गर्भपात: अपराध या अधिकार? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं एक लॉ स्टूडेंट हूँ और हम लोग अपनी यूनिवर्सिटी में चर्चा कर रहे थे कि यू.एस. का ये जो जजमेंट आया है हाल ही में, डॉब्स वर्सेज़ जैक्सन के ऊपर था, उसमें महिला गर्भपात को लेकर जजमेंट दिया गया है जिसने रो वर्सेज़ वेड में जो जजमेंट है उसको रद्द किया। उस जजमेंट में ये था कि एक महिला चौबीस हफ़्ते के भीतर अगर चाहे तो गर्भपात करा सकती है, पर अभी उसको रद्द कर दिया गया है। तो संवैधानिक रूप से महिला से ये गर्भपात के अधिकार अब छीन लिए गए हैं। तो दो तरह की बहस देखने को मिल रही हैं।
एक जो रूढ़िवादी स्कूल है, वो बोलता है कि महिला के गर्भ में जो बच्चा है उसका अपना जीवन जीने का अधिकार है, आप गर्भपात करके उसके इस अधिकार का उल्लंघन कर रहे हो, तो ये सही नहीं है। दूसरा जो लिबरल स्कूल होता है, वो बोलता है कि उस गर्भवती महिला का अपना भी एक जीने का एक अधिकार है और गरिमा है, अगर उस गर्भवती महिला की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वो नहीं रख सकती उस गर्भ को, तो आप उसे मजबूर नहीं कर सकते उस बच्चे को रखने के लिए।
तो दोनों तरह की बहस है और इसी के बीच में कुछ धार्मिक वक्तव्य भी हैं जो कहते हैं कि एक बार आपने गर्भधारण कर लिया तो उसमें प्राण आ जाते हैं, तो ऐसे में गर्भपात हिंसा है, कि आपने उसको मार दिया या पैदा ही नहीं होने दिया।
तो इसमें क्या सही है, या इसमें कैसे सामंजस्य बैठाया जाए? आपका मार्गदर्शन चाहिए।
आचार्य प्रशांत: देखो दोनों ही पक्ष जो बात अपनी कह रहे हैं - लिबरल (उदारवादी) और कंज़र्वेटिव (साम्यवादी) - दोनों की ही बातों में दम है, दोनों के ही पास कुछ अच्छे, मज़बूत तर्क हैं।



