी ये सवाल उठता है कि मैं कौन हूँ?

श्रोता १: सर तो फिर जीवन व्यर्थ हो जाएगा।

वक्ता: जीवन व्यर्थ हो गया, ये बात भी तुम्हें किसने बताई है? क्या ये तुम्हारा कोई अपना बोध है? ये तो कबीर आए उन्होंने बोल दिया कि जीवन की सार्थकता इसी में है कि आत्मज्ञान हो। ये सब भी तो तुम्हें किसी और ने ही बता दिया है न।

श्रोता १: सर ये सब तो समाज ने बताया है।

वक्ता: तो उत्तर आ गया मैं कौन हूँ, आ गया उत्तर?

श्रोता १: समाज की बात तो सुननी ही पड़ेगी।

वक्ता: ये सारा बातों का ही खेल है देखो न। तुम ये माने बैठे हो कि सामाजिक प्राणी हो और साथ में पूछ रहे हो कि मैं कौन हूँ।

श्रोता १: पर ये तो समाज कहता है।

वक्ता: तुमने क्या कहा?

श्रोता १: सर मैं तो बस कल्पना कर सकता हूँ।

वक्ता: ये भी क्या तुम्हारी सोच है? तो ये सवाल कि ‘मैं कौन हूँ?’ ये कल्पनाएँ बनाने के लिए नहीं होता है।

अब समझो इस सवाल का महत्व क्या है। इस सवाल का ये महत्व बिल्कुल भी नहीं है कि इसका कोई जवाब मिल जाएगा मुझे। इसका कोई जवाब नहीं होता कि मैं कौन हूँ।

‘मैं कौन हूँ?’ – सिर्फ़ एक ईमानदार सवाल होता है। ध्यान से समझना। ‘मैं कौन हूँ?’ सिर्फ़ एक ईमानदार सवाल होता है। किसी भी क्षण में जो भी घटना घट रही है उसमें ‘मैं’ कौन हूँ।। इसका कोई बंधा हुआ एक मात्र उत्तर नहीं होता। खेल रहा हूँ तो उस वक्त मैं कौन हूँ? गुस्से में आ गया हूँ तो मैं कौन हूँ? भावुक हो गया हूँ तो मैं कौन हूँ? आकर्षण उठ रहा है तो मैं कौन हूँ? भूख-प्यास लग रही है तो उस वक़्त किसे लग रही है, मैं कौन हूँ?

ये विधि है सिर्फ़ एक। लेकिन ये विधि सिर्फ़ काम तभी करती है जब मैं कौन हूँ ईमानदारी से पूछा जाए। इस चक्कर में मत रहना कि पूछते-पूछते एक दिन तुम्हें उत्तर मिल जाएगा कि मैं आत्मा हूँ या मैं मुक्त आकाश हूँ या मैं पञ्च कोशों से परे कोई महा शून्य हूँ। ये सब बातें तुमने पढ़ ली होंगी। मैं तीन अवस्थाओं से परे कोई चौथी अवस्था हूँ और मैं चौथी अवस्था से भी आगे कुछ हूँ। ये सब छोड़ दो। तुम कौन हो ये देखो, इस प्रश्न का शास्त्रीय उत्तर क्या है ये नहीं। तुम्हें अपनी ज़िन्दगी जीनी है, शास्त्रों की तो नहीं जीनी है न।

तो तुम्हें अगर कहीं किसी से ईर्ष्या उठ रही है तो उस वक्त पूछो कि किसे उठ रही है। ये सिर्फ़ विधि है आत्म-अवलोकन की। ये कोई ठहरा हुआ सवाल नहीं है कि मैं कौन हूँ – मन, शरीर, संस्कार या आत्मा, और तुम बड़े होशियार हो कि तुमने आत्मा को चुन लिया कि मैं तो आत्मा हूँ और तुम जान गए। हम आम तौर पर ऐसे ही करते हैं। ‘मैं कौन हूँ’ क्या है? मैं कौन हूँ कोई सवाल है ही नहीं, विधि है विधि। किस चीज़ की विधि है?

श्रोता २: अपने-आप को देखने की।

वक्ता: अपने-आप को देखने की विधि है। तो अभी तुम कौन हो? – जिज्ञासु। ठीक है? और गहरे जाना चाहते हो – जिज्ञासा किसको आई? और गहरे हो जाओ। अपने साथ ज़बरदस्ती करने की ज़रूरत नहीं है, मन जहाँ तक साथ देता है वहाँ तक जाओ उससे आगे मत जाओ।

यही बहुत शुभ बात है कि तुम ईमानदारी से इस बात को पूछो। कोई ख़ास उत्तर आए, वो बड़ी बात नहीं है। तो सार्थकता उचित समय पर इस सवाल के आ जाने की है। सार्थकता किसी ख़ास उत्तर को याद करने की बिल्कुल भी नहीं है।

ठीक उस मौके पर जब डर लग रहा हो, पूछो कि डर किसे लग रहा है? बस, अब इस प्रश्न से तुम्हें कुछ मिला। ठीक उस मौके पर जब बिल्कुल तनाव है, पूछो। ठीक उस मौके पर जब कोई पूर्वाग्रह मन को पकड़ ले रहा है कि ऐसा क्यों हुआ, पूछो। जब कोई संकल्प बन रहा है कि अभी जाकर के ये करना है, पूछो कहाँ से आ रहा है, किस को आ रहा है। मैं कुछ और होता तो मुझे आता क्या? मेरा अतीत अलग होता तो मुझे आता क्या? या ये परिस्थिति नहीं होती तो ये विचार आता क्या? तो ये विचार मुझ को आ रहा है या इस परिस्थिति को आ रहा है, पूछो।

ये भी जो मैं बोल रहा हूँ, ये भी मैंने बहुत विस्तार में करके बोल दिया है। ‘मैं कौन हूँ?’ जो प्रश्न होता है न वो सूक्ष्म होता है, उसमें ज़्यादा सोचना नहीं पड़ता है। वो तो एक रौशनी की तरह आता है बस। जल्दी से आता है जैसे बिजली कडकी हो।

‘मैं कौन हूँ?’ के उत्तर की तलाश मत करो क्योंकि कोई अंतिम उत्तर नहीं है उसका। ईमानदारी से ‘मैं कौन हूँ?’ में जीना सीखो। ईमानदारी से इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ‘मैं कौन हूँ?’ के बहुत सारे उत्तर तुम्हें इधर-उधर लिखे हुए मिल जाएँगे। वो तुम्हारे उत्तर नहीं हैं। तुम्हें तो अपना ही पूछना पड़ेगा न कि इस स्थिति में क्या चल रहा है। तुम्हारी स्थिति सिर्फ़ तुम्हारी स्थिति है, व्यक्तिगत। और तुम्हारे अलावा किसी के लिए संभव नहीं है उस स्थिति में ‘मैं कौन हूँ?’ पूछ पाना। तुम्हें ही करना पड़ेगा।

श्रोता ३: सर, जब हम बुल्लेशाह या और किसी की कविताओं या प्रसंगों को पढ़ते हैं तो ‘मैं कौन हूँ?’ जानने का प्रश्न ही नहीं उठता है। उसमें जो भी है ठीक लगता है क्योंकि हम उसमें लीन हो जाते हैं और मन कुछ और नहीं सोच पाता। उस समय यह सवाल क्यों नहीं आता?

वक्ता: असल में जब तुम आइने में खुद को देख रहे होते हो तो क्या चिल्ला रहे होते हो कि ‘मैं कौन हूँ?, मैं कौन हूँ?’? जब दिख रहा है न तो पूछना क्या है। तो आइने की तरह ये बात हमेशा सामने रहे कि पूछना नहीं पड़ता, सवाल इतना सूक्ष्म हो जाता है, इतना सूक्ष्म हो जाता है कि उसकी उपस्थिति फ़िर पता नहीं चलती। वो सजकता लगातार अपने-आप बनी रहती है कि कोई भूमिका निभा रहा हूँ, नाटक कर रहा हूँ या संस्कारित हूँ या बस सहज रूप से मौजूद हूँ, सजकता अपने-आप बनी रहती है।

‘मैं कौन हूँ?’ जब तक ख़याल है तब तक उसका उत्तर भी ख़याली ही होगा। ‘मैं कौन हूँ?’ जब एक सूक्ष्म सजकता बन जाता है, फ़िर वो विचार नहीं रह जाता।

मैंने सालों से ये सवाल नहीं सोचा होगा कि ‘मैं कौन हूँ?’। और तुम मुझसे ज़बरदस्ती भी करो कि सोचो तुम कौन हो तो मुझे अधिक से अधिक नींद आ जाएगी, नहीं सोच पाउँगा। क्या सोचो कि कौन हूँ! अगर सोच रहा हूँ तो कौन हूँ – सोचने वाला। इसमें क्या सोचें, ये कोई सोचने कि बात है। ये तो जागने की बात है। बहुत फैशनेबल हो जाता है।

आध्यात्मिकता के अपने फैशन होते हैं। तो ये सब उस फैशन का हिस्सा है – मैं कौन हूँ; हरी ॐ तत्सत; कोई गंजा हो जाता है, कोई बाल लम्बे कर लेता है – ये सब आध्यात्मिक फैड होते हैं। कितना शास्त्रीय लगता है न, ‘मैं कौन हूँ?’।

तुम चाहे कपड़ो के फैशन में पढ़ो या चाहे आध्यात्मिक फैशन में पढ़ो, फैशन तो फैशन है। उसमें कोई सच्चाई थोड़ी ही है। और ये सब आध्यात्मिक फैशन होते हैं। कोई ‘ॐ’ का टैटू बना कर घूम रहा है। मैंने देखा एक दिन किसी को उसने बाल ऐसे कटवाए थे कि सर पर ‘ॐ’ लिख गया। अब ये कोहम जैसी ही बात है। मुंडी पे ‘ॐ’ लिखा हुआ है। लड़कियाँ घूम रही हैं, उन्होंने नेवल रिंग डाल रखी है, उसमें स्वास्तिक बना हुआ है। चल रहा है आज-कल खूब। नाभि में स्वास्तिक लटक रहा है। और न जाने क्या-क्या होगा आगे। बाकी वो टी-शर्ट प्रिंट करता है उससे पूछो, वो भी कुछ आध्यात्मिक टी-शर्ट निकालता होगा।

सीधे रहो, सरल रहो – यही आध्यात्मिकता है, यही परमात्मा है।

परमात्मा जटिल नहीं है कि टेढ़े-मेढ़े सवालों से होकर उसकी ओर जाना है, जटिल सूत्रों से पहुंचोगे, कुछ हिब्रू या संस्कृत में लिखा हो तो समझ में आएगा, एक खतरनाक सी चीज़ है सिर्फ़ परम ज्ञानियों को मिलती है!

परम ज्ञानियों को नहीं मिलती, सीधे-साधे लोगों को मिली होती है।

सीधे-साधे रहो बस।

मक्कार ना रहो, यही आध्यात्मिकता है। पूरी आध्यात्मिकता बस इतनी ही है क्या – मक्कार मत रहो बस। उसके बाद तुम्हें कबीर का एक दोहा नहीं आता, गीता का एक श्लोक नहीं आता तो भी कोई बात नहीं। कृष्ण तुम्हारे भीतर बैठें हैं, उनके श्लोक रटके क्या करोगे।

श्रोता ४: सर, सूक्ष्म विचार और साधारण विचारों में कुछ ज़्यादा अन्तर तो नहीं होता?

वक्ता: सूक्ष्म विचार से आप क्या समझ रहे हैं?

श्रोता ४: ऐसा कि जिसमें सब-कुछ निराधार होता है।

वक्ता: सूक्ष्म विचार हमने कहा वो जो सूक्ष्म के संपर्क से निकलता हो। ऐसी ही परिभाषा दी थी? और हमने क्या कहा था सूक्ष्म क्या है?

Get Updates
Receive handpicked articles, quotes and videos of Acharya Prashant regularly.

This site is protected by reCAPTCHA.

By continuing, you agree to our Terms and Conditions and Privacy Policy

सूक्ष्म विचार वो जो आत्मा के संपर्क से निकलते हैं।

उसमें वो सारे गुण होंगे जो आत्मा की उपाधियाँ मानी जाती हैं। क्या होती हैं आत्मा की उपाधियाँ?

आत्मा नित्य है। वो सबका आना-जाना देखती है, लेकिन स्वयं ना आती है ना जाती है। तो सूक्ष्म विचार क्या हुआ?

‘दिस टू शैल पास’ (यह भी गुज़र जाएगा)

सुना है न ये, सूफी कहानी है। ‘ये एक सूक्ष्म विचार है’ – ये बाकी तर्कों को काट देगा। आपको बड़ी ख़ुशी उठ रही है और आपके मन में अब एक लहर आई है कि चलो कुछ कर डालते हैं। यदि ये सूक्ष्म विचार आ गया…

श्रोता ४: ‘दिस टू शैल पास’ (यह भी गुज़र जाएगा)।

वक्ता: सब आवत-जावत है, आया है सो जाएगा। तो बाकी तर्क अब इसके सामने अब नहीं चलेंगे। समझ रहे हो?

इसी तरीके से अब आत्मा की और उपाधियाँ ले लीजिए।

आत्मा निर्विशेष है। आत्मा क्या है?

श्रोता ४: निर्विशेष।

वक्ता: निर्विशेष। उसका कोई खास रूप, रंग, आकार नहीं होता। आपके जो साधारण विचार उठते हैं उनमें रूप, रंग, आकार सब कुछ होता है और आपको वही विचार सबसे ज़्यादा आकर्षित करते हैं और सुहाते हैं जिसमें ‘आप’ ख़ास हों। ख़ास रूप, ख़ास रंग, ख़ास आकार – ऐसा ही होता है न। तो यदि आपको ये विचार आ जाए कि जो है वो मिट्टी हो जाना है। तो ये विचार जितने भी ‘खासियत’ के विचार होंगे उनको तत्क्षण साफ़ कर देगा। या इसी तरीके से आपको वो विचार उठाए जो मंत्र ज़ेन गुरु देते हैं कि जन्म से पहले तुम्हारा कौन सा ख़ास चेहरा था। आज तुम ये चेहरा देखते हो, कहते हो ‘मैं’, और अपने बारे में हज़ार तरीके की हसरतें करते हो। ज़रा जन्म से पहले वाला अपना चेहरा दिखाना। निर्विशेष थे तब। यदि ये विचार आ जाए तो बाकी दुनिया भर के जो उपद्रवी, उत्पाती विचार हैं वो सब साफ़ हो जाएँगे।

मंत्र की और जप की जो पूरी अहमियत है वो इसीलिए है कि उल्टे-पुल्टे विचारों से तो मन भरा ही रहता है। अगर सही समय पर सही विचार, सूक्ष्म विचार आ जाए तो आप बहुत सारी आफ़तों से बच जाएँगे। पर सही समय पर आना चाहिए, बाद में नहीं। कबीर का एक-एक दोहा या जीज़स का एक-एक वचन या कृष्ण का एक-एक श्लोक या शिव सूत्र, ये सब हैं क्या? सूक्ष्म विचार ही तो हैं और क्या हैं। यदि सही समय पर याद आ जाए आपको गीता का कोई श्लोक तो क्या बात है। और आप किसको कहोगे कि अनुकम्पा है। या यदि सही समय पर आपके सामने कृष्ण की मूर्ति कौंध जाए तो और क्या चाहिए आपको।

मूर्तियाँ बनाने का जो पूरा विज्ञान था वो यही तो था कि मन तो छवियों में ही चलता है तो ज़रा कृष्ण की भी एक छवि बना दो ताकि मन के सामने वो कौंध सके सही समय पर और आप चेत सको। एक चेहरा आँख के सामने आ गया और आप तुरंत संभल गए। बात आ रही है समझ में? कि रविवार का दिन है और अनु को आलस आ रहा है और तभी शिव-सूत्र कहते हैं “प्रयत्न साधकः” कि साधक को तो प्रयत्न करना पड़ेगा। उठो, करो तो उठी और आ गई। पर फ़िर सही समय पर ये सूत्र कौंध जाना चाहिए। यही सूक्ष्म विचार होते हैं। “प्रयत्न साधकः” यही है सूक्ष्म विचार।

अभी हम ये जो सारी चर्चा कर रहे हैं ये क्या करती है? ये आपके इधर-उधर के सारे विचारों को शांत कर देती है। ये जो आप लिख-लिख करके भेजोगे थोड़ी देर में ये क्या होंगे? ये सूक्ष्म विचार ही तो होंगे।

आप जांचना ही चाहते हो कि कोई विचार सूक्ष्म है या नहीं तो उसकी कसौटी आत्मा है। ये देख लीजियेगा आप कि उसमें समय तो शामिल नहीं है। जिस विचार में समय को महत्व मिल रहा हो वो सूक्ष्म नहीं हो सकता। देख लीजियेगा कि उसमें कोई विशेष व्यक्ति या स्थान तो शामिल नहीं है। जिस विचार में स्थान को या व्यक्ति को या रूप को या व्यक्तित्व को जगह मिल रही हो वो सूक्ष्म विचार नहीं हो सकता। समझ में आ रही है बात?

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya PrashantJOIN NOW
Categories
  • Trending
  • Bhagavad Gita
    Ashtavakra Gita
    Avadhut Gita
    Pingla Gita
    Paramhans Gita
    Ribhu Gita
    Uttar Gita
    Jivanmukt Gita
    Putra Gita
    Ajgar Gita
    Uddhav Gita
  • Relationship
    Sex
    Attachment
    Lust
    Depression and Anxiety
    Stress
    Fear
    Loneliness
    Overthinking
    Anger
    Money
    Happiness
    Desire
    Guilt
    Suffering
    Jealousy
    Confusion
    Motivation
  • Adhyatma Upanishad
    Kathopnishad
    Mundaka Upanishad
    Devi Upanishad
    Chhandogya Upanishad
    Ishavasya Upanishad
    Brihadaranyaka Upanishad
    Amritbindu Upanishad
    Kena Upanishad
    Niralamba Upanishad
    Sarvasara Upanishad
    Shewtashvtara Upanishad
    Narayana Upanishad
    Mandukya Upanishad
    Maitreya Upanishad
  • Veganism
  • Women Liberation
Search
Relationship
Related Topics
Bhagavad Gita
Self Enquiry
Desire
Guru
Confusion
Compassion
Living in the Present
Yoga
Brihadaranyaka Upanishad
Avadhut Gita
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya PrashantJOIN NOW
Comments
Add Your Comment
Be the first one to add a comment :)
Articles On Self Enquiry
भारत से जाति क्यों नहीं जाती?
Self Enquiry
भारत से जाति क्यों नहीं जाती?
55min
400reads
23
1

भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।

जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
Self Enquiry
जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
41min
395reads
15
1

मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।

आपके फ़ैसले कौन ले रहा है?
Self Enquiry
आपके फ़ैसले कौन ले रहा है?
2min
277reads
13
5

अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।

Excerpts From Articles
रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
Read Full Article
कद नहीं, अपनी कहानी बदलो
कई तरह के डर—अकेले पड़ने, छवि खोने या छोटा समझे जाने—की जड़ अक्सर अतीत में बनी पहचान और कहानियों में होती है। शरीर की हाइट जैसी चीज़ों को समस्या मानकर उनसे जूझने के बजाय उनकी अप्रासंगिकता को समझकर आगे बढ़ना चाहिए। अतीत को दबाने से मुक्ति नहीं मिलती; उसके करीब जाकर अपनी स्मृतियों, धारणाओं और पुराने पैटर्न को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है।
Read Full Article
सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
Read Full Article
जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
Read Full Article
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
Read Full Article
Justice Without Boundaries: Why Compassion Cannot Stop at Species
Oppression should not see caste, gender, creed or colour, and it should not see species either. The moral threshold is sentience, not intelligence. An animal feels pain as fully as a human does, whether or not it can explain its suffering.
Read Full Article
ज्योतिष कितना सच है? कुंडली, ग्रह-नक्षत्र: इनका क्या अर्थ है?
वेदांत को केवल इसलिए सही या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह किसी विशेष परंपरा से आता है। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत की वस्तुनिष्ठ जाँच करता है, वहीं अद्वैत वेदांत सीधे मनुष्य के ‘मैं’, उसके दुख, बंधन और मुक्ति की पड़ताल करता है। इसकी कसौटी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसकी सच्चाई को देख पाना है। किसी दर्शन को मान लेना नहीं, बल्कि उससे स्वयं को मुक्त करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है।
Read Full Article
प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
Read Full Article
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
Read Full Article
Stuck Between Job Security and Your Real Passion?
Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.
Read Full Article
Climate Change: The Solution Is a Choice
Climate change is more than an environmental crisis—it is a crisis of human choices. Our patterns of consumption, consumerism and endless pursuit of more are putting increasing pressure on the planet. But meaningful change does not necessarily begin with new technology or stricter policies. It begins with a deeper question: what are we willing to change within ourselves?
Read Full Article
Related Topics
Bhagavad Gita
Self Enquiry
Desire
Guru
Confusion
Compassion
Living in the Present
Yoga
Brihadaranyaka Upanishad
Avadhut Gita