देखो, जितनी भी व्यवस्थाएँ होती हैं, वो ट्रैफिक जाम हो, चाहे सरकारी दफ्तरों का भ्रष्टाचार हो, अव्यवस्था हो, चाहे प्राइवेट सेक्टर की मनमर्जी हो, चाहे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर जो हो रहा होता है, वो हो — वो सब कुछ उन लोगों का प्रतिबिंब होता है जो लोग उस व्यवस्था को बना और चला रहे हैं। ख़राब व्यवस्था है, माने लोग ख़राब हैं। सीधी-सी बात, कोई बहुत गहरा कारण नहीं है। सड़क ख़राब है, माने बंदा ख़राब है। जिस क्षेत्र की सड़कें बहुत ख़राब पाई जाएँ, जान लो कि वो लोग भी बहुत अच्छे नहीं हो सकते।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम सौम्य है। मैं फिलहाल आईआईटी दिल्ली में मास्टर्स कर रही हूँ। इससे पहले मैं आईटी में कॉर्पोरेट जॉब करती थी। मेरा ये सवाल है कि एक आम भारतीय को औसतन अनावश्यक तनाव से ज़्यादा गुजरना पड़ता है।
जैसे कि आज कुछ घंटों बारिश हो गई तो सारे पोथोल्स भर गए थे और सारा आना-जाना बंद हो गया था। जैसे कि अगर हम सिग्नल पर खड़े हैं तो पीछे से कोई आकर घुसा देगा। हम अपनी टर्न में अगर सही भी खड़े हैं तो कोई आके यहाँ से आगे खड़ा हो जाएगा। अगर हम कोई भी सामान बाहर रखते हैं, जैसे मैं हॉस्टल में रहती हूँ, तो बार-बार कहा जाता है कि सामान संभाल के रखिए, चोरी न हो जाए। यहाँ ताले लगाइए, साइकिल को लॉक करके रखिए। या फिर बहुत ही छोटे स्पेस में हम दो-तीन लोगों को रहना पड़ता है।
और वही मैं अपने दोस्तों से बात करती हूँ जो जापान या कोरिया में रहते हैं, वो बताते हैं कि मामला बिल्कुल अलग है इससे। तो ये जानते हुए कि ये स्ट्रेस, ये तनाव अनावश्यक है। ये नहीं भी होता, ऐसा हो सकता है दुनिया के किसी कोने में। ये जानते हुए भी मुझे समझ नहीं आता कि




