
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा एक कॉलेज का जूनियर है, जिससे जब भी बात होती है तो रिलिजन का टॉपिक हमेशा निकल के आता है। और जैसे ही रिलिजन का टॉपिक आता है, धर्म का टॉपिक आता है, तो वो छिटक जाता है। वो कहता है कि इसमें कट्टरता है, अप्रेशन है, कास्टिज़्म, हिंसा सब वॉर हो रही है रिलिजन के नाम पर, तो ये किसी काम का नहीं है।
और यही सेम सेंटिमेंट मैंने आज के जेन ज़ी में भी देखा है, जेन ज़ी भी भागना चाह रहा है रिलिजन से। उसने ऐसा डिस्टॉर्टेड रूप देख लिया रिलिजन का कि वो रिलिजन को बिल्कुल भी ऐक्सेप्ट नहीं करना चाहता। तो ऐसे में मुझे समझ नहीं आता कि मुझे उनसे क्या बोलना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: तुमने अभी जो सवाल में बोला, यही बात उनसे बोलनी चाहिए ना। आपने जो बोला, वो आप बोल रहे हो जेन ज़ी, वो नहीं बोलता। आप कह रहे हो कि उन लोगों ने रिलिजन का डिस्टॉर्टेड रूप देख लिया है, इसलिए वो रिलिजन से भाग रहे हैं। वो ये थोड़ी मान रहे हैं कि उन्होंने रिलिजन का डिस्टॉर्टेड रूप देखा है। वो तो कह रहे हैं रिलिजन का यही असली रूप है।
अगर मुझे कोई चीज़ मिले और वो बुरी दिखती हो, लेकिन साथ ही मुझे ये भी पता हो कि मुझे जो उसका रूप दिख रहा है, वो विकृत है माने डिस्टॉर्टेड है, तो क्या मैं उस चीज़ से भागूँगा? मैं कहूँगा ये चीज़ ऐसी नहीं है। मुझे अभी जो रूप दिख रहा है किसी वजह से वो डिस्टॉर्टेड है, बिगड़ा हुआ है, टूटा हुआ है, विकृत है। तो मैं नहीं भागूँगा या भागूँगा? भागूँगा क्या?
सड़ी हुई मैगी तुम्हारे सामने आ जाए तो क्या तुम मैगी से ही भाग जाते हो? जेन ज़ी की बात हो रही है इसलिए, उनमें से बहुत सारे हैं जो हफ़्ते में पाँच दिन मैगी पर ही पलते हैं। मैगी सड़ गई तो क्या अगले दिन से मैगी नहीं खाते? बोलते हो, सड़ी मैगी नहीं चाहिए असली मैगी चाहिए। यही बोलते हो ना? ये थोड़ी कहते हो कि मैगी ही नहीं चाहिए। सड़ी मैगी दे दी किसी ने, तो क्या बोलते हो कि मैगी ही नहीं चाहिए? कहते हो, सड़ी नहीं चाहिए। फटी शर्ट किसी ने दे दी तो क्या कहते हो, कि आज से शर्ट ही नहीं पहनूँगा? कहते हो, फटी शर्ट नहीं चाहिए बढ़िया शर्ट चाहिए। है ना?
लेकिन जब बात धर्म की आती है तो इन बेचारों को पता ही नहीं है कि इनको जो धर्म दिया जा रहा है, वो सड़ी मैगी और फटी शर्ट है। इनको लगता है कि ये जो इनको धर्म दिया जा रहा है, जो कि सचमुच सड़ा और फटा हुआ है, इनको लगता है धर्म होता ही ऐसा है। इनको लगता है यही धर्म है, तो फिर ये कह देते हैं कि हमें धर्म ही नहीं चाहिए। कारण सीधा है, बिना फटी शर्ट इन्होंने देखी है और बिना सड़ी मैगी भी इन्होंने चखी है। इनको उसका अनुभव रहा है, है ना?
तो जब सड़ी मैगी आती है तो इनको पता है, ये असली चीज़ नहीं है। असली चीज़ दूसरी है। वो दूसरी असली जो चीज़ है वो कहीं और है, हमने उसको पहले अनुभव करा हुआ है। फटी शर्ट आती है तो कहते हैं, हाँ ये फटी शर्ट है पर बढ़िया शर्ट भी हो सकती है। बढ़िया शर्ट हमने पहनी है पहले। तो ये मैगी मात्र को या शर्ट मात्र को नहीं त्याग देते फिर। फिर ये कहते हैं कि मैगी ठीक वाली लाओ, शर्ट ठीक वाली लाओ।
पर जब धर्म इनको परोसा जाता है तो ये, ये नहीं कहते कि धर्म ठीक वाला लाओ, ये कहते हैं — धर्म ही गड़बड़ चीज़ है। इसमें कुछ स्थितियों का खेल है और कुछ इनका निकम्मापन, जेन ज़ी का। स्थितियों का खेल ये है कि धर्म इतना बर्बाद कर दिया गया, इतना बर्बाद कर दिया गया कि चारों तरफ़ बस जो धर्म का गिरे से गिरा, सड़े से सड़ा, फटे से फटा रूप हो सकता है, इस बेचारी जेनेरेशन ने वही देखा है।
जेन ज़ी माने जो अधिक से अधिक आज कितने साल का है? कहाँ से होती है जेन ज़ी शुरू?
श्रोता: 1997
आचार्य प्रशांत: सन् 97 से, पक्का है? तो माने जो जेन ज़ी का होगा, आज वो अधिक से अधिक 28 साल का होगा।
अब जो 28 साल का होता है, उसको समझने-बूझने की शक्ति ही मान लो 8-10 साल में आती है एक आम बच्चे को। 28 का है अधिक से अधिक, वो तो माने 8 साल में सोचना-बूझना शुरू किया। माने पिछले 20 साल में, 28-8 = 20 साल। पिछले 20 साल में उसने भारत में धर्म के नाम पर जितनी बेहूदगी और गंदगी देखी है, तो उसको लगता है कि यही तो है धर्म और मुझे ये चाहिए नहीं। वो किसी को भी नहीं चाहिए होगा, धर्म का जो रूप हमें अभी देखने को मिला है भारत में, पूरी दुनिया में। अभी ये जो लड़ाई चल रही है ईरान, इज़राइल, ये सब क्या है? ये क्या धर्म से संबंधित नहीं है?
तो माफ़ करा जा सकता है कि इन बेचारों को कभी धर्म का कोई साफ़ रूप देखने को ही नहीं मिला। इनको तो धर्म के नाम पर सबसे गंदी, सबसे मलिन, सबसे जो जलील चीज़ें हो सकती हैं, वही देखने को मिली हैं। इन्होंने अच्छे-अच्छे लोगों को धार्मिक बनकर बर्बाद होते देखा है। अच्छा-ख़ासा आदमी, और वो तथाकथित धर्म, यानी लोकधर्म की चपेट में आ गया। उन्होंने देखा है कि वो अब झूठा भी बन गया, खुल के झूठ बोलता है, हिंसक भी बन गया, ईर्ष्यालु भी बन गया और डरपोक भी बन गया। सब कुछ एक साथ हो गया वो। और जब तक वो बल्कि कुछ कम धार्मिक था, तब तक वो ठीक-ठाक था।
पर धार्मिक बनते ही इन्होंने लोगों को बर्बाद होते देखा है, और इन्होंने देखा है कि लोगों को धार्मिक बनाने के लिए किस-किस तरीक़े की चालाकियाँ करी जा सकती हैं। तो उन्होंने जहाँ देखा है, नकली धर्म ही देखा है। मैं कह रहा हूँ, इनकी माफ़ी है, पर पूरी माफ़ी नहीं है। क्योंकि बाहर तुम्हें स्थितियाँ कुछ भी दिखा रही हों, तुम जवान आदमी हो। जेनेरेशन ज़ी या ज़ेड अपने आप को बोलते हो, तुम्हारे भीतर एक धड़कता हुआ दिल तो है ना? जवान हो यार।
तुम्हें ज़िंदगी में ऊँचाइयाँ नहीं चाहिए क्या? झूठ से संतुष्ट हो तुम? सच जैसी कोई चीज़ होती है, उसके लिए तड़पते नहीं तुम? डिज़ायर्स, कामनाएँ तो तुम जानते ही हो। प्रेम नहीं जानते तुम? इश्क़ के बिना ही जवान हो गए?
बाहर तुमको कितनी भी गंदगी परोसी गई हो, धर्म के कितने भी विकृत संस्करण दिखाए गए हों, तब भी तुमसे ये सवाल तो पूछा ही जाएगा ना। बाहर वालों ने जो दिखाया तो दिखाया, तुम्हारे भीतर सच्चाई जानने की कोई तड़प ख़ुद नहीं थी क्या? दुनिया जो दिखा रही, सो दिखा रही है, तुम्हारा भी तो एक अंतस है ना। तुम भी तो एक सजग चेतना हो। तुमने ख़ुद क्यों नहीं कुछ जानने की कोशिश करी? धर्म का तुम्हें एक रूप दिखाया गया, तुमने क्यों स्वीकार कर लिया वो रूप? तुमने गहरी जाँच-पड़ताल क्यों नहीं करी? तुमने सवाल क्यों नहीं पूछे? बोलो? और सवाल पूछे जा सकते हैं।
हम आईआईटी में थे, वहीं बगल में जियासराय। वही जिस समय जो पैदा होते हैं और जेन ज़ी कहलाते हैं, उसी समय के आसपास की घटना है। ये चला था कि कहा गया था, कि गणेश जी की मूर्तियाँ दूध पी रही हैं। तो वहीं आईआईटी से ही सटी हुई है, जियासराय। तो वहाँ भी एक छोटा-सा गणेश मंदिर था, लोग वहाँ जाया करते थे। तो वहाँ भी सुबह-सुबह शोर मचा कि ये सब चल रहा है। तो हम लोग भी देखने गए, और वहाँ देख रहे हैं, और ये दिखाई दे रहा है कि क्या हो रहा है।
तो हम जितने भी स्टूडेंट्स देखने गए थे, सबने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, कैपिलरी मोशन। क्या? कैपिलरी मोशन। 5-7 मिनट देखा, वापस आ गए। 5-7 मिनट में भी वो जो फिज़िकल फिनॉमिना चल रहा था कि लोग आ रहे थे और ऐसे वहाँ पर दूध दिखा रहे थे, और वो जो दूध था उसका जो स्तर था, वो थोड़ा सा कम हो जा रहा था। वो तो एक मिनट ही देखा, क्योंकि उसको देखते ही समझ गए क्या हो रहा है। बाक़ी 5-10 मिनट बस लोगों की शक्लें देखीं, लोगों के हावभाव, लोगों के तरीक़े, लोगों की धारणाएँ, लोगों का अंधविश्वास। वापस आ गए।
कोई ज़रूरी थोड़ी है कि दुनिया जो चीज़ मान रही है, वो तुम भी मानो। दुनिया ने तुम्हें धर्म का एक बिगड़ा हुआ रूप दिखाया, तुमने माना क्यों? तुम्हें क्यों लगा कि धर्म तो सचमुच गए-गुज़रे और पिछड़ों की चीज़ होती है? तुमने ऐसा क्यों मान लिया? तुम्हारी अपनी चेतना कहाँ गई? बोलो? और भारत में तो साक्षरता बढ़ती ही जा रही है। पढ़े-लिखे लोग हो तुम लोग, और इंटरनेट की दुनिया के बाशिंदे हो तुम तो। असली धार्मिक ग्रंथ तुम ख़ुद क्यों नहीं पढ़ पाए कभी?
तुम जो प्रचलित मान्यताएँ हैं, उनको ही धर्म मानकर क्यों बैठे रह गए? क्यों गीता ख़ुद नहीं पढ़ ली? क्यों नहीं पढ़ ली? और तुम्हें जो आमतौर पर श्लोकों के अनुवाद और भाष्य चलते हैं, उनको भी मानने की कोई ज़रूरत नहीं। क्योंकि तुम लोग तो अपने आप को एक इन्क्विज़िटिव जेनेरेशन बोलते हो, जो आसानी से किसी की बात मानती नहीं। फिर जो तुम्हें धर्म की परिभाषा बताई गई, वो भी तुमने क्यों मान ली?
श्लोक तुमने ख़ुद तो कभी पढ़े ही नहीं। और अगर कभी पढ़े भी, तो उन श्लोकों के जो अर्थ वहाँ लिखे हुए थे, वो तुमने क्यों मान लिए? तुमने ख़ुद क्यों नहीं कहा कि, “संस्कृत ही तो है, एक-एक शब्द लेके उसका अर्थ करके समझ लेंगे कि क्या कहा जा रहा है।” ख़ुद क्यों नहीं श्लोकों के अर्थ करके समझे?
कोई माफ़ी है इस बात की?
और वही अर्थ जब तुमने समझे, तो तुमको एक ज़बरदस्त रोशनी दिखाई दी कि नहीं? दसियों हज़ार हमारे गीता कार्यक्रम में इसी जेनेरेशन के लड़के-लड़कियाँ, युवक-युवतियाँ हैं। जो 28 साल से नीचे के हैं, बीसों-चालीसों हज़ार। कौन कहता है कि धर्म पहली बात बूढों के लिए, और दूसरी बात कि धर्म सिर्फ़ पाखंडियों के लिए है? कौन कहता है?
हम जो गीता का अर्थ आपके सामने ला रहे हैं, वो क्यों आपको अच्छा लगने लग गया? बल्कि अब तो ये बात खूब फैल रही है कि, जवान लोग ही ज़्यादा आते हैं गीता पढ़ने के लिए। ये दो विरोधाभासी बातें कैसी हुईं? एक ओर तो जेन ज़ी वो जो धर्म से छिटक कर दूर भागती है, और दूसरी ओर अब हमारा गीता कार्यक्रम चल रहा है। हम गीता पढ़ रहे हैं, उपनिषद् पढ़ रहे हैं, हम मध्यकाल की संतवाणी पढ़ रहे हैं, हम बौद्ध ग्रंथ पढ़ रहे हैं, हम चीनी दाओवाद पढ़ रहे हैं, अष्टावक्र गीता पढ़ रहे हैं।
हमारे पास ज़्यादातर अभी युवक ही आ रहे हैं। ये विरोधाभास कैसे कि एक ओर तो आपने ये माहौल बना रखा है कि "अरे जवान आदमी है, इसका रिलिजन से क्या लेना-देना? ये तो अपना मटेरियलिज़्म में पड़ा रहता है, और रिलिजन से तो बिल्कुल ये कन्नी काटता है।"
दूसरी ओर, हम जब पढ़ा रहे हैं, तो दो-चार दर्जन नहीं, दो-चार सौ नहीं, दो-चार हज़ार नहीं — पचासों हज़ार यहाँ पर जवान लोग ही बैठे हुए हैं और वो धर्म ही पढ़ रहे हैं। ये कैसे हो गया? और मौज में पढ़ रहे हैं, और प्रदीप्त हो रहे हैं, और ये बाहर निकलकर के कल पूरे भारत को और फिर पूरे संसार को रोशन करेंगे। ये कैसे हो गया? बोलो न?
निकम्मापन, मैंने कहा था, 'आलस!' धर्म माने बस वही जो घर में दादी को करते देखा और मोहल्ले में बाबा जी को करते देखा। आलस, ख़ुद क्यों नहीं इन्क्वायरी करी? ख़ुद क्यों नहीं किताबें पढ़ीं? और इंटरनेट के युग में भी अगर तुम कहो कि मुझे धार्मिक साहित्य उपलब्ध नहीं था, तो झूठ बोल रहे हो न तुम? झूठ बोल रहे हो न?
धार्मिक साहित्य कोई विश्वास करने की चीज़ नहीं होती है। धर्म का आधार दर्शन होता है।
रॉक सॉलिड फिलॉसफ़ी! फिलॉसफ़ी पढ़े बिना तुम सचमुच एक पूरे इंसान, एक तगड़े जवान बन कैसे जाओगे? और दर्शन उपलब्ध है। फिलॉसफ़ी उपलब्ध है, विज़डम लिटरेचर उपलब्ध है। वो पढ़ा क्यों नहीं तुमने?
मैं जानता हूँ कि जिस चीज़ को बचपन से ही बड़े सड़े हुए रूप में दिखाया गया हो, उसको पढ़ने की तबीयत ही नहीं करती। घिन सी आने लग जाती है। और बहुत-बहुत सारे युवा हैं वो आकर कहते हैं, "धर्म के नाम से हमें घिन आती है।" कहते हैं, "हमने इतनी-इतनी बदतमीज़ियाँ देखी हैं धर्म के नाम पर, कि हमें धर्म के नाम से ही नफ़रत हो गई है।"
आपको मालूम है? दुनिया भर में जो लोग अब अपने आप को एथीस्ट या एग्नॉस्टिक बोलते हैं, उनकी संख्या बढ़ती जा रही है, बढ़ती जा रही है, बढ़ती जा रही है। ब्रिटेन की आबादी में वो सबसे बड़े हो गए हैं। ईसाइयों से ज़्यादा वहाँ पर वो हैं जो अपने आप को कहते हैं कि "हम एथीस्ट या एग्नॉस्टिक हैं।" ईसाइयों से ज़्यादा हैं, और यही हाल जापान का भी है। यही हाल वेस्टर्न यूरोप के बाक़ी देशों का भी है।
क्यों बढ़ती जा रही है?
क्योंकि धर्म का मतलब ही हो गया है "धारणा।" धर्म का मतलब ही हो गया "विश्वास।" और नई पीढ़ी विश्वास करने से इंकार करती है। वो कहती है, "हम नहीं मानते विश्वास, हमें नहीं चलना मान्यता पर, हम नहीं मानते ये सब। कोई ठोस चीज़ हो तो दिखाओ, समझा सकते हो तो समझाओ।" कह रहे हो, "आँख मूंदकर के मान लो" तो हम आँख मूंदकर मानने वाले नहीं।
इसीलिए अब पूरी दुनिया में इसको कह रहे हैं, ये जो पूरा युग आ रहा है इसको कहा जा रहा है "पोस्ट-ट्रुथ, पोस्ट-रिलिजन एज।" धीरे-धीरे अब ये बिल्कुल एक काल की लहर है जो रोकी नहीं जा सकती, कि धर्म मात्र विलुप्त हो जाएगा। क्यों विलुप्त हो जाएगा? क्योंकि धर्म का मतलब ही बन गया है धारणा और अंधविश्वास। जब तक धर्म का अर्थ रहेगा, धारणा और अंधविश्वास, धर्म समाप्त होकर रहेगा।
कौन सा धर्म बचा रहेगा?
वो धर्म बचा रहेगा, जो आपके गीता समागम में आपको मिल रहा है। धर्म को बचाने का काम हम कर रहे हैं। बाक़ी जो कुछ आप धर्म के नाम पर चलता देख रहे हो न, ये बस अब दो-चार दशकों का मेहमान है। ये अपने आप मिट जाना है। नई पीढ़ी ने इस पुराने धर्म को मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया है।
पर हाँ, वास्तविक धर्म बचा रहेगा, क्योंकि वो तो मनुष्य के अंतस की पुकार है। उसको कौन मिटा सकता है, वास्तविक धर्म बचा रहेगा।
हम जो काम कर रहे हैं, इसीलिए वो फ्यूचरिस्टिक है। ये वो धर्म है जो बचा रहेगा। और यही वो धर्म है एकमात्र, जेन ज़ी और उसके बाद की भी जो जेनेरेशन आ रही है अल्फ़ा, बीटा। यही वो एकमात्र धर्म है, जिसका वो पालन कर पाएँगे।
देखो, एआई के युग में फैंटेसीज़ नहीं चलने वालीं, फिज़ूल कहानियाँ नहीं चलने वालीं। जिसको आपने आज तक लोकधर्म के रूप में जाना है न — विज्ञान, विशेषकर एआई, इसको पूरी तरह समाप्त कर रहे हैं और बहुत तेजी से समाप्त कर रहा है। और ये अच्छा है कि समाप्त हो जाए। ये फिज़ूल धर्म जब मिटेगा, तभी तो वास्तविक धर्म उठेगा न।
बुद्ध के समय में भी बहुत सारी नालायकियाँ आ गई थीं। तो उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि धर्म मात्र को समाप्त होना चाहिए। उन्होंने कहा, "वास्तविक धर्म बहुत ज़रूरी है। धर्म के बिना इंसान जी नहीं सकता।" उन्होंने कहा, जो वास्तविक धर्म है, वो बता रहा हूँ — "एस धम्मो सनन्तनो।" उन्होंने कहा, "ये सनातन धर्म है।"
वास्तविक धर्म को कौन मिटा सकता है? जो नकली है, लेकिन उसे कोई बचा भी नहीं सकता। आज आप जो धर्म के क्षेत्र में और ज़्यादा गिरावट देख रहे हो न, वो बस बुझते हुए दीये की आख़िरी फड़फड़ाहट है। इनको दिखाई दे रहा है कि नौजवान पीढ़ी इनकी छद्म धार्मिकता के हाथ से निकल गई, फिसल गई। तो प्रतिक्रियावश ये लोग धर्म को और ज़्यादा, धर्म माने नकली धर्म, उसको और ज़्यादा आक्रामक होके प्रमोट कर रहे हैं। एकदम हर तरीक़े से उसमें रुपया, पैसा लगा रहे हैं। पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, नए-नए बाबाओं को ला रहे हैं। वो समझो क्या है? मैक्रो पर्सपेक्टिव क्या है, वो समझो।
बात ये है कि नई पीढ़ी हाथ से निकल रही है, ख़ासकर लड़कियाँ हाथ से निकल रही हैं। तो फिर पुरानी मान्यताओं को किसी तरह बचाने के लिए, एक रिऐक्शन के तौर पर बाबा जी खड़े किए जा रहे हैं, जो कि बार-बार यही बोल रहे हैं कि, "नहीं-नहीं-नहीं, पुराने संस्कारों पर चलो। पुराने संस्कारों पर चलो।"
ये वास्तविक धर्म तो सामने लाना ही नहीं चाहते। इनसे पूछो — उपनिषद्? कुछ नहीं बोलेंगे। इनसे पूछो — दर्शन, फिलॉसफ़ी, एपिस्टेमोलॉजी? ये कुछ नहीं बोलेंगे। इनके लिए धर्म का मतलब है, कि देखो तमीज़ से रहो, संस्कार से रहो, इसके पाँव छुओ, उसकी बात मानो, पति के तेल लगाया करो, ये है धर्म। इस धर्म को कौन-सी आज की लड़की मानेगी? और क्यों माने?
धर्म तो मुक्ति का वाहक होता है। तुमने क्या बना दिया है धर्म को? और कर लो तुम्हें जितना उपद्रव करना है, काल स्वयं ही तुम्हारे नकली धर्म को खाए जा रहा है। तुम नहीं बचा सकते। और ये तुम भी जानते हो खाए जा रहा है। इसीलिए तुम रिऐक्शन करके और ज़ोर से उसे बचाने का प्रयास कर रहे हो। वही न जो अभी कहा, कि बुझने से पहले की फड़फड़ाहट है ये। ऐट मोस्ट यू विल डिले द इनएविटेबल। यू कैनॉट स्टॉप इट।
तथ्य, सत्य का द्वार होते हैं। और तथ्य उतनी आसानी से और उतने एकीकृत रूप में इंटीग्रेटेड, यूनिफ़ाइड रूप में, और अर्थपूर्ण रूप में, मीनिंगफुल रूप में कभी उपलब्ध नहीं थे जितने आज एआई युग में हैं।
जेन ज़ी को तो बस गूगल ही मिला था। जो अगली जेनेरेशन है, उसको तो चैटजीपीटी, जेमिनी, कोपायलट, ग्रोक। कैसे रोक लोगे तुम उनको? एक के बाद एक डीपसीक चीनियों का, मेटा अपना एलएलएएमए ले खड़ा हो गया है। और ये आपस में जितनी प्रतिद्वंद्विता करेंगे, उतना ये और ज़्यादा इन्फ़ॉर्मेशन को, माने तथ्यों को अर्थपूर्ण रूप से आप तक पहुँचाएँगे। क्लॉड, एंथ्रॉपिक।
और तुम कह रहे हो कि नहीं, जो वो पुरानी मान्यता है उसको मानो। वो मान्यता को डालेंगे वो कि क्या चल रहा था, क्या नहीं चल रहा था, क्या हुआ, कैसे वो सारी बात निकल के आ जाएगी। एक-एक बात निकल के सामने आ ही जा रही है। तुम कहोगे कि ये फलानी परंपरा तो ऊपर वाले ने बनाई है। उनको सब उपलब्ध हो जाएगा। वो बस ये डालेंगे कि ये जो रिचुअल है, ट्रेडिशन है, ये कैसे शुरू हुई? और तुम्हारा सारा भेद खुल जाएगा। एकदम पोल खुल जाएगी। बताओ तुम कैसे उनको अपने छद्म धर्म में बाँध कर रखोगे? बताओ?
इसीलिए तुम बार-बार बोला करते हो, जो अब बात होती है न लोकधर्म को बचाने की जो बाबा लोग निकल के आते हैं, वो बोलते हैं, "लड़कियों के हाथ में मोबाइल मत पड़ने देना।" वजह समझो। उनके हाथ में मोबाइल पड़ गया तो पोल खुल जाएगी। वो कहते ये हैं कि "मोबाइल आ जाता है तो लड़कों से बात करना शुरू कर देती हैं।" वो भी होता है। पर जो ज़्यादा उनके लिए ख़तरे की बात ये है, कि वो गूगल करना शुरू कर देती हैं।
हम जिस युग में चल रहे हैं न, इसको पोस्ट-रिलिजन एज कहा जा रहा है। रिलिजन इतिहास की चीज़ हो गया, वो बीत गया। और आपकी संस्था मेरे माध्यम से आप तक जो ला रही है, वो एकदम नया धर्म है क्योंकि वो सबसे पुराना धर्म है। ऐब्सोल्युटली फ्रेश बिकॉज़ टाइमलेस।
ये जो मनुष्य की कल्पना का धर्म था इधर-उधर की मान्यता, परंपरा, किस्सा, कहानी वाला, ये बीत गया। पूरी दुनिया में इसकी विदाई हो रही है। भारत में भी इसकी विदाई को तुम कब तक टाल लोगे?
हाँ, वेदांत नहीं बीतेगा। उपनिषद् नहीं बीतेंगे। संतों की वाणी में अगर अमृत है, वास्तविक संत (ये जो आसपास आजकल घूम रहे हैं, ये नहीं संत हैं), तो वो अमृत कभी पुराना नहीं हो जाता। क्यों? क्योंकि मनुष्य के जीवन की, मनुष्य के अंतस की जो केंद्रीय स्थिति और समस्याएँ हैं वो तो हज़ार साल पहले जो थीं, आज भी वही हैं, और आगे भी वही रहेंगी। तो इसलिए, वास्तविक धर्म कभी पुराना नहीं होता। वास्तविक जीवन दर्शन भी कभी पुराना नहीं होता।
लेकिन जो भी चीज़ें काल-सापेक्ष हैं, मतलब टाइम-डिपेंडेंट हैं, एरा-डिपेंडेंट हैं वो चीज़ें तो जल्दी से इतिहास बन जाती हैं। दुनिया जिस चीज़ को धर्म के नाम पर चला रही है न, उस चीज़ की जगह म्यूज़ियम में है। मंदिर-मस्जिद में नहीं है।
पूरी दुनिया में जो चीज़ चल रही है धर्म के नाम पर, उसको भेजो म्यूज़ियम में। पुरातत्व वालों के पास और अजायबघरों में, पुराने संग्रहालयों में "कि ये देखो, ये पहले ऐसे चला करता था।" उस चीज़ को दोबारा लाने की कोशिश मत करो। और दोबारा लाने की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि तुम्हारे पास पहले से ही जो टाइमलेस, कालातीत, अकाल बात है वो मौजूद है। हाँ, तुम्हें उस बात को नई ज़ुबान में, नए लोगों तक पहुँचाना होगा। तुम्हें उस पुरानी बात को आज की नई चुनौतियों से जोड़कर बताना होगा। तुम्हें बताना होगा कि आज की जो चुनौती है — क्लाइमेट क्राइसिस, क्या कहते हैं उपनिषद् कि उस क्राइसिस का समाधान हो सके।
उस कालातीत सत्य को तुम्हें वर्तमान चुनौतियों से जोड़कर प्रस्तुत करना होगा। नए सत्य का आविष्कार करने की कोई ज़रूरत नहीं है, कोई नया सत्य नहीं होता। लेकिन वर्तमान में और कालातीत टाइमलेस, ट्रांसेंडेंटल उसमें पुल बनाना पड़ता है। वो आज के शिक्षक का काम होना चाहिए। आज की समस्या क्या है? उदाहरण के लिए, मेंटल एपिडेमिक, मेंटल हेल्थ। कैसे दर्शन की बात को मेंटल हेल्थ के लिए सामने लाया जाए?
आज की और क्या समस्या है? बायोडायवर्सिटी लॉस। प्रकृति चीज़ क्या है, और जीव से प्रकृति का रिश्ता क्या है? कैसे इसको आज की पीढ़ी को समझाया जाए? वास्तविक केंद्रीय ग्रंथों का इस्तेमाल करके। ये आज के शिक्षक का उद्देश्य होना चाहिए। लोनलीनेस, से आज हम मरे जा रहे हैं। क्योंकि पहले तो ज़्यादातर कबीलाई और कृषि संबंधी कारणों से संयुक्त परिवार चलता था। उसके भी कारण जो थे, वो आर्थिक थे ज़्यादा। अब आज चूँकि अर्थव्यवस्था बदल गई है, तो संयुक्त परिवार की उतनी कोई ज़रूरत नहीं रह गई है। तो पहले छोटे हुए परिवार, और उनके बाद अब समाज और एक गति ले के आगे बढ़ा है। तो ऐसा भी होता है कि एक जोड़ा बना है। जोड़े में भी दो लोग हैं, वो अकेले-अकेले अलग-अलग रहते हैं।
भारत के भीतर कई भारत हैं। भारत में ही एक बहुत बड़ा वर्ग, जो आपको पता भी नहीं चलेगा पर वो आप पाओगे मेट्रोज़ में है। और ज़्यादातर वो बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं और ऊँचा कमाने वाले लोग हैं। वो बिल्कुल एक अलग तरीक़े से ज़िंदगी जी रहे हैं। मैं उसकी प्रशंसा नहीं कर रहा, बस बता रहा हूँ कि भारत में भी कई भारत हैं।
तो अब एक नई विकराल समस्या निकल के आती है — लोनलीनेस, अकेलापन। वास्तविक धर्म वो है, जो आपके इस अकेलेपन की समस्या का समाधान कर दे। और मैं बिल्कुल कह रहा हूँ कि वास्तविक धर्म के पास अकेलेपन की समस्या का समाधान है। और सिर्फ़ धर्म ही इस अकेलेपन की समस्या का समाधान कर सकता है। और इसलिए मैं कह रहा हूँ कि जेन ज़ी को भी धर्म के पास आना पड़ेगा पर असली धर्म के पास।
और जितना तुम कोशिश करोगे इस नई पीढ़ी को, और इस नई के बाद की भी जो पीढ़ी है, जितना तुम कोशिश करोगे उसको पुराने तरीक़ों से पकड़ने की, वो तुमसे उतना दूर छिटकेंगे। तुम उन्हें जितना ज़्यादा ये बाबाजी दिखाओगे, और पुराने संस्कार दिखाओगे, उतना दूर भागेंगे तुमसे। उनको धर्म की ओर लाने का एक ही तरीक़ा है, असली धर्म को अनावरत करो और आज की असली समस्याओं का समाधान करो।“असली धर्म, असली समस्या” तुम्हारे पास जवान पीढ़ी दौड़ते हुए आएगी।
हाँ, तुम उनसे ये कहोगे "देखो, फलाना काम कर लो, नहीं तो पाप लगेगा।" तो तुम्हारी नहीं सुनेंगे। वो तुमसे कहेंगे "आओ-आओ, धर्म की शरण में आओ, नहीं तो पाप लगेगा।" तो ठेंगा दिखा के निकल जाएँगे। तुम उनसे कहो "मांस मत खाओ, नहीं तो नर्क जाना पड़ता है।" "टू हेल् विथ यू!”
हमें अच्छे से पता है, ये हेल् और हेवन जो तुम बताते आए हो, ये सब नहीं सुनना हमको। पर दसियों हज़ारों नौजवानों का मांस हमारे पास आकर के छूटा है। तुम्हारे पास नहीं छूटेगा, क्योंकि तुम पहली बात तो कहते हो कि "मांस इसलिए मत खाओ कि नर्क मिलता है।" और दूसरी बात तुम कहते हो "मांस मत खाओ, पर दूध और खीर खाओ।" ये पाखंड नहीं चलेगा।
नई पीढ़ी को पाखंड से बहुत नफ़रत है। वो अच्छे से जानती है कि दूध, खीर और मांस ये बिल्कुल एक साथ चलते हैं। क्योंकि तथ्य अब उसके सामने हैं, वही इन्फ़ॉर्मेशन एज है। पहले चल जाता था, लोगों को लगता था कि दूध पीना एक बात है, मांस खाना एक बात है। आज तो सारी सूचनाएँ सामने हैं, डेटा भी सामने है, टेबल्स सामने हैं, रिपोर्ट्स सामने हैं, और वीडियोज़ भी सामने हैं प्रमाण के रूप में। हम सब जानते हैं। सारे-सारे आँकड़े हमारे सामने हैं।
जिन पशुओं का आप दूध-घी इस्तेमाल करते हो, ठीक उन्हीं पशुओं का तो फिर मांस बिकता है न। आपके दूध-घी के लिए ही उनको पशुओं को ज़बरदस्ती पैदा किया जाता है और जेन ज़ी ये देख रही है। और ज़बरदस्ती उनको पैदा करके कृत्रिम गर्भाधान से फिर उनका मांस काटा जाता है। और ये दोनों इंडस्ट्रीज़ बिल्कुल एक साथ चलती हैं, एक-दूसरे पर निर्भर हैं। तो आप उनका मांस नहीं छुड़वा पाओगे और उनमें ये बढ़ता ही जा रहा है।
पंडितों के घर का हो, कि जैनों के घर का हो, कि बनियों के घर का हो, लड़का चिकन खाएगा ही खाएगा केएफसी (KFC) में जाकर पर हमारे पास आ जाता है तो उसका छूट जाता है तो उसका इसलिए छूटता है क्योंकि उसका हम वास्तविक धर्म से परिचय कराते हैं। और हम कोई आदेश नहीं लागू करते कि छोड़ दो, स्वतः छूट जाता है।
बोध बहुत बड़ी चीज़ होती है, और वही धर्म का केंद्रीय विषय है, भाई। जिसको बात समझ में आ गई फिर उसे किसी आदेश की, निर्देश की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो ख़ुद ही करता है।
और जिसको नहीं समझ में आई, तुम कब तक उसको मान्यताओं और वर्जनाओं के दबाव में रखकर एक झूठे और सतही अनुशासन से चला लोगे?
धर्म का जो संस्करण चल रहा है, उसमें जवान लोगों के लिए कोई जगह ही नहीं है भाई। वो बहुत पुरानी, सड़ी-गली चीज़ है बिल्कुल मरने को तैयार। जवान आदमी करे भी तो उसमें क्या करें? वो कहता है, "बट इट्स ऑल्सो ऑड। बहुत अजीब लगता है, ये सब क्या कर रहे हैं?”
कोई आप ले जाओ आज किसी पढ़े-लिखे, और अगर आप जवानों में भी पाते हो न कि कुछ जवान लोग अभी भी वो पुराने तरीक़े के धर्म की ओर जा रहे हैं, तो ज़्यादातर वो होते हैं जो छोटे गाँव-कस्बे के कम पढ़े-लिखे, बेरोज़गार युवक हैं। वो वही हैं। धर्म का जो पुराना मॉडल है, अगर उसकी ओर कुछ जवान लोग जा भी रहे हैं तो ज़्यादातर गाँव के, कस्बे के, कम पढ़े-लिखे और बेरोज़गार लड़के। पर धीरे-धीरे शिक्षा तो बढ़ेगी, और धीरे-धीरे वो जो गाँव में है वो शहर में आएगा। और जैसे-जैसे वो शहर में आता जाएगा, वैसे-वैसे वो पुराने धर्म की गिरफ्त से छूटता जाएगा। असली धर्म की चाहत हर इंसान को है। असली धर्म लोगों तक लेकर आओ। ये झूठमूठ का नहीं, फरेबबाज़ी नहीं।
कोई बता रहा है कि ये है ऐसी हमारी खास माला और इस माला से ये पता चल जाता है कि खाना बासी तो नहीं है। अरे भाई, उसने साइंस पढ़ी है आज के लड़के ने और लड़की ने। तुम ये सब नौटंकी करोगे कि "मेरी इस खास माला से पता चल जाता है कि खाना बासी तो नहीं है" तो तुमको, तुम्हारी माला, दोनों को उठाकर बाहर फेंक देते हैं। और उन्होंने ये करा भी है अपने मन से। उन्होंने तुमको और तुम्हारी माला, दोनों को उठाकर बाहर फेंक दिया है। क्योंकि तुम लोग धर्म के नाम पर धब्बा हो, तुम्हें बाहर फेंका ही जाना चाहिए।
तुम्हारे धर्म की एक बहुत बड़ी खासियत ये है कि वो विज्ञान का विरोधी है। और तुम जवान लड़के-लड़कियों से बात नहीं कर सकते, विज्ञान का विरोध करके। और वास्तविक धर्म विज्ञान का विरोध करता ही नहीं। तुम्हारा जो पुराना नकली धर्म है जर्जर, वो विज्ञान के प्रति विरोध रखता है, उपेक्षा रखता है, अनादर रखता है। बताओ कैसे चलेगा वो? वो सिर्फ़ मनगढ़ंत किस्से-कहानियों पर टिका हुआ है, जिनकी आज के युग में कोई जगह नहीं है।
जो बुद्धिजीवी वग़ैरह मुझसे मिला करते हैं, वो कहते हैं कि "आप जो काम कर रहे हो रिलिजन का, इन अ पोस्ट-रिलिजन एज।" मैं कहता हूँ, इग्ज़ैक्टली! आय ऐम गिविंग देम अ पोस्ट-रिलिजन, रिलिजन। आय ऐम गिविंग देम अ पोस्ट-रिलिजन, रिलिजन।
मैं नकली धर्म के बीतने के बाद का वास्तविक धर्म लोगों तक ला रहा हूँ। और मात्र यही है जो चल सकता है। बाक़ी सब तुम्हारे अंधविश्वास, धारणाएँ, मान्यताएँ, कहानियाँ ये सब हवा हो जाने हैं। इनका कुछ नहीं, कोई नामलेवा नहीं बचेगा इनका। हाँ, गीता का मर्म बचेगा। जो कालातीत संदेश है, वो सब बचेंगे। बाक़ी सब जो तुमने फिज़ूल कचरा गौरवान्वित कर रखा है, धर्म कह के, वो नहीं बचेगा। और ये कोई मेरी भविष्यवाणी नहीं है। ये काल की चाल है, जिसको कोई नहीं रोक सकता। इसको रोका नहीं जा सकता।
तो मेरे ऊपर चिढ़ने से कोई लाभ नहीं है। मुझे गाली देने से, मेरा विरोध करने से कुछ नहीं पाओगे। मुझे गोली भी मार दोगे तो काल की चाल रुकने से रही। जो होना है वो तो हो के रहेगा। मैं मर भी जाऊँ तो भी होगा। पीला, सड़ा, जर्जर, बीमार पत्ता झड़ के रहेगा। पर हाँ, जड़ों में दम है तो नया, ताज़ा, हरा पत्ता आएगा।
आ रही है बात समझ में?
'जेनेरेशन्स' के बीतने से फ़र्क़ नहीं पड़ता। कोई भी 'जेनेरेशन' हो, हर 'जेनेरेशन' को 'रेवलेशन' चाहिए। कोई भी 'जेनेरेशन' हो, है तो सब इंसान ही न। दिल सबका धड़कता है अकेलापन सबको लगता है। जीवन क्या है? पैदा क्यों हुए? किसके लिए जिए? ये सवाल सबको उठते हैं। दिल सबका टूटता है आशाएँ सब बाँधते हैं मृत्यु से सब डरते हैं। ये प्रश्न बहुत पुराने हैं और सदा रहेंगे जब तक मनुष्य की चेतना है। धर्म इन प्रश्नों का उत्तर है — काल्पनिक उत्तर नहीं, वास्तविक उत्तर।
काल्पनिक उत्तर दोगे, नहीं चलेगा। वास्तविक उत्तर क्या होता है? वो उत्तर जो तुम ख़ुद खोजो, तुम्हारी जिज्ञासा से जो बात उठे, वो। वास्तविक धर्म के केंद्र में जिज्ञासा, नकली धर्म के केंद्र में मान्यता। वास्तविक धर्म के केंद्र में खोज, नकली धर्म के केंद्र में कहानी।
आप कहते हो न, आप मॉडर्न हो। मॉडर्निटी से संबंधित जितनी बातें होती हैं, वो आपको मालूम है कहाँ मिलेंगी? ऋषियों में। जब आपका ऋषियों से असली परिचय होता है, तब आप कहते हो ये तो मॉडर्न से भी ज़्यादा मॉडर्न हैं। मॉडर्निटी का संबंध आप लगाते हो कि कोई एक लिबरल ऐटिट्यूड रखता है। आप तो लिबरल में रुके हो, वहाँ तो लिबरेशन की बात हो जाती है।
आप तो कहते हो, मैं मॉडर्न हूँ इसलिए मैं चाहता हूँ, कि इक्वालिटी रहे, सबके पास राइट्स रहे। आप तो बस कह रहे हो, कि ये और ये ईक्वल हैं। वहाँ कहा जाता है, ये और ये एक हैं। आपकी इक्वालिटी धरी रह जाती है, वहाँ बात वननेस की हो जाती है। ऋषि तो मॉडर्न से ज़्यादा मॉडर्न हैं।
आपके लिए तो फ्रीडम का बस यही मतलब होता है, टु फुलफिल माय मेंटल डिज़ायर्स। फ्रीडम माने यही न, टु डू ऐज़ आइ प्लीज़, जो मेरा मन कर रहा है मैं करूँगा, ये मेरी फ्रीडम है। टु फुलफिल माय मेंटल डिज़ायर्स। और ऋषि कहते हैं, 'नहीं नहीं नहीं, फ्रीडम को और आगे ले जाओ। फ्रीडम का मतलब होता है, टु फुलफिल योर एक्ज़िस्टेन्शियल नीड, नॉट जस्ट मेंटल डिज़ायर बट योर एक्ज़िस्टेन्शियल नीड।'
ऋषि तो इतने मॉडर्न हैं, इतने मॉडर्न हैं, कि बाप रे बाप!
लेकिन ये जो सड़ा हुआ धर्म है, इसने ऋषियों को पुराने ज़माने की चीज़ बना दिया। इसने ऋषियों को बता दिया, ऋषि तो वही है जो पुराने ज़माने के कपड़े पहने और ये सब करे। आज का जो ऋषि होगा, वो मॉडर्न से मॉडर्न होगा।
और इसीलिए, ये जो सड़ा धर्म है। इसमें दुनिया भर में ये होता है, भारत की बात नहीं है कहीं भी चले जाओ। जो धर्म गुरु होते हैं, वो वही कपड़े पहन रहे होंगे जो 1500 साल पहले पहने जाते थे। पॉप से ले के, खलीफा से ले के, पंडित तक सब यही कर रहे हैं। क्योंकि धर्म को चीज़ ही क्या बना दिया, 'पुराने ज़माने की।'
और मैं तो कह रहा हूँ, ऋषियों से ज़्यादा मॉडर्न कोई हो ही नहीं सकता। पुरानी तो वो चीज़ें पड़ती हैं जो काल की लहरों से हैं, आई और बीत गई — पुरानी हो गई। ऋषियों का जिससे वास्ता है, वो तो सदैव नित-नूतन रहता है। वो पुराना कैसे पड़ेगा? वो तो आज का है।
जो लोग धर्म की रक्षा की बात करते हैं, मैं उनको बड़ा एक हार्दिक संदेश देना चाहता हूँ। देखो, धर्म की रक्षा करना चाहते हो तो धर्म में जितने भी तरह के दूषण हैं, पाखंड है, अंधविश्वास है, गप्पबाज़ी है, भेदभाव है, फिज़ूल के रीति-रिवाज हैं, ये सब निकाल फेंको, सिर्फ़ तभी धर्म बचाया जा सकता है — वास्तविक धर्म। और,
वास्तविक धर्म को बचाना पड़ेगा। क्योंकि वास्तविक धर्म अगर नहीं बचा, तो फिर इंसान भी नहीं बचेगा।
क्या करें जेन ज़ी? जब कोई जानता नहीं है मुझे, उसका परिचय कराया जाता है कि "आचार्य हैं," तो उनको लगता है कि इनकी भी कोई एस्ट्रोलॉजी की ऐप होगी। एक बार सचमुच हुआ था। एक आता है, तो धीरे-धीरे मेरी ओर आ रहा है। मैंने कहा, "क्या? क्यों आ रहा है?" और आके ऐसे (हथेली आगे) करता है। तुमने ये तो धर्म का मतलब बना दिया। जितने तरह के झूठ हैं, तुमने उनका नाम रख दिया — धर्म। अब नई पीढ़ी धर्म से दूर भागती है, तो ताज्जुब क्या?
मैं आप सब का स्वागत कर रहा हूँ। आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं आपसे कहना चाहता हूँ, गीता बिल्कुल आज की है। समझो जैसे श्रीकृष्ण ने आपके लिए आज ही कही हो। आइए, बहुत-बहुत-बहुत मॉडर्न है गीता। आपसे ज़्यादा आधुनिक है गीता — आइए। आज की, बिल्कुल आज की समस्याओं के लिए ही नहीं, भविष्य की समस्याओं के लिए है, गीता। अतीत का कोई पुराना बासी वक्तव्य नहीं है, गीता। आज के इंसान को संबोधित करती है, गीता। आइए।
और नए लड़के-लड़कियों, तुम अपने आप को क्या नया समझते हो, तुम तो बहुत पुराने हो। तुम्हारे शरीर में वही पुराना जानवर है जो दाँत फाड़ता है, पेट बजाता है, खाना माँगता है, अंडे देता है, शिकार करता है। तुम नए कैसे हो गए? अपने आप को क्यों बोलते हो कि "हम तो नए हैं, नए हैं?" तुम क्या नए हो? नया तुमको दर्शन बनाएगा। आओ फिलॉसफ़ी के पास आओ, वो तुमको नया बनाएगी, वो तुमको जवान बनाएगी, वो तुमको ताक़त देगी, वरना तुम बहुत पुराने हो।
नए डिज़ाइन के कपड़े पहन लेने से और ट्रेंड्स पर सवार हो जाने से तुम नए, आधुनिक, मॉडर्न नहीं हो जाते। वास्तविक धर्म का काम ही यही है — तुमको नया बनाना, असली बनाना। वरना तो हम सब बिल्कुल एकदम एंशिएंट ऐनिमल्स हैं हम। है कि नहीं है? बोलो।
धर्म माने एक नई ताज़गी, नई ख़ुशबू जो तुम्हें आज जीने की तमीज़ देती है, जो तुम्हें पहली बार तुम्हारा असली चेहरा दिखाती है। और बहुत खूबसूरत हो तुम, अपने असली चेहरे में। नए-नए मेकअप की फिर ज़रूरत कम पड़ती है, तुम्हारा चेहरा ही बहुत नया है — असली चेहरा।
जब कोई आता है न मेरे पास, बोलता है — "नहीं, मैं तो अभी कम उम्र का हूँ। मेरी उम्र तो बस 20 साल है, या 25 साल है।" मैं कहता हूँ, "तुम्हारी उम्र 25 साल नहीं है। तुम्हारी उम्र है 2 लाख 25 साल। तुम्हें 25 साल याद है, 2 लाख तुम्हें याद नहीं है। पर उन 2 लाख सालों का इतिहास भी तुम्हारे ही शरीर में बैठा हुआ है। तुम क्यों कह रहे हो कि तुम्हारी उम्र 25 साल है? तुम्हारी उम्र 2 करोड़ 25 साल है। तुम बहुत पुराने हो। आओ, तुम्हें नया बनाएँ।"
चलो, फिलॉसफ़ी के पास चलते हैं। और वही जो दर्शन है, वो फिर वास्तविक धर्म बन जाता है। आ रही है बात समझ में? पड़े रहने दो, ये सब जो प्रौढ़ लोग हैं और बुज़ुर्ग हैं पड़े रहने दो इनको पुराने तौर-तरीक़ों में। तुम्हें अपनी ज़िंदगी जीनी है, और तुम्हें अभी बहुत जीना है। और तुम्हारे सामने बहुत नई और बहुत भयानक चुनौतियाँ हैं।
आओ वास्तविक धर्म के पास आओ।
तुम्हें अपनी ज़िंदगी रोशनी में और ताक़त में जीनी है। पड़े रहने दो बाक़ीयों को, पुराने लोगों को पुराने तरीक़ों में पड़े रहने दो, जाएँ। उनके पास कितना समय है? ना वो बचने हैं, ना उनके पुराने तरीक़े बचने हैं।