कौन है हमारा चोर? कैसे पकड़ें उसे? || आचार्य प्रशांत, गुरु कबीर पर (2018)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कबीर साहब का दोहा है, साखी है:
अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार। मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूँ वार।। ~ कबीर साहब
इस पर ज़रा प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: “अपने अपने चोर को, सब कोई डारै मार।” कौन है ये चोर? इतना सर्वव्यापक कैसे है कि सभी को लगा हुआ है? सभी की इससे दुश्मनी क्या है?
चोर वो जो दुख देता हो, संताप। वो, जो तुम्हारा चैन चुरा ले गया है, शान्ति चुरा ले गया है, वो, जिसके कारण तुम उसी को नहीं पा पाते जो तुम्हारा है, उसका नाम चोर। कौन होता है चोर? जो तुम्हारी अपनी वस्तु तुमसे चुरा ले, छीन ले जाए, हर ले। ठीक?
क्या है तुम्हारा अपना, बिलकुल निजी? जो किसी ने दिया नहीं, किसी के देने से नहीं मिलेगा। जिसको बताने वालों ने स्वभाव कहा है, आत्मा कहा है। जिसका वर्णन सच्चिदानन्द कहकर किया गया है। वही है तुम्हारा।
कौन चुरा लेता है उसको? उसको बहुत नामों से हम इंगित करते हैं। कभी माया कह देते हैं, कभी शैतान कह देते हैं, कभी अविद्या, कभी अहंकार कह देते हैं। और चूँकि हमें ये लगता है कि वो हमारा चैन चुरा ले गया है हमसे, तो हम तमाम तरह की विधियाँ ईजाद करते हैं। माया को दुश्मन जानते हैं, अहंकार मिटाने की बात करते हैं, अहंकार को मौत देने की बात करते हैं।






