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जब कोई हृदय बन बैठे तुम्हारा || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
15 min
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प्रश्नकर्ता: कैसे सतर्क हो जाएँ कि कोई हमारे जीवन पर इतना छा रहा है कि हमारा हृदय, हमारी आत्मा बना जा रहा है?

आचार्य प्रशांत: देखो, आत्मा का कोई नाम नहीं हो सकता लेकिन फिर भी आत्मा को लक्ष्य करते हुए, इंगित करते हुए इतने नाम दिये गए हैं। इसलिए दिये गए हैं ताकि तुम सतर्क हो सको।

आत्मा के कुछ नामों पर विचार करते हैं। आत्मा 'असंग' है, तुम्हारा जीवन अगर ऐसा हो जाए कि तुम्हें चौबीस घंटे किसी की संगति की लत पड़ जाए तो समझ लो कि तुमने उसे आत्मा बना लिया है। समझ में आ रही है बात? तुम्हें अगर कोई निरन्तर अपने निकट चाहिए हो या कोई निरन्तर तुम्हारे विचारों में मौजूद हो, चाहे वो तुम्हारा व्यवसाय हो, व्यापार हो, कोई विचार हो, कोई व्यक्ति हो, तो समझ लो उसको तुमने अपनी आत्मा बना लिया। और असली आत्मा के तुम विमुख हो गये क्योंकि आत्मा तो होती है असंग।

कोई एकदम ही छाने लग जाए मन पर तो समझ लेना कि वो आत्मा बना जा रहा है तुम्हारी। सुबह उठे नहीं कि एक ही चीज़ का विचार, रात को सोने से पहले भी उसी चीज़ का विचार। वर्तमान में भी और भविष्य में भी उसी का ख़याल, तो समझ लेना बहुत बड़ी चूक हो रही है।

इसी तरीक़े से आत्मा अनिवार्य है। सत्य को दुर्निवार भी बोलते हैं। उसका कोई निवारण नहीं हो सकता, उससे तुम मुक्त नहीं हो सकते, उससे तुम कभी निपट नहीं सकते। सत्य अवश्य भी है, आवश्यक है सत्य। वो तुम्हें वश में कर लेता है, तुम उसे वश में नहीं कर सकते। तुम देख लेना तुम्हारे जीवन में कोई अनिवार्य हुआ जा रहा है क्या। तुम देख लेना तुम्हारे जीवन में कोई तुम्हें वश में किये ले रहा है क्या। ये सब संकेत हैं कि दुर्घटना घट रही है, अनहोनी हो रही है।

घर में मेहमान कितने भी आयें-जायें, स्वागत है भाई, मालिक तो तुम हो न। ये देख लेना कि कहीं कोई आगन्तुक मालिक ही तो नहीं बना जा रहा। मालिक तो एक ही है। ये तुमने किस आवत-जावत को मालिक का दर्ज़ा दे दिया? ऐसा नहीं कि वो व्यक्ति ग़लत है, कोई भी व्यक्ति हो, वो मालिक नहीं हो सकता। कोई भी विचार हो, कोई भी उपक्रम हो, कोई मालिक नहीं हो सकता। समझ में आ रही है बात?

इसी तरीक़े से आत्मा स्रोत है, प्रथम है, पहली। देख लेना कोई तुम्हारे जीवन में पहला तो नहीं बना जा रहा है। तुम्हारी ज़िन्दगी की सब वरीयताओं की सूची नम्बर दो से शुरू होनी चाहिए। कोई भी तुम सूची बनाओ, वो कभी भी एक से मत शुरू करना। इसको एक नियम की तरह याद रखो। कोई भी सूची बनाओ, क्या फ़र्क पड़ता है किस चीज़ की सूची है। जीवन में जो कुछ भी हो, उसमें पहला स्थान खाली रखना। पहला स्थान ब्रह्म का है, पूर्णता का है। उसकी पूर्णता को रिक्तता भी बोल सकते हैं, महाशुद्ध रिक्तता, महाशून्य रिक्तता। पहली जगह तो खाली छोड़ दिया करो, आरक्षित। कतार नम्बर दो से शुरू होती है, साहब! कोई पहला तो नहीं बना जा रहा?

आत्मा अनन्त है, देख लेना किसी ऐसी चीज़ को तो जीवन में नहीं ले आये हो, जिसका अन्त बचाने के लिए तुम्हें ही बड़ा संघर्ष करना पड़ता हो। कुछ ऐसा तो नहीं लाये हो जीवन में जिसको अगर तुम सुरक्षा नहीं दोगे, परवरिश नहीं दोगे तो अन्त को प्राप्त हो जाएगा? कोई ऐसी चीज़ है अगर जो ख़त्म हो सकती है जल्दी, जिसको बचाने के लिए तुम्हें बड़ी मेहनत करनी पड़ रही है, जिसको बचाने के लिए तुमको शर्तें माननी पड़ रही है तो जान लो कुछ गड़बड़ हो रही है, क्योंकि आत्मा तो अनन्त है। जिसका अन्त कभी भी आ सकता हो, जिसका अन्त एक धमकी की तरह, एक आशंका की तरह तुम्हारे सामने निरन्तर खड़ा हो उसको कितना महत्व दे सकते हो तुम जीवन में? क्यों देना है महत्व? समझ में आ रही है बात?

आत्मा मुक्ति है। तुमने जीवन में कुछ ऐसा पाल लिया हो जो तुम्हारे लिए बन्धन बन गया हो तो समझ लेना गड़बड़ हो रही है। जीवन में कुछ ऐसा ले आये हो जो तुम्हारी मुक्ति छीन रहा हो तो समझ लेना कोई तुम्हारी आत्मा का स्थान लेने की कोशिश कर रहा है। कुछ भी दे देना कोई माँगे तो, आत्मा थोड़े ही दे सकते हो। अपने बस की ही बात नहीं है। कुछ ऐसा भी नहीं है कि दे तो सकते थे पर अभी सौदा ठीक नहीं लग रहा है इसलिए नहीं दे रहे हैं, थोड़ा बोली बढ़ाओ तो दे देंगे। नहीं, ऐसी बात नहीं है।

चीज़ हमारी है ही नहीं, दे कैसे दें? हम उसके हैं, वो हमारी नहीं है, कैसे दे दें? ज़रूरत पड़ी तो जान भी दे सकते हैं, रुपया-पैसा ले जाओ, आत्मा कैसे दे दें? कोई जेब में रखी हुई चीज़ थोड़े ही है कि निकाली और दे दी! मुक्ति नहीं दे सकते किसी को। कोई मुक्ति अगर माँग रहा है तुम्हारी, कोई बन्धनों से आरोपित कर रहा है तुमको, तो आत्मा बन रहा है तुम्हारी। मत बनने देना। समझ में आ रही है बात?

निरंजन, निर्विचार, ये सब शब्द आत्मा को इंगित करते हैं। कोई मन की अगर रंजना बन जाए, रंजना माने दाग धब्बा, कोई मन में लगातार विचार बनकर चक्कर लगाये, ठीक नहीं है तुम्हारे लिए। विषय वो रखो जीवन में जो तुम्हें निरंजन कर दे, सब रंजनाओं से तुमको निर्मल कर दे, सब विचारों को शान्त कर दे। ऐसे को क्यों लाना जो विचारोत्तेजक हो?

पर हमें तो वही लोग अच्छे लगते हैं जो विचारोत्तेजक होते हैं। जीवन में कोई बिलकुल मिर्ची की तरह आये, ‘आहहाहा! क्या बात है! कुछ धुआँ सा तो उठा, सी-सी-सी!’ (उत्तेजित होने का अभिनय करते हुए)। बड़ा अच्छा लगता है। जो तुम्हारे जीवन में मिर्च-मसाला बनकर आया है, “गोलमाल है, भाई, सब गोलमाल है।” किसको तो बोल रहा था ये ’यू आर द स्पाइस ऑफ़ माई लाइफ़’ (तुम मेरी ज़िन्दगी की मसाला हो)। “सीधे रास्ते की ये टेढ़ी सी चाल है। गोलमाल है, भाई, सब गोलमाल है।”

अभी बहुत देर तक इस पर बोल सकता हूँ। सैकड़ों नामों से सत्य को, आत्मा को सम्बोधित किया गया है। सोचो तो जिसका कोई नाम नहीं हो सकता, उसे इतने नाम क्यों दिये गये? इसलिए दिये गए ताकि तुम सतर्क हो सको। हर नाम तुम्हारी सहायता के लिए दिया गया है। उस नाम को देखो और कहो, ‘अगर सच्चाई ये है और मेरे जीवन में जो हो रहा है वो इसका विपरीत है, तो फँसा न मैं!’

'अनिकेत' है आत्मा, जिसकी कोई सीमा नहीं हो सकती। जो स्वयं सबका घर है पर जिसको किसी घर में, किसी चारदीवारी में क़ैद करके नहीं रखा जा सकता, अनिकेत। और जीवन में तुम्हारे कोई आये जो तुम्हें बसने पर विवश करे, बन्धन पहनने पर विवश करे, चारदीवारी में सीमित हो जाने पर विवश करे, वो अपनी हस्ती से बहुत बढ़कर व्यवहार कर रहा है। वो तुम्हारी आत्मा का ही उल्लंघन कर रहा है। मत करने देना! हमें बड़ा अच्छा लगता है, हमें कोई पहचानें दे देता है। ये जो तुम्हें पहचानें दे रहा है, आईडेंटिटी , ये तुम्हारे लिए कोई अच्छा नहीं है भाई, क्योंकि आत्मा का कोई नाम-पता, पहचान नहीं होता।

एक शिविर था, उसमें कुछ ऐसा सा लिखकर के भेजा था,

'बिटिया है, बहन है, पत्नी है, माँ है, देवरानी-जेठानी है। फिर प्यारी सी नानी है। स्त्री को तुम व्यक्ति नहीं मान लेना, देवी है, देखो कैसी कहानी है।'

कुछ ऐसा था।

देखिए, कितनी पहचानें होती हैं। आजन्म वो पहचानों में ही रहती है तो इसलिए तो वो देवी है कि उसका अपना कोई व्यक्तित्व ही नहीं होता। बिटिया है, बहन है, पत्नी है, भाभी है, फिर नानी है, दादी है तो देवी है। ये क्या भ्रामक मान्यताएँ हैं? और ऐसे ही आप पुरुषों के बारे में भी बोल सकते हो, उनका भी तो बराबर का चलता है।

‘बेटा है, भाई है, पति है, देवर है, जेठ है, नाना है, दादा है, फूफा है, ताऊ है। कोई आकर पंगे मत लेना, बड़ा डेंजर हमारा भाऊ है।’

कुछ भी बना लो तुम तुकबन्दी, वो श्लोक थोड़े ही हो जाएगा!

‘डेढ़-सौ-किलो का मेरा ताऊ है, पूरे मोहल्ले का वो भाऊ है।’

फिर तुम बोलोगे, ‘देखो, हमने कितनी ऊँची बात बोली! यही उपनिषद् है हमारा।’

बड़ी दिक्क़त होती है जब आप प्रचलित जन संस्कृति को सत्य मान लेते हो। जिसको आप बोलते हो न 'फ़ोक विज़्डम' , ये फ़ोक विज़्डम क्या चीज़ होती है? कि माने बहुत सारे लोगों में वो बात चलती है तो वो बात बड़े बोध की हो गयी, बड़ी विज़्डम की हो गयी? सौ लोगों के मानने से चीज़ें बड़ी विज़्डम की हो जाती हैं, कैसे भाई? अभी कुछ सौ साल पहले तक बहुत बड़े अनुपात में लोग मानते थे कि पृथ्वी चपटी है, तो? और हम बड़े खुश होते हैं हमें जब पहचानें आकर के कोई दे देता है।

फिर कह रहा हूँ, आत्मा की कोई पहचान नहीं होती। लेकिन जैसे ही ये बोलूँगा, आपके भीतर से एक विरोध सा उठेगा, 'अगर कोई पहचान नहीं हमारी तो फिर तो कोई व्यक्तित्व नहीं है हमारा। फिर हम हैं ही क्या? फिर हम बचे ही नहीं।' डर लगता है बड़ा। एकदम डर लगता है।

पहचानें हमारी सारी ऐसी हैं समझ लो, उदाहरण दे रहा हूँ, बादल होता है, बादल में छोटे-छोटे पानी के अणु होते हैं। वो एकदम साफ़ होते हैं, एकदम साफ़। किसी भी दूषण से उनका कोई नाता नहीं होता, प्योर डिस्टिल्ड वाटर। अपना मुक्त हैं, तैर रहे हैं, असम्बद्ध हैं। एक तरह से कह सकते हो कोई व्यक्तित्व नहीं होता। बादल बन जाते हैं तब तो फिर भी थोड़ा सा होता है, जब भाप होते हैं तब तो बिलकुल ही नहीं होता। और फिर वो पृथ्वी पर पड़ें, मिट्टी में मिलकर कीचड़ हो गये तो व्यक्तित्व आ जाता है।

और इस व्यक्तित्व को, ऐसे कीचड़ को खोने से हम कितना घबराते हैं! हमें लगता है हमारी ज़िन्दगी छिन जाएगी, हमारा सबकुछ लुट जाएगा। तुम्हारी ज़िन्दगी नहीं छिन रही है, तुम्हारी गन्दगी छिन रही है। तुम्हारा सत्व तो क़ायम रहेगा। तुम्हारी सत्यता तो अक्षुण्ण रहेगी। कीचड़ साफ़ कर देते हो, उससे पानी के अणु का कुछ बिगड़ जाता है क्या? तुम्हें क्या लगता है तुम कीचड़ हटाते हो, उससे पानी बर्बाद हो जाता है? पानी का जो अणु था कीचड़ में वो बर्बाद हो गया? कुछ मिट गया उसका?

बस इतना है कि कीचड़ से वो मुक्त हो जाए तो अपनी सहज स्थिति को प्राप्त हो जाएगा। पर कीचड़ बने-बने, उसको ये भ्रम हो जाता है कि अगर वो कीचड़ नहीं रहा तो कुछ भी नहीं रहेगा। जो बादल बनकर आकाश का गौरव हो सकता था, शुद्ध बादल, बिना किसी मिलावट का, वो कीचड़ बनकर पृथ्वी का दूषण हो गया है। आकाश का भूषण पृथ्वी का दूषण बन गया है और कह रहा है कि अरे! अगर मुझसे मेरा व्यक्तित्व छीन लिया, मेरा कीचड़ छीन लिया तो मेरा क्या होगा!

आदत है बस, आदत, गन्दी आदत। इसीलिए सारी साधना बस अनुशासन का ही दूसरा नाम है, आदत तोड़नी पड़ती है। अनुशासन की परिभाषा यही है, जो चीज़ तुम्हारी आदत तोड़ दे वो अनुशासन है।

प्र: आचार्य जी, आपने समझाते हुए यह कहा कि जो भी आपको कोई पहचान दे दे, उनसे बचें। मगर जिनसे भी हम सम्बन्धित होते हैं, हमारा होना ही उनकी एक पहचान बन जाता है। मैं हूँ इसलिए उसकी एक पहचान है और वो है, मैं सम्बन्धित हूँ तो इसलिए मेरी भी एक पहचान बन गयी है।

आचार्य: पहचान बन गयी माने क्या? पहचान किसके मन में है वो?

प्र: दोनों के ही।

आचार्य: हाँ, तो ग़लत है। कोई तुमसे पूछे तुम कौन हो, और तुम कहो फ़लाने का फ़लाना, तो बड़ा ग़लत हो गया। भाई, तुमको कोई घर पर चिट्ठी देने आ रहा है, कोई कूरियर वगैरह आया है तुम्हारा, उसके मन में तुम्हारी पहचान हो कि ये फ़लाने वो है जो अमुक घर में रहते हैं, तो ठीक है। फिर कोई बात नहीं। कोई दूसरा है जो तुम्हें इस नज़र से देख रहा है, तुम्हारा कोई दोष नहीं है इसमें। तुम्हारा बेटा हो और उसके स्कूल वाले उसको ऐसे देखें कि ये फ़लाने का सुपुत्र है, कोई बात नहीं है, स्कूल ऐसे देख रहा है तो, ठीक है। रोहन, सन ऑफ़ सोहन। स्कूल के रिकॉर्ड को उन्होंने ऐसे लिख रखे हैं, कोई बात नहीं।

लेकिन अगर तुमने ही अपना नाम ये बना लिया कि सोहन, फादर ऑफ़ रोहन तो गड़बड़ हो गयी, क्योंकि अब तुमने उस पहचान को आत्मसात कर लिया है। दुनिया देखती रहे, कोई बात नहीं, तुमने आत्मसात क्यों किया? तादात्म्य इसी को तो कहते हैं, मैंने ही मान लिया कि फ़लानी चीज़ मैं हूँ, मैंने ही मान लिया है।

और सम्बन्धों में ऐसा होने की सम्भावना ही नहीं होती, सम्बन्धों की तो जैसे परिकल्पना ही इस तरह से की जाती है। ‘तुम कमलेश नहीं हो, तुम रिंकू के पापा हो।’ तुम्हें बुलाया भी ऐसे ही जा रहा है, क्या? ‘रिंकू के पापा।’ अब जियोगे कैसे? क्योंकि इतनी बार तुम्हारे कानों में ये शब्द पड़ेंगे कि तुम उसको आत्मसात कर लोगे। तुम अपनी नज़रों में भी क्या बन जाओगे? 'रिंकू के पापा।' अब रिंकू का पापा होना समस्या नहीं है क्योंकि रिंकू का कोई तो पापा होगा। तुम ही ने जना है रिंकू को। ठीक है, कोई बात नहीं, रिंकू का जन्म हो गया, अच्छी बात है। लेकिन तुम अपनी नज़रों में क्यों उसके बाप बने बैठे हो?

मुस्कुराओ नहीं, मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। (श्रोता से कहते हुए)

मेरे पास ये रूमाल है, सम्बन्ध ही है न ये एक? पर मैं अपनी नज़रों में वो बन जाऊँ जो इस रूमाल का मालिक है, तब गड़बड़ हो गयी। रूमाल का मेरे पास होना अपनेआप में कोई दुर्घटना नहीं है। रिंकू का पापा होना अपनेआप में कोई दुर्घटना नहीं है, चलो हो गये रिंकू के पापा। पर अपनी नज़रों में कोई मुझसे पूछे आप कौन हैं, और मैं कहूँ रूमाल का मालिक, तो समस्या है। क्योंकि मैंने अपने केन्द्र में किसको रख दिया? मेरे जीवन में प्रथम कौन हो गया? मुझसे मेरा परिचय भी पूछा गया तो मैंने ये नहीं कहा, ‘मैं’। मैंने कहा, ‘रूमाल’। पहले नाम ही किसका आया? रूमाल का। रूमाल का मालिक। केन्द्र पर, प्रथम कौन हो गया? रुमाल। ये दिक्क़त है।

तो मैं ये नहीं बोल रहा हूँ कि किसी के पास रूमाल नहीं होनी चाहिए या किसी के पास बच्चा नहीं होना चाहिए। वो ‘पहले’ नहीं हो सकते, बाबा! पहले नहीं हो सकते। ये सब जीवन के खेल हैं, चलते हैं। इन्हें होश में खेलो, कोई समस्या नहीं। जब तक इंसान है, सन्तानोत्पत्ति भी करेगा। और जब तक इंसान के पास हाथ है और चेहरा है, तब तक रूमाल भी रहेंगे। तो रूमालों के होने या रिंकू के होने में कोई अपराध नहीं हो गया। लेकिन तुम वही बन गये, 'रिंकू के पापा, रूमाल का मालिक’, ये क्या बात है? और फिर बहुत चोट लगती है।

यहाँ पर रखा हुआ है, 'मैं कौन हूँ? रूमाल।' माने रूमाल ही पहली चीज़ है, वही मेरी हस्ती को परिभाषित कर रहा है। और थोड़ी देर में मैंने देखा कि यह पहाड़ी (श्रोता की ओर इशारा करते हुए) को जुकाम है और वो यही रूमाल लेकर के अपना नाक साफ़ कर रहा है। अब दिल पर क्या बीतेगी मेरे? उसने रूमाल थोड़े ही ख़राब करा, उसने क्या ख़राब कर दिया? उसने मुझे ही ख़राब कर दिया। ये समस्या होती है जब आप अपनी पहचान अपने बाहर वाले किसी को केन्द्र में रखकर बनाते हैं।

जैसे आपका हृदय आप से बाहर कहीं धड़क रहा हो। और दुनिया में बहुत पगले हैं, कोई आकर के उसमें ऐसे-ऐसे सुई चुभो रहा है और आप देख रहे हैं। ये होता है जब आप अपनी आत्मा अपने से बाहर कहीं रख देते हैं, किसी बाहर वाले को ही आत्मा बना देते हैं। कोई आ गया लफंगा, बहुत घूम रहे हैं ऐसे ही। और वो क्या कर रहा है? वहाँ आपका दिल धड़क रहा है और दिल में ऐसे-ऐसे सुई चुभो रहा है। कैसे जियोगे? जैसे वो जादूगर था जिसकी जान तोते में थी, मारा जाता था न बार-बार? कैसे मारा जाता था? जादूगर को आप मार ही नहीं सकते थे, तोता मार दिया जाता था। ये होता है उनके साथ जो अपनी जान किसी और को बना देते हैं।

अब ये रूमाल है, पक्का ये पहाड़ी (एक सदस्य की ओर संकेत करते हुए) लेगा तो नाक साफ़ करेगा। और मैं कौन था? रूमाल का मालिक। रूमाल नहीं मैला करा इसने, मुझे ही मैला कर दिया। गया न मैं? ये कैसी विवशता है! क्यों इतना असहाय होकर जीना है?

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