कई सालों बाद पता चले कि गुरु से धोखा मिला || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मैं एक पचास वर्षीय महिला हूँ और एक शिक्षिका भी। शर्म सी आती है बताते हुए कि अट्ठाईस साल तक मैं सपरिवार एक ऐसे पंथ को मान रही थी जो कि स्वयं-घोषित, मोक्षाधिकारी, जीवनमुक्त, सत्ताधारी गुरु द्वारा चलाया जा रहा है। वहाँ बहुत लोगों का, यहाँ तक कि स्त्रियों का भी शोषण होता रहा है। उस चक्रव्यूह से बाहर निकले मुझे अब करीब डेढ़ साल हो गये हैं। मेरे परिवार वाले मुझसे ज़्यादा करीब से वहाँ की गंदगी जानते हैं और उन्होंने मुझसे रिश्ता सा तोड़ लिया है। धर्म के नाम पर चलने वाली इस मक्कारी के विचार को मैं मन से पूरी तरह से निकाल नहीं पा रही हूँ। कभी मुझे लगता है कि अपनी सामर्थ्य अनुसार मुझे आवाज़ उठानी चाहिए और कभी लगता है कि मेरी जान बच गयी, बस इसी बात का शुक्र मनाऊँ और अध्यात्म में आगे बढ़ूँ। कृपा करके कुछ सही दिशा दीजिए।
आचार्य प्रशांत: ये चक्र चल रहा है न, बहुत सालों से, बहुत दशकों से, शायद सदा से ही। लोग किसी गुरु इत्यादि के पास जाते हैं। ज़्यादातर लोग तो लंबे समय तक, लगभग जीवन भर जान ही नहीं पाते कि असलियत क्या है या अगर थोड़ी बहुत सच्चाई उजागर भी होने लगी तो वो ख़ुद ही सच्चाई से नज़रें चुरा लेते हैं।
कुछ लोग होते हैं जिनके सामने यथार्थ अपनी पूरी नग्नता से प्रदर्शित हो जाता है। फिर वो बाहर निकलते हैं, आवाज़ उठाते हैं, शोर मचता है, मीडिया में ख़बरें उछलती हैं। कुछ मामलों में किस्सा न्यायालय तक चला जाता है और दो-चार मामलों में तो सज़ा वगैरह भी हो जाती है। और फिर कुछ सालों बाद पुनः कोई ऐसा मामला प्रकाश में आ जाता है और फिर उसके कुछ सालों बाद फिर कोई मामला।
ये क्या चल रहा है, थोड़ा हमको समझना होगा। आपने पूछा है कि आपने उस पंथ को छोड़ दिया लेकिन फिर भी आपके मन से, वो जो बीते अट्ठाईस सालों के अनुभव हैं, वो निकल नहीं रहे हैं। आप उस पंथ के ख़िलाफ़ या धोखाधड़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहती हैं और दूसरा विकल्प आप कह रही हैं कि लगता है आवाज़ न उठाऊँ, चुपचाप अपने निजी अध्यात्म में आगे बढ़ूँ। थोड़ा समझते हैं।



