बर्फ़ पिघलती रहती है और हम बहस करते रहते हैं कि जलवायु संकट असली है या नहीं। नकारवाद बहाने बदलकर बचा रहता है, पर निष्कर्ष वही रहता है: उत्पादन और उपभोग के हमारे ढर्रे को छेड़ा न जाए। कानून, स्वच्छ ऊर्जा और नई तकनीक, सब ज़रूरी हैं, पर गहरा सवाल यह है कि हम इतना चाहते ही क्यों हैं, जब कोई भी वस्तु भीतर के असंतोष को मिटा नहीं पाती। अगर ज़्यादा उपभोग के अलावा हमारे पास कोई उत्तर नहीं, तो हम धरती को आखिर किस लिए जला रहे हैं?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Navbharat Times on 18 October '26
हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर एक चर्चा में मैंने लोगों के सामने एक छोटा-सा प्रयोग किया। मंच पर मेरी मेज़ थी। उस पर एक पारदर्शी डिब्बा रखा था, जिसमें बर्फ़ के टुकड़े भरे थे। नीचे थोड़ी बर्फ़ पिघलकर पानी बन चुकी थी, और एक काली लकीर बता रही थी कि शुरू में पानी कहाँ तक था। बर्फ़ माने ग्लेशियर; पानी माने महासागर, हिमालय की नदियाँ, ग्लेशियर की झीलें। बात आगे बढ़ती गई, बर्फ़ पिघलती गई। बीच-बीच में ज़ोर से चटकने की आवाज़ आती, बर्फ़ का कोई टुकड़ा टूटकर गिरता और पानी का स्तर बढ़ जाता। एक बार एक बड़ा टुकड़ा ढहा तो मैंने कहा, “यह हिमस्खलन था।”
लोग अपनी आँखों से देख रहे थे कि बर्फ़ पिघलने पर बड़े-बड़े टुकड़े कैसे अचानक ढह जाते हैं और पानी का स्तर कैसे बढ़ता जाता है। सत्र खत्म होते-होते लगभग सारी बर्फ़ पिघल चुकी थी, और पानी का स्तर शुरुआत के मुकाबले कई गुना बढ़ गया था। इसी बीच एक युवती जलवायु नकारवादियों के तर्क एक-एक करके रख रही थीं। हम बहस कर रहे थे कि यह संकट सचमुच है भी या नहीं, और उसी समय हमारी आँखों के सामने उसके नतीजों की एक छोटी-सी झलक दिखाई दे रही थी।




