आप अपने सामने अगर एक ऐसे मनुष्य को देखें जो पशुवत हो चुका है, तो ये मत सोचिएगा कि सिर्फ़ एक इंसान का खेल ख़राब हुआ है। ये समझिएगा कि आपको भी उसके जैसा बनाने की पूरी तैयारी चल रही है। एक दिन ये आग तुम्हारे घर में भी लगेगी। तो कोई तो चाहिए ना — जो सामने आए, इलाज करे, मुक़ाबला करे। कोई सामने नहीं आएगा, कोई मुक़ाबला नहीं करेगा तो सब वैसे ही हो जाएँगे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम मुकुल है और आपको सुनने के बाद मेरे जीवन में बहुत बदलाव आए हैं। मेरा प्रश्न इसी मुद्दे से संबंधित है। जैसा कि हम सब देख रहे हैं, बहुत से लोग आपका विरोध कर रहे हैं और आपके खिलाफ झूठी चीज़ें फैला रहे हैं। और ये वही समाज है, जिसको आप कीचड़ से बाहर निकालने का काम कर रहे हैं। फिर भी ये सब लोग — या ये पूरा समाज आपके ऊपर कंकड़ फेंक रहा है। आपका इतना विरोध होने के बावज़ूद, हम सब देख रहे हैं कि आपका काम और तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है। हम यही जानना चाहते हैं कि ऐसा क्या है जो आपको ये सब करने के लिए ड्राइव करता है?
आचार्य प्रशांत: एक पुरानी कहानी है — सबने सुनी होगी बचपन में। कई बार तो स्कूलों की किताबों में होती है। एक बार एक राजा ने कहा कि, "जो मेरे राज्य का सबसे मासूम चेहरा है, जाओ उसको खोज के लाओ, और हम उसकी एक छवि बनवाएंगे।" बड़े चित्रकार बुलवाए बोले, "इस चेहरे को यहाँ पर आप चित्रित कर दीजिए, ये सबसे मासूम चेहरा है। कहीं महल की दीवार पर इसकी छवि उकेर दीजिए।" बोले, "अच्छा ठीक है।" तो गए खोजा खूब खोजा, एक बच्चा मिला उन्हें — मासूम। वो सबसे, दुनिया के गुण-दोषों से अभी अछूता था। भीतर-भीतर बीज रहे होंगे, पर बाहर-बाहर अभी उसमें कोई दोष, विकार नहीं आए थे। तो उसे ले आते हैं और उसकी शक्ल का चित्रण कर देते हैं। फिर कई साल बीतते हैं — बीस साल।
राजा का मन, वो बोलता है, "एक ही चीज़ क्यों रखे हुए हैं? — मासूमियत। हमें बर्बरता, क्रूरता, हिंसा को भी दर्शाता एक चेहरा चाहिए। जाओ, खोज कर लाओ — पूरे राज्य में सबसे ज़्यादा विकृत और विभत्स चेहरा कौन-सा है?" फिर खोजने निकलते हैं। तो राज्य में नहीं मिलता, जंगल में मिलता है। वहाँ था एक, उसने तो अपना एक




