जब कोई हृदय बन बैठे तुम्हारा || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्नकर्ता: कैसे सतर्क हो जाएँ कि कोई हमारे जीवन पर इतना छा रहा है कि हमारा हृदय, हमारी आत्मा बना जा रहा है?
आचार्य प्रशांत: देखो, आत्मा का कोई नाम नहीं हो सकता लेकिन फिर भी आत्मा को लक्ष्य करते हुए, इंगित करते हुए इतने नाम दिये गए हैं। इसलिए दिये गए हैं ताकि तुम सतर्क हो सको।
आत्मा के कुछ नामों पर विचार करते हैं। आत्मा 'असंग' है, तुम्हारा जीवन अगर ऐसा हो जाए कि तुम्हें चौबीस घंटे किसी की संगति की लत पड़ जाए तो समझ लो कि तुमने उसे आत्मा बना लिया है। समझ में आ रही है बात? तुम्हें अगर कोई निरन्तर अपने निकट चाहिए हो या कोई निरन्तर तुम्हारे विचारों में मौजूद हो, चाहे वो तुम्हारा व्यवसाय हो, व्यापार हो, कोई विचार हो, कोई व्यक्ति हो, तो समझ लो उसको तुमने अपनी आत्मा बना लिया। और असली आत्मा के तुम विमुख हो गये क्योंकि आत्मा तो होती है असंग।
कोई एकदम ही छाने लग जाए मन पर तो समझ लेना कि वो आत्मा बना जा रहा है तुम्हारी। सुबह उठे नहीं कि एक ही चीज़ का विचार, रात को सोने से पहले भी उसी चीज़ का विचार। वर्तमान में भी और भविष्य में भी उसी का ख़याल, तो समझ लेना बहुत बड़ी चूक हो रही है।
इसी तरीक़े से आत्मा अनिवार्य है। सत्य को दुर्निवार भी बोलते हैं। उसका कोई निवारण नहीं हो सकता, उससे तुम मुक्त नहीं हो सकते, उससे तुम कभी निपट नहीं सकते। सत्य अवश्य भी है, आवश्यक है सत्य। वो तुम्हें वश में कर लेता है, तुम उसे वश में नहीं कर सकते। तुम देख लेना तुम्हारे जीवन में कोई अनिवार्य हुआ जा रहा है क्या। तुम देख लेना तुम्हारे जीवन में कोई तुम्हें वश में किये ले रहा है क्या। ये सब संकेत हैं कि दुर्घटना घट रही है, अनहोनी हो रही है।
घर में मेहमान कितने भी आयें-जायें, स्वागत है भाई, मालिक तो तुम हो न। ये देख लेना कि कहीं कोई आगन्तुक मालिक ही तो नहीं बना जा रहा। मालिक तो एक ही है। ये तुमने किस आवत-जावत को मालिक का दर्ज़ा दे दिया? ऐसा नहीं कि वो व्यक्ति ग़लत है, कोई भी व्यक्ति हो, वो मालिक नहीं हो सकता। कोई भी विचार हो, कोई भी उपक्रम हो, कोई मालिक नहीं हो सकता। समझ में आ रही है बात?



