कभी उत्तराखंड कभी हिमाचल: विकास या विनाश? || आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत इस वक्त उत्तराखंड में दो सौ से ज़्यादा बाँधों का, डैम्स का निर्माण चल ही रहा है। और उसके अलावा सैकड़ों अन्य किस्म की तथाकथित विकास परियोजनाएँ। और ये सब-के-सब तोड़-फोड़ पर आधारित हैं। उसके अलावा हम रेल लेकर जा रहे हैं, एकदम पहाड़ की छाती तक हमें रेल पहुँचा देनी है। और वो जा रही है सुरंगों के माध्यम से, टनेल्स (सुरंग)। ठीक-ठीक आंकड़ा मुझे याद नहीं है। लेकिन मेरे खयाल से तीस या पचास किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही हैं कुल मिलाकर। कुछ ऐसा ही है।
अब आप देखिए क्या-क्या है- सड़क का चौड़ीकरण राजमार्ग का, रेलमार्ग का निर्माण जिसके लिए सुरंगे तोड़ी जा रही हैं, बाँध, अन्य किस्म की विकास परियोजनाएँ और प्राइवेट सेक्टर (नीजि क्षेत्र) द्वारा हाऊसिंग और हॉस्पिटालिटी (मेहमाननवाज़ी), इसके लिए तोड़-फोड़ और निर्माण। होटल बन रहे हैं, अपार्टमेंटस् बन रहे हैं और घर वगैरह तो बनते ही रहते हैं। इसके अलावा इन सबके सर पर क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) जिसके कारण अतिशय वृष्टि। ये हम क्या कर रहे हैं?
अभी हम रेल को चला देंगे और जब रेल चलती है, तो उसमें से कम्पन कितना होता है आप समझ रहे हैं? ये जो तोड़-फोड़ है, उसमें तो आप ये कह सकते हैं भाई कि एक बार सड़क बन गयी तो बन गयी। अब चलो, बन गयी अब इसके अलावा अतिरिक्त आगे और नहीं टूट-फूट होगी। लेकिन रेल तो रोज़ चलेगी न। और जब रेल चलती है तो वाइब्रेशन (कम्पन) होते हैं। और जब वाइब्रेशन होते हैं तो चट्टानें ढ़ीली पड़ती हैं।
दो चीज़ें एकदम ऐसे जुड़ी हुई हों, उनको आप हिलाएँ रोज़-रोज़ वाइब्रेशन दें तो क्या होगा? वो दोनों ढ़ीली पड़ेंगी। जब ढ़ीली पड़ेंगी तो टूट-टाटकर नीचे भी गिरेंगी। और उनके ऊपर जो कुछ बसा हुआ होगा, वो भी सब नीचे ध्वस्त हो जाएगा बिलकुल। तो अब ये सब होने जा रहा है। धर्म-धर्म-धर्म जितना नारा भारत में पिछले बीस-तीस साल में लगा है। इतना पहले नहीं लगता था। और पिछले बीस-तीस साल में भारत में सनातन धर्म का जितना नाश हुआ है, उतना भी कभी नहीं हुआ।



