
राम को किसी फ़िल्म, अभिनेता या ऐतिहासिक चरित्र की छवि तक सीमित करना उनके वास्तविक अर्थ को भूलना है। राम कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अहंकार के विगलन और सत्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। बाहर पर्दे पर राम को खोजने के बजाय अपने भीतर उस तड़प को पहचानना ज़रूरी है, जो अहंकार से मुक्त होना चाहती है। जब राम विषय नहीं, हृदय बनते हैं, तभी रामत्व का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।






प्रश्नकर्ता: सर नमस्कार! रामायण और महाभारत में जो कहानियाँ हैं, क्या वो सत्य घटनाओं पर आधारित हैं?







प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, दिवाली के अवसर पर देशभर से लोग यहाँ पर आपके साथ दीवाली मनाने के लिए उपस्थित हैं। उन्होंने अपने प्रश्न भेजे हैं। पहला प्रश्न है- प्रणाम आचार्य जी, कलयुग में रावण के मोक्ष का मार्ग क्या है? त्रेता में हरि के हाथों मृत्यु पाकर रावण पार

आचार्य प्रशांत: मन को अगर कुछ भाएगा नहीं तो मन जाने के लिए, हटने के लिए तैयार नहीं होगा। मन हटता ही तभी है जब उसे ऐसा कोई मिल जाता है जो एक सेतु की तरह हो: मन के भीतर भी हो, मन उसे जान भी पाए, मन उसकी प्रशंसा




प्रश्नकर्ता: गर्भवती पत्नी को वन में छोड़ने पर भी राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। जुऐ में द्रौपदी को हारकर भी युधिष्ठिर धर्मराज कहलाए। अरे! अगर ये धर्म है तो, फिर अधर्म क्या है?


प्रश्नकर्ता: जीवन में राम को भुला देने से क्या आशय है?

We are told that cleaner technology will solve the climate crisis. But emissions begin before any fuel is burnt, in a life that has no joy and so keeps reaching for the next lower pleasure: the party, the trip, the purchase. The demand for pleasure is not wrong. What matters is which pleasure we seek. Music, books, sport and real company cost the planet almost nothing. Can we look honestly at what our own consumption is trying to fill?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दीवाली है, मेरे मन में ये प्रश्न आ रहा है कि क्या हम त्योहारों को उनके सही अर्थों में मनाते भी हैं या नहीं?
आचार्य प्रशांत: अगर धर्म वास्तव में ये है - ईमानदार, बोधपूर्ण, एकांत तो ये दिन (त्योहार) हमें और धार्मिक बनाते हैं या…
If somebody would declare himself as an enemy of God, as Ravana did, as Kamsa did, oh they were very innocent fellows, they did, then you could fight him. But today's Ravanas do not declare themselves as enemies of god, they declare themselves to be surrendered to god. Today's Ravana would probably be found in Rishikesh teaching Hatha Yoga. And saying, “This is yoga. This is yoga.” Now whom are you going to fight? They’ve all assumed the name of God. Man is god.
ये युग, मूल्यों के संक्रमण का युग है। मूल्य संकुचित होते जा रहे हैं और राम जिन मूल्यों के प्रतिनिधि हैं, वो मूल्य हमें नहीं पसंद आने वाले भाई! कदम-कदम पर राम, कर्तव्य पर चलते हैं। वो ये नहीं देखते कि उन्हें लाभ क्या होगा? वो ये नहीं देखते कि उन्हें सुख, खुशी, प्रसन्नता मिलेगी कि नहीं मिलेगी। वो ये देखते हैं कि कर्तव्य क्या है ये बताओ? मैं तो अपने कर्तव्य का पालन करूँगा। आज कौन अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहता है? तुम अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करना चाहते तो राम क्यों अच्छे लगेंगे तुमको?
प्रश्नकर्ता: सर, अभी दशहरा आ रहा है और हर साल हम दशहरा मनाते आ रहे हैं लेकिन दशहरा का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे। जिसके ही दस सिर हैं, वही रावण। और हम में से कोई ऐसा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…
उदाहरण के लिए - कोई एक घर से निकला और सड़क का इस्तेमाल करके आधे किलोमीटर दूर किसी दूसरे…
आज महर्षि वाल्मीकि जयंती का सुअवसर है। इससे बेहतर शायद ही कोई मौका मिले भारत के आदिकवि को जानने के लिए। इसलिए आज हम उनके विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें आपके साथ साझा करना चाहते हैं:
महर्षि वाल्मीकि का योगदान
~ भारत व सनातन धर्म में महर्षि वाल्मीकि का योगदान…
आचार्य प्रशांत: जैसे हमारे त्यौहार होते हैं, जिन तरीकों से हम उन्हें मनाते हैं, उनमें सब कुछ कुत्सित, गर्हित और नारकीय होता है। वो हमारी चेतना को और ज़्यादा तामसिक बना देते हैं। हमारे सबसे भद्दे चेहरे, हमारे त्योहारों में निकल कर आते हैं। बड़ा दुर्भाग्य है हमारा कि भगवान…
रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीति।
तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: ध्यान देना होगा! कुछ ऐसा है यहाँ पर जो आपको चौंका सकता है।
राम से ही डरो! हो राम से ही ममता-प्रीत और राम ही हों सर्वत्र प्रतीत। तुलसी निरुपधि…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चीज़ें समझ में आ रही हैं लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि बीच में फँसा हुआ हूँ, खींचा हुआ सा महसूस करता हूँ, ऐसी हालत में क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: कुछ टूटेगा। या इधर टूटेगा या उधर टूटेगा।
पर हम बड़े होशियार लोग हैं, जैसे स्ट्रैटजी…
प्रश्नकर्ता: ज्योति दिये की दूजे घर को सजाए का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल सही जगह उंगली रखी है यही सवाल पूछने लायक है। बढ़िया!
गहरा ये भेद कोई मुझको बताए
किसने किया है मुझपर अन्याय
जिसका ही दीप वो बुझ नहीं पाए
ज्योति दिये की दूजे घर को…
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ
आनु धरें धनु बान।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: जान कर के जान जाएँगे आप और बिना जाने कौन जानेगा? तुलसी खेल रहे हैं, मानो चुनौती-सी दे रहे हैं। कह रहे हैं- अब ये सुनो और समझो और…
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: तुमने अपनी ज़िंदगी में जो इकट्ठा किया है, सब ‘सून' है। अब सून को सूना मानो चाहे शून्य मानो—असल में दोनों एक ही धातु से निकलते हैं।…
मन्दोदरी ने रावण से कहा, “यदि तुम्हें सीता को पाने की इतनी ही इच्छा है, तो तुम उसके पास राम का रूप धारण करके क्यों नहीं चले जाते?” तुम तो मायावी हो, माया का इतना उपयोग तो कर ही सकते हो। रावण ने उत्तर…
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: विचित्र लीला है। कहीं से आते नहीं हम और न कहीं को चले जाते हैं। मध्य में वो है जिसे हम कहते हैं कि 'हम' हैं। जन्म से पहले तुम…
आचार्य प्रशांत: ताली बजादूँ डायलॉग पर या जवाब दूँ? चलो जवाब दिए देता हूँ।
क्रिकेट विश्व कप के…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, श्रीराम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है, जबकि उन्होंने सीता जी की अग्नि परीक्षा ली थी, और जब वो गर्भवती थीं तो उन्हें घर से निकाल दिया था। मैं श्रीराम के इस व्यवहार को ग़लत मानती हूँ। कृपया मेरी इस शंका को दूर कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मर्यादा…
राम को भूलने से यह आशय है कि –(कमरे की ओर इशारा करते हुए) ये कक्ष है छोटा सा, आपने इसको चीज़ों से इतना…

Many of us interrupt, rush to make our point, or change the topic when a conversation comes too close. We call it a lack of patience or discipline. But impatience in a conversation is often fear: when what we hold within is borrowed belief, every question could shatter it. The same confusion makes us take our instincts and feelings as ourselves, though they are only the body’s chemistry. If we looked honestly at what we hold, would a question still feel like an attack?

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

A young athlete says she knows she should not be attached to winning, yet she is, because her coach, family and country are invested in it. Wanting to win on the court is fine; that is what a contest is for. But we never know who the next opponent will be, and the one opponent always present is ourselves. She also fears that starting at 14 was too late. The past is fixed, so what is left is to play the cards we are dealt. Where does our real contest lie?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

We often defend a bad choice by pointing to a worse one: stay dishonest or starve, keep the wrong grip or stop playing. But the real trouble is not the option we picked. It is the option we never let ourselves see. Action does not need greed or attachment to find its energy. The third way begins by rejecting both false choices, without knowing what comes next. Which of our everyday choices are really false dilemmas?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।

Victory is not decided by the trophy you hold but by the battle you choose to fight. Real strength lies in making the right decisions, staying true to your deepest values, and refusing to be ruled by fear or circumstances. When your actions arise from clarity rather than ambition, the outcome loses its power over you. The moment you choose the right path, you have already won.

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।

काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।

A society that loses its sense of sacredness begins to see every person and profession as merely transactional. When truth is replaced by the pursuit of happiness and consumption, trust erodes and cynicism becomes the norm. Doctors, teachers, and institutions are no longer respected but viewed with suspicion. The deeper crisis is not medical or social but philosophical: without self-understanding, people become consumers first and human beings second. True respect can return only when truth, integrity, and inner education become more important than personal gain.

मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।

ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?

तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।

एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।

लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।

पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?

जीवन सही जियो, तो रिश्ते भी फिर सही बनाओगी। सही लोगों को ही अपनी ज़िंदगी में प्रवेश दोगी। गलत ज़िंदगी जीने के कई दुष्परिणाम होते हैं। उनमें से एक ये होता है कि तुम्हें सब गलत ही लोग मिलेंगे। अभी दिक़्क़त ये होती है कि खेल तो होता है सारा जिस्मानी, लेकिन तुमने अपने आप को ये समझा रखा होता है कि बात भावनाओं की है। तो फिर जब रिश्ता टूटता है जिस्मानी, तो तुमको ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी भावनाओं पर चोट हुई है। अरे, बात भावनाओं की कभी थी ही नहीं। क्यों व्यर्थ में भावनाओं को इसमें बीच में ला रहे हो।

You have to get into your own life, thoughts, feelings, actions, decisions, and see what holds you back. And freedom from what holds you back is the most important. That is what is most important. And then you can accept whatever price you have to pay for that most important thing. So it all starts from you. what is really important is a subjective thing. It depends on you. Nobody else can tell it.

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

We keep carrying the unexamined burden of the past all our life. That’s a great problem that we have. If you want to carry something from the past, if you want to remain related to it even today, then you have to ask: how does it benefit you? Because it’s an expensive decision to make. The purpose of life is to unburden yourself. Relate to something or somebody in a way that will help you clear away a lot of useless relationships.

Women, the way they are brought up in our country, anyway do not have much to lose. If I do not have much in life, and then there arrives a person who is attractive, earns well, is strong, then why, as a woman, will I not go for him? Your body is impelling you to take a particular decision, and you don't even know that it's coming from the body. The only solution is understanding, real, deep, honest observation of life. And this you could also call spirituality.