चाहे वो मेरी रूचि हो, चाहे मेरी पसंद हो, चाहे मेरे लक्ष्य हों; हम हमेशा पाते हैं कि हम कभी भी उसमें पूर्णता से अपनेआप को डुबो नहीं पाते, क्योंकि वो हमारे होते ही नहीं हैं। वो कहीं बाहर से आये होते हैं। हमने बस मान लिया होता है कि वो हमारे अपने है। मेरे अपने वो होते ही कहाँ हैं? मेरा अपना तो तब कुछ हो जब पहले मैं स्वयं को जानूं। कि जब ये शब्द बना था, जिन्होंने ये शब्द बनाया था, वो अच्छी तरह जानते थे कि पैशन-वैशन कुछ होता नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: सबके पास पैशन (जूनून) होते हैं लेकिन हम पैशन के साथ न्याय नहीं कर पाते, हम अपने पैशन का करें क्या?
आचार्य प्रशांत: तुम जो सवाल कर रहे हो कि हमारे सबके पास पैशन (जूनून) होते हैं लेकिन हम पैशन के साथ न्याय नहीं कर पाते, हम अपने पैशन का करें क्या, देखो, जो चीज़ तुम्हारी नहीं होती, तुम्हारी अपनी समझ की वजह से पुष्पित नहीं होती, उसके पीछे कभी भी तुम अपनी पूरी ऊर्जा लगा ही नहीं पाओगे। कभी नहीं लगा पाओगे। और यही कारण है कि हममें से ज़्यादातर लोग अपने तथाकथित पैशन को कभी पूर्णता पर ले ही नहीं जा पाते क्योंकि वो हमारा होता ही नहीं है। जो मेरा नहीं है मैं उसके पीछे कभी पूरे तरीके से संलग्न हो भी नहीं पाऊँगा, कभी मेरी पूरी ऊर्जा उसकी तरफ बढ़ेगी ही नहीं।
इसीलिए कहा है, वो मेरी रूचि हो, चाहे मेरी पसंद हो, चाहे मेरे लक्ष्य हों; हम हमेशा पाते हैं कि हम कभी भी उसमें पूर्णता से अपनेआप को डुबो नहीं पाते, क्योंकि वो हमारे होते ही नहीं हैं। वो कहीं बाहर से आये होते हैं। हमने बस मान लिया होता है कि वो हमारे अपने है। मेरे अपने वो होते ही कहाँ हैं? मेरा अपना तो तब कुछ हो जब पहले मैं स्वयं को जानूं। कि जब ये शब्द बना था, जिन्होंने ये शब्द बनाया था, वो अच्छी तरह जानते थे कि




