
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम मुकुल है और आपको सुनने के बाद मेरे जीवन में बहुत बदलाव आए हैं। मेरा प्रश्न इसी मुद्दे से संबंधित है। जैसा कि हम सब देख रहे हैं, बहुत से लोग आपका विरोध कर रहे हैं और आपके खिलाफ झूठी चीज़ें फैला रहे हैं। और ये वही समाज है, जिसको आप कीचड़ से बाहर निकालने का काम कर रहे हैं। फिर भी ये सब लोग — या ये पूरा समाज आपके ऊपर कंकड़ फेंक रहा है। आपका इतना विरोध होने के बावज़ूद, हम सब देख रहे हैं कि आपका काम और तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है। हम यही जानना चाहते हैं कि ऐसा क्या है जो आपको ये सब करने के लिए ड्राइव करता है?
आचार्य प्रशांत: एक पुरानी कहानी है — सबने सुनी होगी बचपन में। कई बार तो स्कूलों की किताबों में होती है। एक बार एक राजा ने कहा कि, "जो मेरे राज्य का सबसे मासूम चेहरा है, जाओ उसको खोज के लाओ, और हम उसकी एक छवि बनवाएंगे।" बड़े चित्रकार बुलवाए बोले, "इस चेहरे को यहाँ पर आप चित्रित कर दीजिए, ये सबसे मासूम चेहरा है। कहीं महल की दीवार पर इसकी छवि उकेर दीजिए।" बोले, "अच्छा ठीक है।" तो गए खोजा खूब खोजा, एक बच्चा मिला उन्हें — मासूम। वो सबसे, दुनिया के गुण-दोषों से अभी अछूता था। भीतर-भीतर बीज रहे होंगे, पर बाहर-बाहर अभी उसमें कोई दोष, विकार नहीं आए थे। तो उसे ले आते हैं और उसकी शक्ल का चित्रण कर देते हैं। फिर कई साल बीतते हैं — बीस साल।
राजा का मन, वो बोलता है, "एक ही चीज़ क्यों रखे हुए हैं? — मासूमियत। हमें बर्बरता, क्रूरता, हिंसा को भी दर्शाता एक चेहरा चाहिए। जाओ, खोज कर लाओ — पूरे राज्य में सबसे ज़्यादा विकृत और विभत्स चेहरा कौन-सा है?" फिर खोजने निकलते हैं। तो राज्य में नहीं मिलता, जंगल में मिलता है। वहाँ था एक, उसने तो अपना एक मिशन ही चला रखा था — "कोई अच्छा आदमी मिलेगा, उसी को मारूँगा।" तो उसे पकड़ के ले आते हैं — किसी कदर राजा के सामने पेश करते हैं और कहते हैं, "ये चेहरा है।"
राजा देखता है — बाप रे! ऐसा ख़ौफ़नाक चेहरा! जैसे भीतर इसके हिंसा और नफ़रत और पाप ही पाप भरा हो, इतना अज्ञान! तो राजा कहता है, "बनाओ, इसी का चित्र बनाओ। बिल्कुल सही मॉडल है ये।" तो तभी देखा राजा ने कि वो रो रहा है — टप-टप, टप-टप। बोले, "अरे! इतना खूंखार आदमी और इसके आँसू झड़ रहे हैं! ये क्या हुआ?" पूछते, "क्या है?" बोलता है, "बीस साल पहले भी आपने एक चित्र बनवाया था क्या?"
तो राजा ने कहा, "हाँ।" बोले, "तब आपने एक मासूम चेहरा खोज कर लाने को कहा था?" राजा ने कहा, "हाँ।" तो बोलता है, "वो मासूम बच्चा मैं ही था।" तो ये — आज जो भी हैं, जो तरह-तरह से मेरा रास्ता रोकते हैं, आक्रमण करते हैं, हर तरीक़े की बाधाएँ लाते हैं — ये भी कोई ऐसे पैदा थोड़ी हुए थे, बेटा। ये भी एक दिन मासूम थे। और तुम सोचो — हमारी वो कैसी सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षणिक, धार्मिक प्रक्रिया होगी जो बच्चे को इतना ज़्यादा विकृत कर देती है कि 25, 35, 45 का होते-होते वो एकदम ईविल हो जाता है।
एक छोर तो ये है कि देखो, कि वो पैदा कैसा हुआ था — अतीत का छोर। एक छोर भविष्य का भी है — कि देखो, इसकी संभावना है कि ये अभी भी सुधर सकता है, बेहतर हो सकता है। जिन झंझटों में पड़ गया है, जो व्यर्थ की इसने मान्यताएँ बना ली हैं — ये उनसे आज़ाद हो सकता है। तो ये दोनों ही छोर फिर आपको मजबूर कर देते हैं कि आप काम करते रहिए।
आपके सामने जो है, उसकी हालत ज़रूर ऐसी है कि सिर्फ़ उसको देखोगे — तो लगेगा ये बचाया नहीं जा सकता। मरीज़ की हालत इतनी ख़राब है कि इसको बचा नहीं सकते। इस पर काम करना, मेहनत करना — बेकार है। इस पर काम करो, तो ये तो तुम्हारा ही गला पकड़ता है और गाली देता है। इसी की बेहतरी के लिए, इसी को बचाने के लिए, इसी के घर-परिवार की सलामती के लिए तुम काम कर रहे हो — और ये तुम्हें ही मारने को उतारू है!
तो सिर्फ़ उसको अगर देखोगे तो यही लगेगा कि कोई काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस इंसान के ऊपर मेहनत ज़ाया नहीं करनी चाहिए। लेकिन जब पीछे देखो — तो याद आता है कि एक दिन मासूम था। और आगे देखो — तो दिखाई पड़ता है कि संभावना है कि अगर इसको प्रेम मिल जाए थोड़ा, कोई इसके साथ मेहनत कर ले — तो शायद ये फिर से उसी मासूमियत को पा ले, ये फिर से स्वस्थ हो जाए। तो फिर आप काम करते रहते हो।
लोग जैसे हैं, उनको अगर देखोगे और सोचोगे कि ये ऐसे ही पैदा हुए थे और ऐसे ही मर जाएँगे — तो फिर कभी मन नहीं करेगा उनकी बेहतरी के लिए कुछ भी करने का। पर जब भी किसी को देखो — जिससे बहुत नफ़रत उठती हो — तो पूछना अपने आप से: "क्या हुआ था इसके साथ जो ये इतनी ख़राब हालत में आ गया?" पैदा हुआ था पूरा इंसान बनने के लिए, ये जानवर बन गया। कैसे बन गया? और जिन ताक़तों ने उसको जानवर बनाया — क्या वो ताक़तें सिर्फ़ उस एक इंसान पर काम कर रही हैं? वो ताक़तें हर एक पर काम कर रही हैं। आप पर, हम पर — हम यहाँ जितने लोग बैठे हैं, और जितने लोग बाद में सुनेंगे — वो ताक़तें सब पर काम कर रही हैं। वो ताक़तें सबको जानवर बना देना चाहती हैं।
तो आप अपने सामने अगर एक ऐसे मनुष्य को देखें जो पशुवत हो चुका है, तो ये मत सोचिएगा कि सिर्फ़ एक इंसान का खेल ख़राब हुआ है। ये समझिएगा कि आपको भी उसके जैसा बनाने की पूरी तैयारी चल रही है, और आपको उस तैयारी को नाकामयाब करना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि ये जो सामने वाला है, ये कोई विशेष किस्म का पापी है। एक तरीक़े से तो सहानुभूति रख के, लगभग उसको विक्टिम भी माना जा सकता है — उसके साथ कुछ ग़लत हो गया। मासूम पैदा हुआ था — देखो उसको क्या बना दिया गया। और जो उसको बना दिया गया है — माहौल जैसा है हमारा, ये माहौल चाहता है कि आप भी वैसे ही बन जाएँ।
वो, जिसको हम कह रहे हैं ना कि — “ये गंदे लोग हैं, घृणित लोग हैं, गाली-गलौज करते हैं, अच्छे काम में अड़ंगा डालते हैं, ये सब करते हैं” — वो लोग जैसे हैं, आपको भी वैसा ही बनाने की तैयारियाँ चल रही हैं। और ये तैयारियाँ चलाने वाला कोई एक इंसान नहीं है वो हम सबके भीतर बैठा हुआ अज्ञान है — द कलेक्टिव इग्नोरन्स। वो कलेक्टिव इग्नोरन्स है, जो हर इंसान को जानवर बना देना चाहती है।
तो जानवरों का कोई एक सैंपल, कोई एक नमूना दिख जाए तो उसको ही दोषी मत मान लिया करिए, कि “ये देखो, मिल गया जानवर!” एक माहौल ने उसको जानवर बनाया है और वो जो माहौल है, वो हमें भी जानवर बना देना चाहता है — उसी के जैसा जानवर बना देना चाहता है। वो जैसे वैंपायर्स होते हैं ना — काल्पनिक, फिक्टिशियस — वैंपायर जिसको काट ले, वो भी क्या बन जाता है? वैंपायर बन जाता है। ये वैसा माहौल है, कि एक को ख़राब करो, और ये जो ख़राब हो गया है, अब ये 10 को ख़राब करेगा। एक तरह का चेन रिएक्शन है।
और इस चेन रिएक्शन की पहचान ये है कि — जो ख़राब हो जाते हैं, वो बहुत-बहुत ज़्यादा उत्सुक हो जाते हैं, आग्रही हो जाते हैं औरों को ख़राब करने के लिए, वो खूब प्रचार करते हैं। और जो ख़राब अभी नहीं हुए हैं, वो दूसरों को बचाने की कोई कोशिश नहीं करते हैं। वो सोचते हैं, हमारा नंबर तो कभी आएगा ही नहीं। हम तो बचे हुए हैं। नहीं, तुम बचे नहीं रहोगे। एक दिन एक वैंपायर तुम्हारे घर में भी घुसेगा। एक दिन ये आग तुम्हारे घर में भी लगेगी। तो कोई तो चाहिए ना — जो सामने आए, इलाज करे, मुक़ाबला करे। कोई सामने नहीं आएगा, कोई मुक़ाबला नहीं करेगा तो सब वैसे ही हो जाएँगे।
मैंने एक प्ले करा था — एक्ज़िस्टेंशियल प्ले, यूजीन आयोनेस्को हैं — वो एक्ज़िस्टेंशियलिज़्म के और एब्सर्डिज़्म के जो अग्रणी प्लेराइट्स में से हैं तो उनका है — राइनोसरस। तो आईआईएम में उसको प्ले करा था, एजिंग हुई थी उसकी। तो उसमें एक शहर है, जिसमें सब लोग धीरे-धीरे करके गैंडे बनते जा रहे हैं। थिएटर ऑफ द एब्सर्ड है ये। ये लोग ग़ायब होते जा रहे हैं — और शहर की सड़कों पर राइनोसरस दिखाई देने लग गए हैं। राइनोसरस से क्या आशय है? — जानवर।
तो प्ले दिखाना चाह रहा है कि लोग ग़ायब हो रहे हैं और जानवर बनते जा रहे हैं। और जो ये गैंडे बनते हैं, ये जाकर के किसी तरह से अपने पूरे परिवार को गैंडा बना लेते हैं, और अपने दोस्त-यारों को भी बना लेते हैं। तो लंबा नाटक है — क़रीब ढाई घंटे का। जब वो अपने अंत में पहुँचता है, तो आख़िरी दृश्य उसका इस तरह से है कि — मैं उसका जो केंद्रीय कैरेक्टर था, उसको निभा रहा था, और जो उसकी दोस्त है, उसकी गर्लफ्रेंड है — बस ये दोनों बचे हैं, और बाकी पूरा शहर गैंडा बन गया है।
और ये एक इमारत में हैं — उसकी दूसरी या तीसरी मंज़िल पर हैं और पूरा शहर, गैंडों की एक पूरी फ़ौज नीचे आकर के अब जमा हो गई है। और वो खूब चिल्ला रहे हैं क्योंकि उनको पता है अब दो ही बचे हैं, बस इन्हीं दोनों को अब जानवर बनाना शेष है। तो ये खूब चिल्ला रहे हैं, खूब चिल्ला रहे हैं — और मैं उसका हाथ पकड़ के कहता हूँ, "नहीं, नहीं, नहीं! कुछ भी हो जाए — तुम्हें गैंडा नहीं बनना है।"
एब्सर्ड है, मामला ही एब्सर्ड है — जिसमें बात बहुत ज़्यादा गंभीर भी होती है लेकिन बहुत ज़्यादा मज़ाकिया भी होती है। मैं कह रहा हूँ, "नहीं! तुम्हें नहीं बनना है।" वो बोल रही है, "तुम अपने आप को देखो और गैंडों को देखो! गैंडों में क्या ज़बरदस्त ताक़त है! क्या उनका संगठन है! क्या उनकी एकता है! और क्या उनका संगीत है!" तो वो भी जाकर के कूद जाती है — गैंडों के बीच में और गैंडी बन जाती है। अब वो अकेला बंदा बचता है — अकेला।
और उसका जो आख़िरी स्पीच है — जो मोनोलॉग है — वो यही है: “कुछ हो जाए, इसके बाद क्या होगा मैं नहीं जानता। पर मैं तो इनके जैसा नहीं बनूंगा। मैं जो हूँ, मैं वही रहूँगा, एंड दैट विल बी माय फाइट।” अच्छे-अच्छे लोग हैं पूरे नाटक में मैंने कहा, ढाई घंटे का है — तो उसके अच्छे दोस्त हैं, वो एक जगह काम करता है — उसका बॉस है, कलीग्स हैं, कई लोग हैं। 17 कैरेक्टर्स थे उसमें कुल। ये सब के सब गैंडे बनते दिखाए गए हैं। सब के सब। एक तो बीमार पड़ा है। तो वो सीन ही ऐसा था कि अंधेरे में हो रहा है। वो यहाँ पर बीच में एक बेड डला हुआ है और उसने मुँह इधर को कर रखा है, जो बीमार हो के लेटा है और यहाँ पट्टी बाँध रखी है, और बीमार पड़ा है।
उससे मिलने जाता है। और ऐसे मिलने जाता है, और वो पूछता है — "क्या है? क्या हो गया?" तो बोलता है — "हटो यहाँ से।" बोलता है — "लगता है तुम्हारा गला खराब है। तुम्हारी आवाज़ भारी हो रही है।" फिर उसका हाथ छूता है — "तुम्हारी खाल इतनी मोटी क्यों होती जा रही है? अच्छा, शायद बीमारी की वजह से है।" फिर बोलता है — "अरे, माथे पर पट्टी बाँध रखी है? ये माथे में चोट लगी है? गूमड़ कैसे निकल रहा है?" और जब वो इससे इतना पूछ लेता है, तब वो उठता है पूरा और वो गैंडा बन रहा है।
अच्छे-अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं जो जानवर बनते जा रहे हैं। इन जानवरों से लड़ने का मतलब ये नहीं है कि हम इनको मारना चाहते हैं। मैं अक्सर संघर्ष की भाषा बोलता हूँ। कहता हूँ — संघर्ष करो। इसका मतलब ये नहीं कि हमें इन्हें मार देना है। भूलिए नहीं कि वो जो सबसे खूंखार आदमी था, वो भी एक दिन मासूम बच्चा था। तो भूलिए नहीं कि अभी भी उसको बचाया जा सकता है। और अगर नहीं बचाया गया, तो ऐसा नहीं कि बस एक ज़िन्दगी जाएगी। अगर वो जानवर बना रहा, तो अपने जैसे?
श्रोता: दस और पैदा करेगा।
आचार्य प्रशांत: दस नहीं बेटा, हज़ार, लाख और पैदा करेगा। जानवर होने का मिशन ही यही होता है कि अब मैं सबको जानवर बनाकर मानूँगा। आम आदमी, अच्छा आदमी, भला आदमी, साधु आदमी — बहुत ज़्यादा अपने आप को आमतौर पर प्रेरित नहीं पाता प्रचार करने के लिए। क्योंकि वो अपने एकांत में भी जाकर के चुपचाप, शान्त, आनंद से बैठ सकता है। पर गड़बड़ लोगों में ये प्रवृत्ति ज़्यादा पाई जाती है कि — "मैं गड़बड़ हूँ तो सबको गड़बड़ करके मानूँगा।" तो —
ये जो आदमी गड़बड़ हो गया है, जानवर हो गया है — इसको ठीक करो। नहीं तो ये सबको जानवर बना देगा।
जाओ, उससे एंगेज होओ, उससे बात करो। उसे डाँटो, भले ही, समझाओ — जो भी कर सकते हो। कभी प्यार से बात करनी पड़ेगी, कभी लताड़ना पड़ेगा ज़ोर से। जो भी तुम्हें युक्ति लगानी है, लगाओ। लेकिन उससे जाकर एंगेज होओ, बात करो। क्योंकि अब वो वायरस है, अब वो वायरल होगा। वो ना जाने कितनों तक पहुँचेगा, फैलेगा, सबको खराब करेगा। तुम ये नहीं कह सकते कि — "हम तो अपना दामन बचा कर बैठे रहेंगे अलग, हम तो पाक-साफ़ आदमी हैं, हम गंदे लोगों से जाकर गाली-गलौज थोड़ी करते हैं।" भाई, वो वायरस है, वो फैल रहा है और तुम कह रहे हो कि — "मुझे उससे कोई लेना-देना नहीं।" कब तक बचे रहोगे?
लेकिन जैसा कहा — ये याद रहे कि आप उससे एंगेज करने नफ़रत लेकर नहीं जा रहे। आप उससे एंगेज होने भी जा रहे हो, तो आपको ये याद है कि — ये भी एक दिन मासूम था। और इसकी मासूमियत इसे वापस लौटाई भी जा सकती है। आप बड़ी ज़िम्मेदारी ले, उसके पास जा रहे हो। आ रही है बात समझ में? हमारा नॉन-एंगेजमेंट का विकल्प नहीं है। ये जो हमारे मध्यम वर्ग में चलता है न कि — "हम तो सज्जन आदमी हैं, भले आदमी हैं, हम लफड़ों में नहीं पड़ते।"
मेरे पसंदीदा हैं — धूमिल। बिल्कुल दिल जीत लिया था उन्होंने मेरा जब आपकी उम्र का था। तो बोलते हैं — "जो अपना हाथ मैला होने से डरता है, वो एक नहीं ग्यारह कायरों की मौत मरता है।" और हमारे साथ समस्या ये है कि हमारे साथ ज़्यादातर वही लोग हैं जो अपना हाथ मैला होने से बहुत डरते हैं। वो कहते हैं — "नहीं नहीं नहीं, ये सब पंगेबाज़ी। इसमें हम नहीं पड़ते। ये तो गुंडे हैं, गुंडे। गुंडों से जाकर हम थोड़ी मुँह लगेंगे। और किसी से जाकर कोई बात क्यों करनी? हम अच्छा काम कर रहे हैं। हमें अपना काम करने दो।"
ऐसे नहीं होता बाबा। आप पूरी प्रक्रिया को समझ ही नहीं रहे। क्या चल रहा है? आप उस फेनोमिना को इंटरप्रेट ही नहीं कर पा रहे हो। आप बहुत मूर्खता की बात कर रहे हो कि — "उन्हें उनका काम करने दो, हम अपना काम करेंगे।" ये वैसी ही बात है कि — "वायरस को वायरस का काम करने दो, हम अपना काम करेंगे।" भाई, वायरस का काम ही यही है कि वो तुम्हें तुम्हारे काम से रोक दे। वायरस के पास और कोई काम है ही नहीं। और वो घुसेगा तुम्हारे शरीर और व्यवस्था के भीतर। तुम जाकर उससे बात नहीं करोगे अगर तो।
विचार करिएगा, कैसे हो जाता है कि एक छोटा-सा, मासूम-सा बच्चा या बच्ची पैदा होता है, और हम बिल्कुल उसको पाप-मूर्ति बना देते हैं? सोचिए, कैसे होता होगा? कितने गंदे तरह के प्रभावों से हम उसको गुज़ारते हैं! और फिर जब वो बिल्कुल पाप का पुतला बन जाए — एविल पर्सनिफाइड — तो हम कहते हैं, "इसको मार दो।" उसको वैसा बनाया किसने है? हाँ, मैं जानता हूँ — बिल्कुल चॉइस होती है। लेकिन मैं ये भी जानता हूँ कि माहौल का भी असर होता है।
**ये भी हमारे पास विकल्प होता है कि हमारे ऊपर जो माहौल का असर है, उसको स्वीकार करें कि नहीं करें।
लेकिन आम आदमी इतना ताक़तवर नहीं होता, ना इतना समझदार, कि वो जान पाए कि उसका माहौल क्या खेल, खेल रहा है उसके साथ। उसे किस रंग में रंग रहा है। तो आम आदमी बेचारा अपनी बेहोशी में ही माहौल का शिकार बन जाता है।
जो लोग आते हैं, मुझे, मेरे काम को उल्टा-सीधा बोलते हैं, उनके पास कुछ मान्यताएँ हैं। मैं आपसे पूछ रहा हूँ — बताइए, क्या वो लोग उन मान्यताओं के साथ पैदा हुए थे? उनके पास एक बिलीफ़ सिस्टम है। वो बिलीफ़ सिस्टम क्या उन्हें गर्भ में ही मिल गया था? एक माहौल है, जो बच्चे के मन में फिर जब वो बड़ा हो रहा होता है — उस समय, उसके मन में मान्यताएँ बैठा देता है। और कह देता है — "ये मान्यताएँ हैं, इन्हीं मान्यताओं को सच मानना है।" मान्यता माने — बिलीफ़। इसको सच मानना। और कोई इन मान्यताओं के खिलाफ जाए, तो उस पर आक्रमण कर देना।
वो प्रक्रिया बस उस एक इंसान के साथ नहीं हो रही है, जिसको आज हम एविल बोल देते हैं। वो प्रक्रिया हम सबके साथ चल रही है। और जितने बेख़बर हैं — सब मरेंगे। "गाफ़िल गोता खाएगा" — ज्ञानीयों ने कहा है। जितने लोग सोच रहे हैं कि — "ये मेरे साथ नहीं हो सकता" या "ये मेरे घर में नहीं हो सकता", सबके घरों में हो रहा है। और आपको पता लगते-लगते बहुत देर हो चुकी होगी। ये कोई पर्सन-टू-पर्सन क्वैरल नहीं है। ये दो प्रिंसिपल्स हैं, जो ईटर्नली — सदा से एक-दूसरे से टकराते रहे हैं। एक को कहते हैं — सत्य, और एक को कहते हैं — माया। एक को कहते हैं — तथ्य, और एक को कहते हैं — मान्यता। और ये दोनों कभी साथ-साथ चल नहीं सकते। तो इन दोनों में संघर्ष लाज़मी है।
बस एक चीज़ का ख़्याल रखिएगा — किसी विद्वान ने कहा है: "द डेंजर इन फाइटिंग मॉन्स्टर्स इज़ दैट यू योरसेल्फ माइट बिकम अ मॉन्स्टर।" (राक्षसों से लड़ने का ख़तरा यह है कि आप स्वयं ही राक्षस बन सकते हैं)। तो मॉन्स्टर से लड़ने जाएँ, तो ये मत कर लीजिएगा कि आप भी मॉन्स्टर बन जाएँ। हमारा उद्देश्य सिर्फ़ किसी को आहत करना नहीं हो सकता। हाँ, कई बार डाँटना पड़ता है — डाँटेंगे भी। पर उस डाँट के पीछे भी सद्भावना होनी चाहिए। मंशा यही होनी चाहिए, कि किसी तरह ये सुधर जाए और सुधरे नहीं भी, तो कम से कम इसका ज़हर कुछ कम हो जाए।
सोचो, कितना खूबसूरत दिन होगा कि जिस दिन कोई अंगुलिमाल बौद्ध भिक्षु बन जाए! हमें वो दिन क्यों नहीं चाहिए? क्यों कहें कि — “गर्दन काटनी है अंगुलिमाल की?” हम क्यों न चाहें कि कोई डाकू रत्नाकर, ऋषि वाल्मीकि बन जाए? हम वो दिन क्यों न माँगें? और ये कहते हुए मुझे बिल्कुल पता है कि एक पॉइंट ऑफ नो रिटर्न होता है। बहुत लोग इतनी दूर चले गए होते हैं कि उनको वापस लाना बहुत मुश्किल होता है। स्वयं श्री कृष्ण के लिए संभव नहीं था कि शकुनि और दुर्योधन को सुधार दें। तो उनका संहार ही करना पड़ा। लेकिन संहार आखिरी विकल्प होना चाहिए। श्री कृष्ण ने भी पहले संधि का प्रयास किया था। तो मंशा यही होनी चाहिए कि — "समझाऊँ, सुधारूँ और जब दिखाई दे कि नहीं सुधर रहा, तब देखेंगे क्या करना है।"