ध्यान संकल्प है बोध में उतरने का || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

आचार्य प्रशांत: हम देखते हैं तो एक तो यह है हमारा आम, रोज़-मर्रा का देखना कि नदी को देख रहे हैं; यह बड़ा खण्डित देखना है, आधा-अधूरा देखना है।
अनमने होकर देखना है, मन यहाँ भी है, मन कहीं और भी है–तो यह जो देखना है, यह अन्यमनस्कता है। और ऐसा नहीं है कि मन के साथ कोई ज़बरदस्ती की जा रही है कि ‘तू यहाँ भी देख और तू वहाँ भी देख’। मन की कोई विशेष इच्छा ही नहीं है नदी को देखने की। मन की कोई विशेष चाहत ही नहीं है कि समझ ले। यह है हमारा रोज़-मर्रा का देखना–चाहे नदी हो, चाहे पेड़ हो, चाहे व्यक्ति हो, चाहे जो भी हो–जिसको भी हम देख रहे हैं ऐसे ही देख रहे हैं। अनमने होकर, खण्डित मन से।
और एक दूसरा देखना है जो ध्यान में देखना है।
ध्यान क्या है–इसको समझेंगे।
ध्यान मन की इच्छा है समझ में उतरने की।
विचारों का गहरा प्रभाव है और मन इसमें इधर-उधर भटक रहा है। यह प्रभाव ही वो प्रवाह है, इसी प्रभाव से निकलता है वो प्रवाह। वही मन का खण्डित होना है। पर यह खण्डित होना कभी दिखाई देगा नहीं, कभी भी नहीं। मन एक विचार से दूसरे पर कूद रहा है, जल्दी-जल्दी, प्रतिक्षण, वो ऐसा संयुक्त हो गया है इस मानसिक प्रवाह के साथ, कि उसको इस प्रवाह का कुछ पता ही नहीं है। और फिर मन कहता है कि ‘ठहरो! ज़रा समझने दो कि हो क्या रहा है’। जहाँ मन यह कहता है कि ‘समझने दो कि हो क्या रहा है’, वहीं मन की इच्छा है समझ में उतरने की। जहाँ मन यह कहता है कि ‘ज़रा देखूँ तो कि हो क्या रहा है वास्तव में!’, तो उसे सबसे पहले यह देखाई देता है कि एक ‘प्रवाह’ है।



